Editorial
बेरोजगारी मुद्दा बने या ना बने समस्या तो विकराल है…!

भले ही बेरोजगारी इस चुनाव के प्रमुख मुद्दों में अपना स्थान नहीं बना पाया, लेकिन बेरोजगारी देश की बहुत बड़ी समस्या तो बनी हुई है। हाल में केंद्र सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक इस साल जनवरी से मार्च की तिमाही मे ओवरऑल बेरोजगारी की दर बढ़ गई है। राज्यवार देखें तो इस दौरान दिल्ली में बेरोजगारी की दर सबसे कम रही, लेकिन यह तुलनात्मक विश्लेषण है।
यह सर्वे 15 से 29 साल की उम्र के बीच के व्यक्ति पर किया गया था। पिरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) नाम की इस रिपोर्ट को केंद्र सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने जारी किया है। इसमें 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है। केंद्र सरकार के इस सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी दर की टॉप 5 पोजिशन में केरल के अलावा जम्मू और कश्मीर, तेलंगाना, राजस्थान और ओडिशा हैं। इस टॉप 5 सूची में बिहार जैसे राज्य का नाम गायब है, जबकि आप देश के किसी भी हिस्से में चले जाएं, वहां आपको बिहार का मजदूर दिख जाएगा।
इस रिपोर्ट की मानें तो आलोच्य अवधि के दौरान कुल मिला कर बेरोजगारी बढ़ी है। 15 से 29 साल की उम्र के बीच बेरोजगारी दर जनवरी-मार्च में 17 पर्सेंट थी। ये पिछली तिमाही के 16.5 पर्सेंट से ज्यादा है। हालांकि 2023 में जनवरी-मार्च के बीच बेरोजगारी दर थोड़ी ज्यादा 17.3 रेकॉर्ड की गई थी। सभी समूहों के लिए बेरोजगारी की दर 6.7 फीसदी थी जो कि पिछली तिमाही के 6.5 के मुकबाले ज्यादा है।
केंद्र सरकार की इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली, गुजरात और हरियाणा में बेरोजगारी की दर सिंगल डिजिट में रही। आलोच्य अवधि के दौरान दिल्ली में 3.1 फीसदी, गुजरात में 9 और हरियाणा में 9.5 फीसदी बेरोजगारी दर दर्ज की गई। बेरोजगारी की दर कर्नाटक में 11.5 और मध्यप्रदेश में 12.1 फीसदी रही।
कोरोना महामारी के बाद 15 से 29 साल की उम्र वालों के बीच बेरोजगारी की दर लगातार शीर्ष पर बनी हुई है, फिर भी इसमें कुछ सुधार हुआ है। इसकी वजह पॉलिसीमेकर्स द्वारा युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देना माना जा रहा है।
यह आंकड़ा राज्यों में महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर को भी दिखाता है। इसके मुताबिक आलोच्य अवधि के दौरान जम्मू और कश्मीर में 48.6 फीसदी, केरल में 46.6 फीसदी, उत्तराखंड में 39.4 फीसदी, तेलंगाना में 38.4 फीसदी और हिमाचल प्रदेश में 35.9 फीसदी महिलाएं बेरोजगारी की शिकार थीं। इस साल की पहली तिमाही में महिला बेरोजगारी दर 22.7 पर्सेंट रही, जो पिछली तिमाही के 22.9 फीसदी के मुकाबले 0.2 फीसदी ज्यादा है। पीएलएफएस बेरोजगारी, लेबर फोर्स की भागीदारी और लेबर पॉपुलेशन रेश्यो पर नजर रखता है। सर्वे में बेरोजगार उन्हें माना गया है जो पूरे सप्ताह काम मांगते रहे लेकिन उन्हें एक घंटे के भी लिए भी काम नहीं मिला।
इससे पहले इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन यानि आईएलओ ने इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट (आईएचडी) के साथ मिलकर ‘इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024’ जारी की  थी। इसके हिसाब से अगर भारत में 100 लोग बेरोजगार हैं, तो उसमें से 83 लोग युवा हैं। इसमें भी ज्यादातर युवा शिक्षित हैं।
आईएलओ की रिपोर्ट कहती देश के कुल बेरोजगार युवाओं में पढ़े-लिखे बेरोजगारों की संख्या भी 2000 के मुकाबले दोगुनी हुई है। 2000 में पढ़े-लिखे युवा बेरोजगारों की संख्या कुल युवा बेरोजगारों में 35.2 प्रतिशत थी। 2022 में ये बढक़र 65.7 प्रतिशत हो गई है। इसमें उन ही पढ़े-लिखे युवाओं को शामिल किया गया है, जिन्होंने कम से कम 10वीं तक की पढ़ाई पूरी की है। आईएलओ की रिपोर्ट में वेतन के बारे में भी काफी कुछ बताया गया है. रिपोर्ट के अनुसार देश में लोगों का वेतन ज्यादातर एक जैसा रहा है, या ये घटा है। नियमित श्रमिकों और स्वरोजगार वाले व्यक्तियों के वेतन में साल 2019 के बाद नकारात्मक प्रवृत्ति देखी गई है। इतना ही नहीं बिना स्किल वाले श्रमिकों को साल 2022 में न्यूनतम वेतन तक नहीं मिला है।
टेक्नोलॉजी से जुड़े बदलावों ने कौशल और रोजगार के प्रकारों की मांग को भी प्रभावित किया है। रिपोर्ट के अनुसार हाई और मीडियम स्किल वाली नौकरियों में युवाओं का बेहतर प्रेजेंटेशन है। हालांकि, इन क्षेत्रों में नौकरी की इनसिक्योरिटी अभी भी परेशानी का सबब बनी हुई है।
रिपोर्ट में भारत के युवाओं में बुनियादी डिजिटल लिटरेसी की कमी के बारे में बताया गया है। इस वजह से उनकी रोजगार की क्षमता में रुकावट आ रही है। 90त्न भारतीय युवा स्प्रेडशीट में मैथ्स के फॉर्मूला लगाने में असमर्थ हैं। 60 प्रतिशत युवा फाइलें कॉपी और पेस्ट नहीं कर सकते हैं। वहीं 75 प्रतिशत युवा किसी अटैचमेंट के साथ ईमेल भेजने में असमर्थ हैं।रिपोर्ट महिला श्रम बल भागीदारी की कम दर के साथ लेबर मार्केट में बढ़ते जेंडर गैप के बारे में भी बात की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक युवा महिलाओं, खासतौर पर हायर सेकेंडरी पास महिलाओं को रोजगार हासिल करने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
आईएलओ की रिपोर्ट को हम भले ही खारिज कर दें, लेकिन केंद्र सरकार की खुद की रिपोर्ट को तो मानना ही चाहिए। नजरअंदाज भले ही किया जा सकता है, क्योंकि इस मुद्दे पर सत्तापक्ष को वोट तो मिलने से रहे। विपक्ष ने जरूर इस चुनाव में भी बेरोजगारी को प्रमुख मुद्दों में जगह दी, लेकिन सत्तापक्ष ने लगातार इसे नकारने और जनता से दूर करने की कोशिश की। आम चुनाव में यह मुद्दा भले ही बहुत प्रभावी नहीं रहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि बेरोजगारी बहुत बड़ी समस्या है।
– संजय सक्सेना

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