Editorial
गर्मी, आग और हमारा भ्रष्ट – लापरवाह सिस्टम…!


इस बार गर्मी के तेवर कुछ ज्यादा ही तीखे हो रहे हैं। हर तरफ हाल बेहाल हैं। राजकोट के गेम जोन से लेकर दिल्ली के बेबी केयर सेंटर तक आग लगी हुई है। भोपाल में मंत्रालय से लेकर लोकायुक्त कार्यालय तक में आग लग चुकी है। और आग लगी है हमारे सिस्टम में भी और सरकारी नियम-कानूनों में भी..? वर्षों से बिना परमिशन चल रहे गेम ज़ोन की किसी ने सुध नहीं ली। अब कह रहे हैं ऐसे कई गेम ज़ोन हैं जो बिना परमिशन के चल रहे हैं। दिल्ली में तो एक साल में दर्जनों जगह आग लग चुकी है और उसमें कई लोगों की जान भी जा चुकी है। लेकिन सिस्टम की खामियां अभी तक सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं।
बेबी केयर की बात करें तो ये भी बिना लाइसेंस के चलाए जा रहे हैं। दिल्ली के जिस बेबी केयर में आग लगी वहाँ तो केवल पाँच बच्चों को रखा जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद इस सेंटर में 12 बच्चों को ठूँस रखा था। तेज और भीषण गर्मी ने तमाम लापरवाहियों को उजागर कर दिया। असल में सरकारें लोगों की इस तरह मौत का कोई न कोई दूसरा कारण ढूँढकर ले आती हैं। मानती नहीं हैं। चाहे भूख से किसी की मौत हुई हो या गर्मी से या ठंड से। लू लगने से अगर किसी की मौत हुई है तो इसे मानने में क्या दिक्कत है। अब लू किसी को सरकार ने जाकर तो लगाई नहीं है! नौकरशाही हमेशा से ऐसी ही है। उसे किसी बात को मानने में इतनी तकलीफ़ क्यों होती है? कोई नहीं जानता।
तभी तो आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। आग की घटनाओं के साथ ही जान-माल की हानि का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। हम सिस्टम को कोस रहे हैं और सिस्टम को जैसे सांप संूघ गया है। वह एक कदम आगे बढ़ता है, फिर दो कदम पीछे चला जाता है।
गर्मी की बात करें तो सोमवार को देश के 47 शहरों में 46 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान रहा। कहीं-कहीं तो पारा 47 डिग्री को भी पार कर गया। हालांकि मौसम विभाग ने अगले दो-तीन दिनों में हीटवेव से राहत मिलने की उम्मीद जताई है। लेकिन अफसोस कि लोगों की परेशानियां कम नहीं होने वाली, गर्मी सताती रहेगी तो आने वाला मॉनसून भी हमारी परीक्षा लेगा। कहीं बारिश से जलभराव होगा तो कहीं बाढ़ से स्थितियां खराब होंगी। मौसम की चरम घटनाएं यानी एक्सट्रीम वेदर हमें संकेत कर रहा है कि अब बदलने का समय आ चुका है। अपने शहरों को जलवायु के अनुकूल बनाने की पहल करनी होगी। लेकिन क्या हमारे शहरों में इसके लिए कोई ठोस पहल हो रही है?
एक संदर्भ के अनुसार वल्र्ड वेदर एट्रीब्यूशन रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल अप्रैल का महीना पूरी दुनिया के लिए सबसे गर्म रहा और लगभग सारे एशिया में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। राजस्थान के फलौदी में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, कई शहरों में पारा 45 तक गया। दरअसल ग्लोबल वॉर्मिंग अब 1.5 डिग्री सेल्सियस की लक्ष्मण रेखा पार करके 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती दिख रही है। इसलिए मौसम संबंधी दुर्घटनाएं बढ़ गई हैं। पिछले महीने यूएई के सबसे स्मार्ट शहर दुबई में भारी बारिश से फ्लैश फ्लड की स्थिति बन गई। उसके बाद मुंबई में बारिश ने जन-जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। मुम्बई तो हर साल ऐसी स्थितियों का सामना करती है, लेकिन इसका कोई ठोस उपाय हमारा योग्य सिस्टम नहीं खोज सका।
लगातार हो रही घटनाओं से यह तो स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ रहे प्रभावों के मद्देनजर ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट’ शहर आज की दुनिया की आवश्यकता हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व में बदलते मौसम के प्रभाव दुनिया भर में महसूस हो रहे हैं। दुबई और मुंबई में हुई बारिश की तबाही ने यह संकेत दिया है कि हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारियां मजबूत करने की जरूरत है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने देश के 6 शहरों- दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नै, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई को लेकर एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन के अनुसार यहां सिर्फ तापमान नहीं बढ़ रहा है, बल्कि हवा, जमीनी सतह का तापमान और नमी मिलकर इन शहरों को असहनीय गर्मी की तरफ धकेल रहे हैं। 41 डिग्री का हीट इंडेक्स लोगों के लिए घातक माना जाता है। जनवरी 2001 से अप्रैल 2024 के बीच इस अध्ययन के लिए तुलना की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान के इस ट्रेंड और जलवायु में लगातार बदलाव को देखते हुए दिन और रात के लिए हीट मैनेजमेंट प्लान बनाने की जरूरत है। जरूरी है कि लू के समय इमरजेंसी उपाय किए जाएं। इस प्रकोप को कम करने के लिए दीर्घकालीन योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। लेकिन इन पर काम आज से ही शुरू करना होगा। इसके लिए ग्रीन एरिया और वॉटरबॉडी बढ़ाने, बिल्डिंग का थर्मल कंफर्ट सुधारने, गाडिय़ों से निकलने वाली गर्मी को कम करने, एसी और उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।
सही बात तो यह है कि शहरों का मास्टर प्लान केवल आवासीय-व्यावसायिक दृष्टि से ही नहीं, जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भी बनाना होगा। दुर्भाग्य से हमारे शहरों के मास्टर प्लान राजनेता-अधिकारियों और जमीन माफियाओं के एक ऐसे तंत्र से प्रभावित होकर बनाए जाते हैं, जो केवल और केवल भ्रष्टाचार की नई कहानियां गढ़ता रहता है। अवैध कालोनियों के झुंड और स्मार्ट सिटी के नाम पर पुराने हरे-भरे वृक्षों और जंगलों को काटकर क्षतिपूर्ति के नाम पर झाड़  लगाए जा रहे हैं। कागजों पर हरियाली दिखाई जा रही है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के लिए शहर कैसे तैयार होंगे? सरकारों में इस मामले में थोड़ा सा ही सही, जिम्मेदारी का भाव आना चाहिए।
– संजय सक्सेना

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