रश्मि दीक्षित
आज देश का आम नागरिक ठगा सा खड़ा है। एक लोकतांत्रिक देश में जब नागरिक का अपनी सर्वोच्च अदालत से भरोसा उठ जाए, तो उसकी मानसिक पीड़ा और कड़वाहट का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। जब न्याय के अंतिम दरवाज़े पर भी ताला लटका दिखे, तो यह आम इंसान किसके आगे अपनी गुहार लगाए, कहाँ जाकर अपना सिर पटके?
न्याय व्यवस्था के इस पतन को देखकर आज अंतरात्मा उद्वेलित है, क्षोभ से भरी है, और इस कदर आहत है कि ‘कोर्ट की अवमानना’ (कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट) जैसे डरावने शब्द भी अब बेमानी और बौने लगने लगे हैं। ऐसी न्याय प्रक्रिया पर लानत भेजने का मन करता है जहाँ न्याय होता हुआ दिखता ही नहीं – ना जानवरों के लिए, ना जंगलों के लिए, ना आदिवासियों के लिए, ना किसी गरीब तबके के लिए और ना ही किसी के अडिग सिद्धांतों के लिए। अन्याय का ऐसा नग्न नृत्य तो शायद अंग्रेज़ों के क्रूर शासनकाल ने भी इस देश को नहीं दिखाया होगा।
यह तीखा आक्रोश किसी राजनीतिक हार का विलाप नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो अपनी मूल गरिमा खो चुकी है। पिछले कुछ समय से हमारी न्यायपालिका ने खुद साबित कर दिया है कि उसका दर्जा अब केवल डिमोट होने लायक रह गया है। जिस न्यायपालिका का काम देश के संविधान की रक्षा करना था, क्या उसका काम अब सिर्फ एक ‘नगरपालिका’ बनकर रह गया है?
ऐसा लगता है कि स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर शहर के आवारा कुत्तों पर फैसले सुनाने के अलावा उसके पास कोई बड़ा संवैधानिक विज़न बचा ही नहीं है। जो उसका मूल काम था – नागरिकों के अधिकारों को बचाना और लोकतंत्र को ज़िंदा रखना – उसे वह न्यायसंगत तरीके से करने में पूरी तरह नाकाम रही है। जब बड़े और बुनियादी मुद्दों पर न्याय की उम्मीद दम तोड़ देती है, तब कोर्ट की चौखट सिर्फ एक प्रशासनिक दफ्तर जैसी लगने लगती है।
इसी खोखली व्यवस्था की ताज़ा शिकार बनी हैं मीनाक्षी नटराजन। उन्हें सिर्फ एक कांग्रेस नेता के संकुचित चश्मे से देखना उनके साथ और इस देश के मूल्यों के साथ घोर अन्याय होगा। वह आज के दौर के उन चुनिंदा, गिने-चुने और बचे हुए सच्चे गांधीवादी नेताओं में से एक हैं, जिनका पूरा जीवन सादगी, शुचिता और सिद्धांतों की मिसाल रहा है।
वह एक ऐसी महिला हैं जो राजनीति की कीचड़ में भी हम जैसी अनगिनत महिलाओं की ‘आइडल’ हैं, जो हमें सही रास्ते पर चलने का बल देती हैं, सीख देती हैं और इस व्यवस्था से लड़ने का हौसला देती हैं। लेकिन अफ़सोस, आज की न्याय व्यवस्था को इस सादगी और शुचिता से कोई सरोकार नहीं रह गया है। मिथ्या आरोप की आड़ लेकर एक बेदाग़ छवि को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया, जो बेहद शर्मनाक है।
मीनाक्षी नटराजन जैसी शख्सियत महज़ एक राजनेता नहीं, बल्कि भारत माँ का एक ऐसा अनमोल रत्न हैं जिन्हें हमें हर हाल में सहेजकर रखना होगा। उनके साथ हुआ यह अन्याय देश के हर उस नागरिक के गाल पर तमाचा है जो ईमानदारी की राजनीति में यकीन रखता है।
इस नाइंसाफी को देखकर ऐसा महसूस होता है मानो आज फिर किसी ‘गोडसे’ ने ‘गांधी’ की आत्मा पर प्रहार कर दिया हो, मानो फिर से सिद्धांतों की हत्या कर दी गई हो। लेकिन इस व्यवस्था को चलाने वालों को यह मुगालता छोड़ देना चाहिए कि देश सो रहा है। हम आज के तथाकथित ‘विकसित भारत’ के जागरूक और सचेत नागरिक हैं; हम इस देश में गांधी के विचारों और सिद्धांतों को इतनी आसानी से मरने नहीं देंगे।
अब समय आ गया है कि हम सब मूकदर्शक बनकर तमाशा देखना बंद करें। आखिर कब तक हम अन्याय की इस इंतेहा को चुपचाप सहते रहेंगे? मीनाक्षी नटराजन के हक में और इस देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए हम सबको एक सुर में आवाज़ उठानी होगी। अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
यह लड़ाई सिर्फ एक नेता के नामांकन की नहीं है, यह लड़ाई इस देश के उस आखिरी भरोसे को बचाने की है जो एक आम नागरिक न्यायपालिका पर करता है। उठिए, जागिए और इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज़ को इतनी बुलंद कीजिए कि सत्ता और न्याय के बंद गलियारों में बैठी बहरी व्यवस्था को हमारी चीखें सुनाई दें।
रश्मि दीक्षित की फेसबुक वाल से साभार