Editorial
इच्छामृत्यु की अनुमति

संजय सक्सेना
अंतत: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन निवासी हरीश राणा को मुक्ति मिलेगी। 12 साल से कोमा में केवल हलकी सी उम्मीद के बीच अटके हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु को अनुमति दे दी है। कोर्ट ने आठ साल पहले के आदेश में संशोधन करते हुए एक नई नजीर पेश की है।
असल में 2018 के फैसले में संविधान पीठ ने अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। अदालत ने कहा था कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु लिविंग विल के माध्यम से लागू की जा सकती है। 24 जनवरी 2023 को संविधान पीठ ने 2018 के इच्छामृत्यु संबंधी दिशा-निर्देशों में संशोधन किया, ताकि गंभीर मरीजों को निष्क्रिय इच्छामृत्यु देने को आसान बनाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के पिता की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान पहले उनके माता-पिता से मिलने की इच्छा भी जताई थी। अदालत ने आईआईएमएस दिल्ली के डॉक्टरों की सेकंडरी मेडिकल बोर्ड की ओर से दी गई रिपोर्ट का अवलोकन किया और उसे दुखद रिपोर्ट बताया। प्राथमिक मेडिकल बोर्ड ने भी मरीज की जांच के बाद कहा था कि उसके ठीक होने की संभावना लगभग नगण्य है। 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्राथमिक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार मरीज की स्थिति बेहद दयनीय है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2023 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी मरीज की कृत्रिम जीवनरक्षक प्रणाली हटाने के लिए प्राथमिक और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड दोनों की विशेषज्ञ राय आवश्यक होती है, विशेष रूप से तब जब मरीज स्थायी विजिटेटिव अवस्था में हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हरीश राणा, जो वर्तमान में 32 वर्ष के हैं, कभी एक उज्जवल और प्रतिभाशाली युवा थे। वे अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद एक दुखद दुर्घटना का शिकार हो गए। इस दुर्घटना में उनके मस्तिष्क को गंभीर चोट लगी, जिससे वे स्थायी वेजिटेटिव अवस्था और 100 फीसदी क्वाड्रिप्लेजिया यानि चारों अंगों के लकवे की स्थिति में चले गए पिछले 12 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
रिपोर्टो के अनुसार, वह केवल क्लिनिकली एडमिनिस्टरड न्यूट्रिशन के सहारे जीवित थे, जो सर्जरी कर लगाए गए पीईजी ट्यूब के माध्यम से दिया जा रहा था। अदालत ने कहा कि यह भी एक चिकित्सीय उपचार है और इसे प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड के सर्वोत्तम निर्णय के आधार पर बंद किया जा सकता है। उपचार जारी रखने से केवल उनकी जैविक जीवन प्रक्रिया ही बढ़ रही थी, लेकिन किसी भी प्रकार का चिकित्सीय सुधार नहीं हो रहा था। अदालत ने पाया कि मरीज के माता-पिता, प्राथमिक मेडिकल बोर्ड और दूसरी मेडिकल बोर्ड सभी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मरीज को दी जा रही क्लिनिकली एडमिनिस्टरड न्यूट्रिशन को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह मरीज के सर्वोत्तम हित में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब दोनों मेडिकल बोर्ड जीवनरक्षक उपचार हटाने की अनुमति दे दें, तो सामान्यत: अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि, यह पहला मामला था, इसलिए अदालत ने स्वयं इस पर आदेश पारित करना उचित समझा। अदालत ने यह भी कहा कि जीवनरक्षक प्रणाली को सम्मानजनक और गरिमापूर्ण तरीके से हटाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हिमांशु राणा के माता-पिता का विशेष उल्लेख करते हुए उनकी सराहना की और कहा कि उन्होंने अपने बेटे के प्रति अत्यधिक प्रेम और देखभाल दिखाई। अदालत ने कहा कि उनका परिवार कभी उनके साथ से दूर नहीं हुआ।
अदालत ने केंद्र को इस पर व्यापक कानून बनाने की भी सिफारिश की। मुख्य फैसला जस्टिस पारदीवाला ने लिखा, जबकि जस्टिस विश्वनाथन ने सहमति व्यक्त की। 2018 के संविधान पीठ के फैसले और जनवरी 2023 के संशोधित आदेश के अनुसार, गरिमा के साथ मरने के अधिकार के मामलों में प्राथमिक और दूसरी मेडिकल बोर्ड की राय लेना आवश्यक होता है। यह पहला मामला है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के कामन कॉज फैसले को लागू किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2018 को इच्छामृत्यु पर एक अहम फैसला दिया था। सम्मान के साथ मौत के हक को मौलिक अधिकार बताते हुए कोर्ट ने लाइलाज कोमा या मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुके लोगों को लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाते हुए मृत्यु अपनाने की सशर्त इजाजत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों के तहत कोई भी चेतन व्यक्ति यह लिविंग विल कर सकता है कि यदि उसके बचने की संभावना खत्म हो जाए तो उसका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लिया जाए। इसके बाद मेडिकल बोर्ड केस को देखेकर उस पर फैसला लेगा।
देखा जाए तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले ने रोशनी दिखाई। और इससे न केवल रोगी के असहनीय और न खत्म होने वाले कष्टों से मुक्ति देने का मार्ग खुला है, अपितु परिजनों को होने वाली परेशानियों से उन्हें निजात दिलाई है। एक बात और, कई बार निजी अस्पताल केवल अपना बिल बढ़ाने के लिए रोगी को भर्ती किए रहते हैं, वेंटीलेटर से नकली श्वास दिखाते रहते हैं, जबकि वो मर चुका होता है। उम्मीद की जा रही है कि इस फैसले का उस पर भी असर पडऩा चाहिए। लोगों को अस्पतालों की मनमानी का शिकार होने का एक बिंदु तो कम हो सकता है। न्यायालय ने वास्तव में यह बहुत मानवीय और संवेदनशील फैसला दिया है।


