मीनाक्षी का चयन, कांग्रेस हाईकमान का संदेश- खेमेबाजी नहीं, पार्टी सर्वोपरि…!

संजय सक्सेना
कांग्रेस की खाली हो रही राज्यसभ सीट से पार्टी हाईकमान ने जिस तरह से पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का चयन कर उन्हें टिकट दिया है, उससे तमाम दिग्गज भौंचक्के रह गए हैं। लेकिन हाईकमान से साफ संदेश दिया है कि अब नेताओं को खेमेबाजी से बाज आ जाना चाहिए।
कांग्रेस ने जैसे ही राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए टिकट घोषित किए, प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में खलबली मच गई। जिसने कोई दावेदारी नहीं की, उसे टिकट मिल गया। कहा ये जा रहा है कि मीनाक्षी नटराजन राहुल- सोनिया की पसंद हैं। लेकिन शायद बहुत कम लोगों को सही जानकारी होगी कि मीनाक्षी इन नेताओं की खास पसंद क्यों हैं?
इसका जवाब बाद में, पहले बात करते हैं उन नेताओं की जिनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। असल में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की राज्यसभा की सीट खाली हुई तो दिग्गी राजा ने पहले ही कह दिया था कि वे दावेदारी नहीं करेंगे। शायद पार्टी नेतृत्व उन्हें संकेत दे चुका था। इसके चलते दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दावेदारी शुरू कर दी। वो राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली जाना चाह रहे थे। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व भी उन्हें मध्यप्रदेश से बाहर करना चाह रहा है, लेकिन दिल्ली में भी उनके लिए कोई भूमिका अभी तक तय नहीं हो सकी। और जहां तक मध्यप्रदेश का सवाल है तो पार्टी नेतृत्व यहां कांग्रेस की बर्बादी के लिए काफी हद तक उन्हें ही जिम्मेदार मानती है। माना जाता है कि उनकी जिद के चलते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़ी और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार चली गई। फिलहाल कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ की राजनीति जमाने का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं, लेकिन उनका गढ़ रहा छिंदवाड़ा ही उनके हाथ से पूरी तरह फिसलता दिखने लगा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी राज्यसभा के दावेदारों की सूची में थे। अध्यक्ष के तौर पर उनकी दावेदारी स्वाभाविक थी, लेकिन उन्होंने खुद को ही दावेदारी से अलग कर लिया था। वरिष्ठता में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा भी राज्यसभा के स्वाभाविक दावेदार माने जाते रहे हैं। देखा जाये तो अरुण यादव वर्तमान में प्रदेश के सबसे बड़े नेता हैँ और उनका बायो डाटा भी तगड़ा है, लेकिन वह भी कहीं न कहीं खेमे बाजी में उलझे रहे हैँ। CWC मेंबर कमलेश्वर पटेल भी दावेदार थे। हालांकि वो वर्तमान में सीधे राहुल गाँधी से जुड़ गये हैँ, लेकिन प्रदेश में फिलहाल उनका बहुत बड़ा जमीनी आधार नहीं है। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा भी सशक्त दावेदार रहे, पर उनके ऊपर कमलनाथ का हाथ रहा। कमलनाथ खेमे में इनकी कभी नम्बर दो पोजीशन थीं, नाथ सरकार ले दौरान उनका कार्यकाल संतोषजनक नहीं रहा। भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। विवादित बयानों का उन्हें महारथी कहा जाता है।
नाम और भी नेताओं के थे, लेकिन हाई कमान ने मीनाक्षी नटराजन को चुना क्योंकि वो सीधे पार्टी नेतृत्व की विश्वासनीय रही हैँ। संगठन ले कई पदों पर रहने के बाद पार्टी नेतृत्व देश भर में एक अभियान में जुटी रहीं और सक्रिय राजनीति से एक प्रकार से दूर रहीं। पद को लेकर उनका कहना था कि उन्हें केवल काम करना है, जो काम दिया जायेगा, ईमानदारी से करेंगी। किया भी। गुटबाजी से कभी उनका वास्ता नहीं रहा, न उन्होंने अपना क़ोई खेमा है बनाया।
जहाँ तक मध्यप्रदेश कांग्रेस की बात है तो यहाँ पार्टी में शुरू से ही ठेकेदारी प्रथा चलती आई है। यहां पार्टी के कार्यकर्ता कम होते हैं, किसी नेता के समर्थक ज्यादा। और जो समर्थक नहीं होते, उन्हें कोई पद या महत्व भी नहीं दिया जाता। कभी अर्जुन सिँह और शुक्ल खेमे रहे तो कभी दिग्विजय, कमलनाथ, सिंधिया, वोरा और पचौरी के खेमों में कांग्रेस बंटी रही। खेमे आज भी हैँ, लेकिन राहुल गाँधी इन्हें ख़त्म करना चाह रहे हैँ।
आज है खबर आई कि मीनाक्षी का विरोध भी शुरू हो गया है। एक भोपाल के नेता ने भी बयान दिया है, जिन्हें हारने के बर्फ भी दिग्विजय सिँह ने विधानसभा टिकट दिलाया, वो फिर हार गये। विरोध वो ही लोग कर रहे हैं, जिन्हें उनके नेता हवा दे रहे हैँ।





