लोकसभा चुनाव का आखिरी चरण सामने है और फिर अगले हफ्ते परिणाम भी आ जाएंगे। इस चुनाव के पहले तो छोड़ो, चुनाव के दौरान तक लोगों के दल बदलने का सिलसिला जारी रहा। और अब फिर तमाम नेता इस इंतजार में हैं कि कौन सी पार्टी या गठबंधन सत्ता में आए, और वे उसमें शामिल हों। पिछले एक साल में ही जितना दल बदल हुआ, इतना पहले कभी नहीं हुआ होगा, और अधिकांश लोग सत्तापक्ष के साथ ही गए।
असल में हमने दलबदल कानून तो बना दिया, लेकिन इसके बाद दलबदल रुक पाया हो, ऐसा कतई नहीं है। उलटे दलबदल के चक्कर में पार्टियां दलदल की तरह हो गई हैं। 2003 के बाद से, बड़े पैमाने पर दलबदलुओं के लिए उपलब्ध एकमात्र छूट परिच्छेद 4 के तहत विलय है। और उसी का फायदा उठाया जा रहा है। इसके अनुसार विभाजित होने वाले किसी भी गुट का किसी भी दल के साथ विलय या एक अलग समूह नहीं बनने के बावजूद, विभाजन और विलय की राजनीतिक जुगलबंदी ने अलग होने वाले विधायकों को महाराष्ट्र में अपात्रता से बचा लिया। इन हथकंडों ने दलबदल विरोधी कानून को बेमानी ही साबित कर दिया।
यह कोई नई बात नहीं है। एक कानून बनता है तो लोग उसकी तोड़ निकाल लेते हैं। इसी के तहत पिछले कुछ वर्षों में राजनेताओं ने दलबदल विरोधी कानून का फायदा उठाने के लिए नए-नए तरीके ईजाद किए हैं। दलबदल विरोधी कानून- या संविधान की दसवीं अनुसूची- 1985 में लागू किया गया था। कानून जिस उद्देश्य के लिए बनाया गया था, उसमें बहुत कम सफलता हासिल कर पाया है।
उलटे दसवीं अनुसूची ने उन समस्याओं को और विकट बना दिया, जिनका उसे समाधान करना था। उसने बड़े पैमाने पर दलबदल का मार्ग प्रशस्त किया। इसका मुख्य कारण राजनीतिक दलों में विभाजन और विलय को छूट दी गई थी।
इन छूटों ने वास्तव में कई तरीकों से दलबदल को और सुविधाजनक बना दिया है। 2003 में, परिच्छेद 3 के तहत विभाजन वाली छूट को हटा दिया गया था। हालांकि, विभाजन और विलय, इन दोनों ही अपवादों के संयुक्त उपयोग से दलबदल विरोधी कानून के क्रियान्वयन पर असर पड़ा।
लोकसभा और उत्तर प्रदेश-हरियाणा विधानसभा के स्पीकर्स द्वारा दिए गए निर्णयों के विश्लेषण से एक पैटर्न का पता चलता है, जहां दलबदल के कारण अपात्रता से बचने के लिए विधायकों द्वारा विभाजन और विलय की छूट का उपयोग बार-बार किया गया था। इसे मोटे तौर पर ‘विभाजन के बाद विलय’ कहा जा सकता है। विधायक-दल के एक-तिहाई सदस्यों का समूह बनाकर विभाजन की छूट का लाभ उठाया गया। फिर अलग हुए विधायकों के पूरे समूह का दूसरी पार्टी में विलय हो गया। कहीं स्पीकर प्रभावी हो सके, लेकिन कई बार राज्यपालों की भूमिका ही सवालों के घेरे में आ गई।
यह मानते हुए कि वे पूर्ण रूप से विलय करेंगे, उन्होंने किसी अन्य पार्टी के साथ वैध-विलय को लागू करने के लिए दो-तिहाई सदस्यों की आवश्यकता को आसानी से पूरा कर लिया। एक संदर्भ के अनुसार 1997 में यूपी के जनता दल विधायक राजाराम पांडे ने दो अन्य लोगों के साथ मिलकर जेडी (राजाराम) गुट बनाने के लिए पार्टी में विभाजन कराया। 2000 में जेडी (राजाराम) का लोजपा में विलय हो गया। 2002 में राजाराम पांडे ने लोजपा से अलग होकर लोजपा (राजाराम) गुट बना लिया। अंत में पांडे 2003 में सपा में शामिल हो गए।
ऐसा ही पैटर्न लोकसभा और हरियाणा विधानसभा में भी देखने को मिला। मार्च 1992 में लोकसभा सांसद भूपतिराजू विजयकुमार राजू ने तेलुगु देशम पार्टी से अलग होकर टीडीपी(वी) का गठन किया। कुछ ही महीनों के भीतर अगस्त 1992 में उन्होंने पूरे गुट का कांग्रेस संसदीय दल में विलय कर दिया। इसी तरह हरियाणा में करतार सिंह भड़ाना और 16 अन्य विधायकों ने 13 अगस्त 1999 को हरियाणा विकास पार्टी से अलग होकर एचवीपी (डेमोक्रेटिक) का गठन किया और 3 दिनों में हरियाणा लोकदल में विलय कर लिया।
यह बताता है कि कैसे विभाजन और विलय अक्सर तेजी से होते हैं, कभी-कभी तो एक ही दिन में भी। जैसे यूपी विधानसभा से मित्रसेन यादव ने 4 मार्च 1994 को सीपीआई से अलग होने का फैसला किया और उसी दिन सपा में विलय कर लिया। इन मामलों में विधायकों द्वारा कई बार पार्टी बदलने के बावजूद वे अपात्र घोषित नहीं हुए। महाराष्ट्र में दो अवसरों पर अपात्रता से बचने के लिए एक नया पैटर्न तैयार किया गया, जिसे ‘विभाजन के बाद विलय नहीं’ कहा जा सकता है। दोनों उदाहरणों में, एक समूह ने विधायक दल में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाया, अलग गुट बनाया, और बाद में अन्य दलों के साथ सरकार बना ली या सरकार में शामिल हो गए।
महाराष्ट्र के मामले में तो दलबदल कानून जैसे दर्शक दीर्घा में बैठकर अपने अस्तित्व पर पछता रहा था। कानून की जितनी धज्जियां यहां उड़ीं, शायद ही कहीं उड़ी हों। अब तो यह परंपरा सी हो गई है कि जिस पार्टी की केंद्र में सरकार है, वह राज्यपाल तक का उपयोग करने से नहीं चूक रही है। और राज्यपाल पार्टी के सक्रिय सदस्य होने का प्रमाण दे रहे हैं। अभी तो ताजा चुनाव और उसके परिणाम आ रहे हैं। इसके बाद कितना दलबदल होगा, नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोकतंत्र के नाम पर जो भी कुछ हो रहा है, वह लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप तो नहीं कहा जा सकता।
– संजय सक्सेना