Rammu Singh
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में गिने जाने वाले हमीदिया अस्पताल से जो तस्वीर सामने आई है, वह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं की सामूहिक मौत का प्रमाण है।
एक अज्ञात मृतक का पोस्टमार्टम होने के बाद उसके शव को नग्न अवस्था में मर्चुरी से बाहर लाकर खुलेआम स्ट्रेचर पर सिलाई की गई। रम्मू सिंह की कलम से:
अस्पताल परिसर में लोग आते-जाते रहे, लेकिन किसी को यह महसूस नहीं हुआ कि वहाँ एक इंसान की अंतिम गरिमा को सरेआम कुचला जा रहा है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नियम टूटे। सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में अब इंसान की पहचान सिर्फ “केस नंबर” बनकर रह गई है?
भारतीय कानून, मेडिकल एथिक्स और मानवाधिकार—तीनों स्पष्ट कहते हैं कि मृत व्यक्ति की देह का सम्मान जीवित व्यक्ति की गरिमा जितना ही महत्वपूर्ण है।
पोस्टमार्टम और शव की सिलाई जैसी प्रक्रिया बंद कमरे में, डॉक्टरों की निगरानी में और पूरी गोपनीयता के साथ होनी चाहिए। लेकिन हमीदिया अस्पताल में जो हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि सरकारी व्यवस्थाओं में संवेदनशीलता की जगह अब “रूटीन” ने ले ली है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि मृतक अज्ञात था।
शायद इसी वजह से उसकी गरिमा भी “अज्ञात” मान ली गई। अगर शव किसी बड़े नेता, अफसर या प्रभावशाली परिवार के व्यक्ति का होता, तो क्या वही व्यवहार होता?
क्या तब भी शव को खुले में नग्न अवस्था में रखकर सिलाई की जाती?
यह घटना सिर्फ अस्पताल प्रशासन पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है।
करोड़ों रुपये स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन क्या संवेदनशीलता का कोई प्रशिक्षण दिया जाता है?
क्या अस्पतालों में काम करने वाले कर्मचारियों को यह बताया जाता है कि शव भी सम्मान चाहता है?
विडंबना देखिए—एक तरफ सरकारें “मानवता”, “संस्कार” और “सम्मान” की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में मौत के बाद इंसान की देह तक सुरक्षित नहीं है। जीवित व्यक्ति को इलाज के लिए लाइन में खड़ा किया जाता है और मृत व्यक्ति को सम्मान के लिए भी तरसना पड़ता है।
यह सिर्फ भोपाल का मामला नहीं है।
यह उस मानसिकता का उदाहरण है जहाँ गरीब, अज्ञात और बेसहारा लोगों की जिंदगी और मौत दोनों सस्ती समझी जाती हैं। यदि आज इस अमानवीय घटना पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो कल किसी और अस्पताल में किसी और शव की गरिमा इसी तरह तार-तार होगी।
समाज की सभ्यता का स्तर इस बात से तय होता है कि वह अपने मृतकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर शव भी सम्मान नहीं पा रहा, तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमारी संवेदनाएँ अब ICU में नहीं, शायद वेंटिलेटर पर पहुँच चुकी हैं।
फेसबुक वाल से साभार
मौत के बाद भी अपमान: क्या इंसान अब सिर्फ “शव” रह गया है?
