भोपाल। कभी अनुशासनहीनता के आरोप में 6 साल के लिए निष्कासित हुए महेश केवट को अचानक मैदान में उतारकर बीजेपी ने कांग्रेस खेमे में क्रॉस वोटिंग का खौफ पैदा कर दिया है। उनका मुकाबला कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन से होगा।
यह सवाल फिलहाल पूरी तरह राजनीतिक गणित और विधायकों की वास्तविक निष्ठा पर निर्भर है। अभी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस के विधायक पाला बदलेंगे या नहीं, लेकिन बीजेपी द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को उतारना इस बात का संकेत जरूर है कि पार्टी को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।
कुछ प्रमुख बिंदु:
भारतीय जनता पार्टी ने यदि तीसरा उम्मीदवार उतारा है, तो आमतौर पर वह केवल प्रतीकात्मक लड़ाई नहीं लड़ना चाहेगी। ऐसी रणनीति अक्सर तब अपनाई जाती है जब पार्टी को क्रॉस-वोटिंग, निर्दलीय समर्थन या अन्य दलों के वोट मिलने की संभावना दिखाई देती है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि उसके सभी विधायक मतदान के समय एकजुट रहें।
कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की जीत का रास्ता तभी आसान रहेगा जब पार्टी का पूरा वोट बैंक सुरक्षित रहे।
राज्यसभा चुनाव में मतदान खुला होता है और पार्टी व्हिप जैसी व्यवस्था लागू नहीं होती। इसलिए राजनीतिक दबाव, व्यक्तिगत समीकरण और रणनीतिक मतदान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि कांग्रेस के पास वास्तव में केवल 5 वोटों का ही प्रभावी अंतर है, तो कुछ वोटों का इधर-उधर होना भी परिणाम बदल सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि विधायक पाला बदलेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बीजेपी ने तीसरा उम्मीदवार केवल सामाजिक-संदेश (ओबीसी/केवट समाज) के लिए उतारा है या उसके पास अतिरिक्त समर्थन के ठोस संकेत हैं। इसका जवाब 18 जून के मतदान और मतगणना में ही स्पष्ट होगा।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस चुनाव ने कांग्रेस की अपेक्षित “निर्विरोध” स्थिति को समाप्त कर दिया है और मुकाबले को पूरी तरह रोचक बना दिया है। अब सभी की नजरें कांग्रेस विधायकों की एकजुटता और बीजेपी की बैक-चैनल रणनीति पर रहेंगी।
