त्रिशूर. मोहन भागवत ने केरल के त्रिशूर में कहा कि RSS को पंजीकृत कराने की मांग राजनीतिक उद्देश्य से की जा रही है और इसका मकसद लोगों के मन में संदेह पैदा करना है। उनके अनुसार जिन संस्थाओं को सरकारी अनुदान या सरकारी सहायता की आवश्यकता होती है, वे आमतौर पर पंजीकरण कराती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है” और RSS का अस्तित्व सरकार के सामने स्पष्ट है, क्योंकि उस पर अतीत में दो बार प्रतिबंध भी लगाया जा चुका है।
यह विवाद मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कानूनी स्थिति, पारदर्शिता और पंजीकरण को लेकर उठे राजनीतिक सवालों से जुड़ा है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
Priyank Kharge ने RSS से उसकी कानूनी स्थिति, पंजीकरण, वित्तीय स्रोतों और पारदर्शिता को लेकर सवाल पूछे। उन्होंने संघ प्रमुख को पत्र लिखकर आठ बिंदुओं पर जानकारी मांगी और कहा कि 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर RSS को स्वयं को पंजीकृत कराना चाहिए तथा औपचारिक नियमों और संविधान के तहत काम करना चाहिए।
RSS की कानूनी स्थिति क्या है?
RSS की स्थापना 1925 में Keshav Baliram Hedgewar ने की थी। संघ स्वयं को एक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन मानता है। आम तौर पर यह माना जाता है कि RSS एक गैर-पंजीकृत संगठन के रूप में कार्य करता है और इसकी संरचना कई अन्य सामाजिक संस्थाओं से अलग है। हालांकि संघ से जुड़े अनेक संगठन अलग-अलग कानूनी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं।
समर्थकों और आलोचकों के तर्क
पंजीकरण के पक्ष में तर्क:
वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी।
फंडिंग और संगठनात्मक ढांचे की सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
बड़े सामाजिक प्रभाव वाले संगठन पर समान नियम लागू होंगे।
पंजीकरण के विरोध में तर्क:
RSS स्वयं को स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन मानता है, न कि सरकारी सहायता लेने वाली संस्था।
संगठन लगभग एक सदी से इसी स्वरूप में कार्य कर रहा है।
समर्थकों का कहना है कि पंजीकरण की मांग राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है।
RSS पर प्रतिबंध का संदर्भ
RSS पर स्वतंत्र भारत में दो बार प्रमुख प्रतिबंध लगाए गए थे:
Ban on RSS after Mahatma Gandhi assassination के बाद 1948 में।
The Emergency के दौरान 1975 में।
राजनीतिक महत्व
यह मुद्दा केवल पंजीकरण का नहीं, बल्कि भारत में बड़े सामाजिक और वैचारिक संगठनों की पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक भूमिका पर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है। एक ओर कांग्रेस और उसके कुछ नेता RSS से अधिक संस्थागत पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, वहीं RSS इसे राजनीतिक प्रेरित अभियान बता रहा है।
कुल मिलाकर, यह विवाद कानूनी से अधिक राजनीतिक और वैचारिक बहस का विषय बन गया है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ सामने हैं।
