MP: वक्त है, चेत जाइए… अब अगले तीन महीने पानी की हर बूंद को बचाने के हैं…

– अलीम बजमी. भोपाल
सूखते तालाब और लापरवाही के लीकेज। ये आहट है शहर में आने वाले पानी के संकट की। ऐसा नहीं कि भोपाल ने सूखा नहीं देखा। इसी सदी में वर्ष 2002 और 2008 में भोपाल में पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मची थी। बवाल इतना हुआ था कि शाहजहांनाबाद के संजय नगर में छह इंसानी जानें गईं तो खानूगांव में लोग मारने-मरने को उतारू हो गए थे। चांदबड़, टीला जमालपुरा में भी पानी के झगड़े थाने तक पहुंचे थे। गुजरते टैंकरों को जबरिया रोककर पेयजल प्रभावितों ने पानी तक लूट लिया था। दुआ कीजिए, शहर में ऐसी नौबत फिर कभी न आए, लेकिन मौसमी चक्र में बदलाव, बड़े तालाब और कोलार डैम की तस्वीर देखकर दिल डर रहा है। दोनों पेयजल स्रोतों के किनारों ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया है तो बरेला, बहेटा, हलालपुर, राजा भोज सेतु की तरफ बड़े तालाब के पानी में डूबी रहने वाली सतह अब ऊपर नजर आने लगी है। इसी तरह सामान्य दिनों में भदभदा के गेट से टकराने वाली बड़े तालाब की लहरें अब दिखाई नहीं देतीं। उधर, कोलार डैम में पानी में डूबे पेड़ अब ऊपर साफ दिखाई देने लगे हैं।
नगर सरकार के अनियोजित वाटर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क सिस्टम के कारण ही दर्जनों स्थानों पर लीकेज से लाखों लीटर पानी जाया हो रहा है तो धड़ल्ले से हो रही पानी की फिजूलखर्ची पर जनता भी गंभीर नहीं है। ओवरहैड टैंक, संप टैंक में फुटबाल नहीं होने से ये लबालब होकर छलक रहे हैं। कहने का मकसद सिर्फ इतना है कि अभी से प्लानिंग कीजिए ताकि बूंद-बूंद पानी की हिफाजत हो सके। ऐसा नहीं किया तो परेशानी नगर सरकार को होगी। जनता भी लान-तान करेगी। दूसरी ओर नागरिकों को भी सामाजिक एवं पर्यावरणीय कारणों से जागरूक होना ही पड़ेगा। उनकी जागरुकता से पानी का अपव्यय रुकेगा। वैसे भी हमारे समाज में पानी संचय की प्रवृत्ति नहीं है। इसमें बदलाव लाना होगा। बदलाव के लिए जल मित्रों की सेना बनाए जाने का सुझाव है, ताकि वे घूम-घूम कर पौधों की सिंचाई, वाहनों की धुलाई, दुकान और घर के बाहर नलों से आते पानी के छिड़काव जैसे कृत्यों को रोकने में अपनी महती भूमिका निभा सकें। कुछ खास बड़ी सड़कों के डिवाइडर और किनारे की हरियाली को सींचने से पानी बर्बाद होता हुआ हर दिन दिखाई देता है। यह दर्दनाक दृश्य है। क्या यहां ‘ड्रिप’ सिंचाई नहीं हो सकती, ताकि हर दिन लाखों लीटर पानी बचे। अफसोस तो यह है कि शहर में 50 से अधिक जीवित कुओं-बावड़ियों को लेकर नगर सरकार ने कोई योजना नहीं बनाई और न ही आपात स्थिति में इस वैकल्पिक स्त्रोत के उपयोग के बारे में अब तक सोचा। इनके पानी का ट्रीटमेंट करके उपयोग में लिया जा सकता है। जिम्मेदारी सबकी है। पिछले अनुभव कहते हैं कि सिर्फ नगर सरकार के भरोसे रहना उचित नहीं है। हरेक को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए पानी बचाने के लिए जरूरी उपाय करने होंगे। प्रयासों में भी ईमानदारी कायम रहे। इस संकट की घड़ी में रहीम का ये दोहा याद आता है…
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष, चून।
प्रसंगवश: वर्ष 1988-89 में भी भोपाल में सूखा पड़ा था। तब गली-गली में हैंडपंपों और ट्यूबवेल का खनन बड़ी संख्या में हुआ था। उसी दौरान कोलार का पानी भोपाल लाया गया था। तब भोपाल में एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई हुआ करता था। इसके बाद ऐसी नौबत वर्ष 2002 में आने पर बड़े तालाब में डेड स्टोरेज टैंक लेवल से 1652.50 फीट से चार फीट नीचे पानी खींचने के लिए पाइपों को उतारा गया था। वर्ष 2008 में तो बोट क्लब के सामने बड़े तालाब का पानी सूखने से कई लोग पैदल चलकर शाह अली शाह के तकिए तक पैदल चलकर गए थे।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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