मॉनसून सत्र से पहले बदला संसद का गणित, विपक्षी खेमे में टूट से NDA को बढ़त की उम्मीद
नई दिल्ली। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। विपक्षी दलों में उभरे मतभेदों और कुछ दलों में हुई टूट ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को नई राजनीतिक ताकत दी है। ऐसे में केंद्र सरकार को उन संवैधानिक संशोधन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की उम्मीद है, जो अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में आवश्यक बहुमत नहीं जुटा पाए थे।
अप्रैल 2026 में लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने से जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को 298 मतों का समर्थन मिला था, जबकि इसके पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था। विपक्ष के विरोध और परिसीमन को लेकर उठी आशंकाओं के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका था।
विपक्षी एकजुटता पर सवाल
हाल के दिनों में विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और द्रमुक (DMK) के रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। परिसीमन के मुद्दे पर द्रमुक और अन्य दक्षिण भारतीय दलों ने पहले भी कड़ा विरोध दर्ज कराया था, जबकि टीएमसी ने भी कई मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाया है।
महाराष्ट्र में भी राजनीतिक घटनाक्रम ने नई हलचल पैदा की है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसदों के शिंदे गुट के साथ जाने की खबरों ने विपक्षी खेमे को झटका दिया है। इससे लोकसभा में NDA की संख्या बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
NDA की नजर संवैधानिक बहुमत पर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों में टूट और पुनर्संरेखण का सिलसिला जारी रहता है तो NDA लोकसभा में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। हालांकि किसी भी संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए सरकार को अब भी व्यापक समर्थन जुटाना होगा।
परिसीमन और महिला आरक्षण फिर बन सकते हैं प्रमुख मुद्दे
केंद्र सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को नए स्वरूप में फिर से लाया जा सकता है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा है कि परिसीमन विधेयक दोबारा पेश किया जा सकता है और इसमें सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान शामिल हो सकता है।
ऐसे में जुलाई में शुरू होने वाले मॉनसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच असली मुकाबला सिर्फ सदन के भीतर नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों और समर्थन जुटाने की कवायद में भी देखने को मिल सकता है।