RGPV का नाम बदलने पर सियासत तेज, दिग्विजय सिंह बोले- “इतिहास मिटाने की नहीं, सम्मान देने की जरूरत”

भोपाल. पूर्ब मुख्यमंत्री Digvijaya Singh ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) का नाम बदलने की चर्चाओं पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन देश के पूर्व प्रधानमंत्री Rajiv Gandhi के योगदान को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
राज्य सरकार द्वारा RGPV को तीन हिस्सों—भोपाल, जबलपुर और उज्जैन—में विभाजित करने की तैयारी की खबरों के बीच यह विवाद सामने आया है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक विश्वविद्यालय के नए नाम को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कांग्रेस ने इसे “इतिहास मिटाने की कोशिश” करार दिया है।

दिग्विजय सिंह ने क्या कहा?
दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा कि राजीव गांधी ने भारत में तकनीकी और आधुनिक शिक्षा की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 1998 में उनकी सरकार ने राजीव गांधी के सम्मान में RGPV की स्थापना की थी, जो आज मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा तकनीकी विश्वविद्यालय माना जाता है।
उन्होंने मुख्यमंत्री Mohan Yadav से आग्रह करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय का नाम यथावत रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, “इतिहास और योगदान को मिटाने की नहीं, सम्मान देने की आवश्यकता है।”

कांग्रेस ने बीजेपी पर लगाया इतिहास बदलने का आरोप
इस मुद्दे पर कांग्रेस लगातार आक्रामक नजर आ रही है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष Umang Singhar ने भी सरकार के प्रस्तावित कदम पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किसी संस्थान का नाम बदलने से न शिक्षा व्यवस्था सुधरेगी और न ही युवाओं को रोजगार मिलेगा।
उमंग सिंघार का कहना है कि राजीव गांधी के योगदान को देश कभी नहीं भूल सकता, खासकर सूचना प्रौद्योगिकी और आधुनिक तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भूमिका को।

क्यों अहम है RGPV?
Rajiv Gandhi Proudyogiki Vishwavidyalaya देश के प्रमुख तकनीकी विश्वविद्यालयों में गिना जाता है। इसके अंतर्गत मध्य प्रदेश के सैकड़ों इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मैनेजमेंट और पॉलिटेक्निक कॉलेज संबद्ध हैं। हर साल लाखों छात्र यहां से तकनीकी डिग्रियां प्राप्त करते हैं।
सरकार का तर्क यह माना जा रहा है कि विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय स्तर पर विभाजित करने से प्रशासनिक कामकाज और कॉलेजों का प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकेगा। लेकिन विपक्ष इसे केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक कदम के रूप में देख रहा है।

नाम बदलने की राजनीति फिर चर्चा में
देश के कई राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में संस्थानों, शहरों और योजनाओं के नाम बदलने को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही है। समर्थक इसे “नई पहचान” और “सांस्कृतिक पुनर्स्थापना” बताते हैं, जबकि विरोधी इसे इतिहास और पूर्व नेताओं के योगदान को कमजोर करने की कोशिश मानते हैं।
RGPV को लेकर छिड़ा विवाद भी अब शिक्षा से आगे बढ़कर राजनीतिक प्रतीकवाद का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

Exit mobile version