MP: अब कमलनाथ दिग्विजय को संन्यास ले लेना चाहिए

संजय सक्सेना

मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया। ये जितनी बीजेपी की जीत नही है, उतनी कांग्रेस की हार है। केवल एक सीट छिंदवाड़ा ही पिछली बार कांग्रेस के पास थी। और वो कमलनाथ ने खुद जीती थी। कह सकते हैं कि कमलनाथ ने पिछली बार केवल छिंदवाड़ा जीतने का प्रयास सही तरीके से किया था, बाकी सीटों पर औपचारिकता ही निभाई। इस बार भी वो छिंदवाड़ा में सिमट कर रह गए, पर सीट नहीं बचा सके।

आज ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करके प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने प्रदेश में भारी पराजय की जिम्मेदारी ली और संगठन मजबूत करने की बात कही। पटवारी ने ईमानदारी दिखाई, लेकिन सही मायने में तो पटवारी की जिम्मेदारी बनती ही नही है। केवल एक सीट कांग्रेस के पास थी, वो कमलनाथ की जिम्मेदारी वाली थी। वैसे भी विधानसभा चुनाव के बाद जीतू को अध्यक्ष बनाया गया, तत्काल लोकसभा चुना आ गया। तैयारी तो छोड़ो संगठन ही नहीं बना पाए।

यहां हम जीतू पटवारी नही, कांग्रेस के दिग्गजों की बात कर रहे हैं। तो सबसे पहले तो जनादेश इस बात का रहा कि कांग्रेस से दिग्विजय और कमलनाथ को विदा कर देना चाहिए। ये राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गए हैं, संन्यास लेकर अपनी इज्जत बचा सकते हैं। बार बार हारने से बेहतर सन्यास लेना होगा। कमलनाथ खुद तो नही हारे, पर छिंदवाड़ा शायद उनसे मुक्त होना चाहता है।

जब कमलनाथ को पीसीसी चीफ के पद से हटाया गया था, तब से ही उनकी पार्टी छोड़ने की खबरें आना शुरू हो गई थीं। लोकसभा चुनाव के पहले तो पूरे प्रदेश के उनके समर्थकों के जाने की खबरें चल गई थीं। दर्जनों समर्थक बीजेपी में चले भी गए,पर कमलनाथ नहीं जा सके। इसके।बाद कमलनाथ का पॉलिटिकल ग्राफ एकदम गिर गया। या तो वे समझ नही पाए या फिर समझने के लिए तैयार नहीं हुए। उनके दो खास दाएं बाएं और एक आयातित मीडिया सलाहकार, जो विधानसभा हार के भी बराबर जिम्मेदार रहे थे, उन्हें बेटे को स्थापित करने की सलाह देते रहे। बेटे को शायद जनता ने पसंद नहीं किया। एक बार कमलनाथ के कारण जीता दिया। दूसरी बार यानी इस चुनाव में मकर दिया। अब राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि कमलनाथ को रिटायरमेंट ले लेना चाहिए। पर उनके सामने समस्या ये है कि नकुल को स्थापित नही कर पाए।

जहां तक दिग्विजय का सवाल है तो वे लगातार दो लोकसभा चुनाव हार चुके हैं । पार्टी ने राज्यसभा भेज दिया। बेटा मंत्री बन चुका। है और पिछले चुनाव में जीत कर विधायक भी बन गया। अब पार्टी से लेकर राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि उनका राजनीतिक सन्यास का समय आ चुका है।

असल में मध्य प्रदेश कांग्रेस के ठेकेदारी प्रथा चलती आ रही थी। पहले शुक्ल बंधुओं और अर्जुन सिंह के गुट थे। लेकिन उस दौर में अच्छे प्रत्याशियों को टिकट देने पर जोर दिया जाता था। उससे पहले भी ऐसी ही परंपरा थी। नेताओं की पसंद के आधार पर टिकट दिए जाते थे। जब कमलनाथ, दिग्विजय और सिंधिया का दौर आया, तब टिकट का आधार जीतना नहीं रह गया। हमारा गधा आपके घोड़े से अच्छा है, ये कहावत लागू हो गई। कोटा तय होने लगा। यही कारण था कि जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी, तो उनके साथ बड़ी संख्या में उनके समर्थक भी गए। यहां ये बात भी गौर करने लायक है कि सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने की मुख्य वजह बने कमलनाथ, जबकि परदे के पीछे से इसका संचालन किया दिग्विजय सिंह ने।

ठेकेदारी प्रथा का ही परिणाम आज कांग्रेस भोग रही है, क्योंकि अच्छे उम्मीदवारों को रोकत नही दिया जाता, अच्छे नेताओं को पद नहीं मिलते। निराश होकर घर बैठ जाते हैं । चुनाव में जब व्यक्तिगत पसंद चलती है तो उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी लेना चाहिए। पर दिल्ली का नेतृत्व इतना कमजोर रहा कि MP के दिग्गज नेताओं से सवाल जवाब तक नहीं कर  पाता था।इसी  के चलते प्रदेश में कांग्रेस।प्राइवेट लिमिटेड हो गई। आज के बदतर हालात इन्ही नेताओं की देन हैं। ये आज भी सुधरने तैयार नहीं। नए पदाधिकारियों को स्वतंत्रता नही देना चाहते। यही कारण है कि अब नई पीढ़ी यही चाहती है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस दिग्विजय और कमलनाथ से मुक्त हो जाए।

और हां, एक और कथित वरिष्ठ नेता तो खुद पार्टी छोड़ गए। उन्हें बिना एक भी चुनाव जीते चार बार राज्यसभा भेजा। केंद्रीय मंत्री बनाया। चार पांच।जिलों में टिकट दिए जाते थे। फिर भी पार्टी पर  आरोप लगा कर गए कि उन्हें सम्मान नही।मिल रहा। राजधानी भोपाल में कांग्रेस की दुर्गति करने वालों में ये वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह को खास भूमिका मानी जाती रही है। इमले बीच राजनीतिक प्रतिद्वद्विता के चलते ही भोपाल में बीजेपी को पांव पसारने का भरपूर मौका मिला।  अब कांग्रेस पचौरी मुक्त हो गई है, लेकिन सही लोगों को आगे भी मौका नहीं मिला तो बची खुची पार्टी भी ।खत्म हो जाएगी।

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