मोहब्बत, दर्द, तहज़ीब और इंसानी जज़्बात को लफ़्ज़ों की रूह देने वाला फ़नकार ख़ामोश हो गया, मगर उसके अशआर हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
अलीम बज़मी
उर्दू अदब अश्कबार है। ग़ज़ल की दुनिया का वह रौशन चराग़, जिसने मोहब्बत, जुदाई, इंसानी रिश्तों और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों को अपनी शायरी का हिस्सा बनाया, गुरुवार को ख़ामोश हो गया। पद्मश्री डॉ बशीर बद्र का 91 बरस की उम्र में इंतिक़ाल हो गया। ईद-उल-अज़हा के मुक़द्दस दिन उन्होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा। उनके इंतिक़ाल की ख़बर ने अदबी हल्क़ों, मुशायरों और उर्दू ज़ुबान से मोहब्बत करने वालों को गहरे सदमे में डाल दिया है।
वो सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एहसास की ऐसी आवाज़ थे, जिसने टूटे दिलों को तसल्ली दी, मोहब्बत को लफ़्ज़ दिए और इंसानियत को तहज़ीब सिखाई। उनकी शायरी में दर्द भी था, दुआ भी थी, तन्हाई भी थी और रिश्तों की गर्माहट भी। यही वजह है कि उनके अशआर सड़क से संसद तक, मुशायरों से महफ़िलों तक और आम इंसान के दिल से लेकर ख़ास लोगों की ज़ुबान तक गूंजते रहे।
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
यह महज़ एक शेर नहीं, बल्कि मोहब्बत की दुनिया का ऐसा एहसास बन गया, जिसे हर टूटे हुए दिल ने अपनी आवाज़ समझा।
तक़रीबन 14 बरस से वे डिमेंशिया की तकलीफ़ से गुज़र रहे थे। याददाश्त उनका साथ छोड़ती जा रही थी, मगर उनके अशआर आज भी लोगों की यादों में वैसे ही ज़िंदा हैं जैसे किसी रूहानी धुन की गूंज। उनकी अहलिया डॉ. राहत बद्र जब उनके कलाम गुनगुनाती थीं, तो उनके चेहरे पर एक मासूम मुस्कुराहट तैर जाती थी। कभी-कभी वे ख़ुद भी मिसरा पूरा कर देते थे। यह मंज़र बताता है कि शायर जिस्मानी तौर पर कमज़ोर हो सकता है, मगर उसका फ़न कभी बूढ़ा नहीं होता।
15 फ़रवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में पैदा हुए बशीर बद्र ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी। उनकी शोहरत का असल सफ़र उस वक़्त शुरू हुआ, जब मशहूर अदाकारा मीना कुमारीi ने उनका यह शेर अपने हाथों से लिखकर एक मैगज़ीन को दिया—
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
बस, इसके बाद बशीर बद्र उर्दू ग़ज़ल का ऐसा नाम बन गए, जिसे चाहने वाले मुल्क की सरहदों से बाहर तक फैल गए।
उनकी शायरी में सिर्फ़ इश्क़ नहीं था, बल्कि समाजी दर्द और इंसानी रिश्तों की नर्मी भी थी। मुल्क के बँटवारे, नफ़रत और सियासी तल्ख़ियों पर भी उन्होंने बड़ी नफ़ासत से लिखा—
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
1987 के मेरठ दंगों ने उनकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। उनका घर जला दिया गया। बरसों की यादें राख हो गईं। उस दर्द को उन्होंने यूँ बयान किया—
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
उस हादसे के बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया और यह शहर उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। वे मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के सदर भी रहे और अदबी हल्क़ों में हमेशा एहतराम की निगाह से देखे गए।
उनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी ख़ूबी यह रही कि उन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फ़ाज़ की कैद से आज़ाद किया। आसान ज़ुबान में गहरे जज़्बात बयान करना उनका फ़न था। यही वजह है कि उनका हर शेर सीधे दिल में उतर जाता था—
“जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।”
वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट थे। दिलचस्प बात यह रही कि जिस दौर में वे एमए कर रहे थे, उसी वक़्त उनके अपने अशआर यूनिवर्सिटी के सिलेबस में शामिल थे।
ज़िंदगी के शुरुआती दिनों में उन्होंने पुलिस की नौकरी भी की, मगर शायरी का जुनून उन्हें अदब की दुनिया में खींच लाया। तरक़्क़ी और ओहदों की चमक से दूर रहते हुए उन्होंने इंसान को उसकी अस्ल औक़ात भी याद दिलाई—
“बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
दरिया जहाँ समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता।”
बेटियों के बारे में उनका यह शेर आज भी मोहब्बत और तहज़ीब की मिसाल माना जाता है—
“वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियाँ न हों।”
डॉ बद्र को पद्मश्री से भी नवाज़ा गया। लेकिन उनकी असली पहचान कोई ओहदा या इनाम नहीं, बल्कि वह मोहब्बत थी जो लोगों ने उन्हें अपने दिलों में दी।
आज जब वह शख़्स ख़ामोश हुआ है, तो लगता है जैसे उर्दू ग़ज़ल का एक पूरा दौर ख़त्म हो गया हो। मगर सच यह है कि ऐसे फ़नकार मरते नहीं। वे अपने अशआर में, अपनी आवाज़ में, अपने एहसास में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
और शायद इसी लिए उनका यह शेर आज और भी ज़्यादा सच लगता है—
“शोहरत की बुलंदी भी पलभर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है।”
डॉ. बशीर बद्र चले गए, मगर उनकी शायरी उर्दू अदब की फ़िज़ाओं में हमेशा महकती रहेगी।
उर्दू ग़ज़ल का आफ़्ताब ग़ुरूब हुआ : डॉ. बशीर बद्र को ख़िराज-ए-अक़ीदत
