Editorial
कांग्रेस: गिलास आधा भरा या आधा खाली..?

लोकसभा चुनाव में यदि भाजपा को इस बात की खुशी है कि भले ही उसे व्यक्तिगत तौर पर बहुमत नहीं मिला हो, लेकिन एनडीए की सरकार बन रही है। तो दूसरी तरफ विपक्ष के लिए भी यह संतोष की बात है कि एक तो उसने भाजपा के बढ़ते रथ को रोक ही नहीं दिया, थोड़ा पीछे खिसका दिया, वहीं दूसरी तरफ आगे की संभावनाएं भी खुल गईं। विपक्षी गठबंधन की बात करें तो फायदा सबको हुआ, लेकिन सबसे ज्यादा उम्मीद कांग्रेस के लिए जागी हैं। क्षेत्रीय दलों से लगभग उनकी ही शर्तों पर चुनाव में उतरी कांग्रेस की न केवल सीटें बढ़ी हैं, अपितु उसका जनाधार भी वापस आता दिख रहा है।
यही कारण है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से कांग्रेस में एक अलग तरह का आत्मविश्वास दिख रहा है, जो स्वाभाविक है। हालांकि बड़ा सवाल आज भी यही है कि इससे आगे की उसकी यात्रा कैसी होगी?  और इस सवाल का जवाब अब भी कई चुनौतियों से घिरा नजर आ रहा है। अगर सहयोगी दलों की जिद के चलते महाराष्ट्र की सांगली और बिहार की पूर्णिया सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लडऩे को मजबूर हुए विशाल पाटिल और पप्पू यादव की जीत को जोड़ लिया जाए तो कांग्रेस की सीट संख्या 101 पर पहुंच जाती है।
लेकिन बात सौ पार करने या न करने की उतनी नहीं है, जितनी कि इंडिया गठबंधन को बनाए रखने और आगे के चुनावों में अपने जनाधार की वापसी की है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनाव कांग्रेस के लिए ऐसा नतीजा लाया है, जिसमें यह तय करना मुश्किल है कि ग्लास आधा भरा है या आधा खाली है। कांग्रेस के साथ ही अन्य विपक्षी दलों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि इंडिया ब्लाक खुद बहुमत के करीब भले ही न पहुंचा हो, परंतु कम से कम बीजेपी को बहुमत से दूर रखने में तो वह कामयाब हो ही गया।
इस लिहाज से खुद कम सीटों पर लडऩे और संविधान की रक्षा के नारे पर सबसे ज्यादा जोर देने की कांग्रेस की रणनीति काम कर गई। लेकिन बतौर राजनीतिक दल उसे उन क्षेत्रों पर ध्यान देना ही होगा जहां उसका संगठनात्मक ढांचा लगातार कमजोर होता रहा है। शायद यही कारण है कि राहुल गांधी को इस बार रायबरेली से चुनाव लड़ाया गया और समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर उन्होंने बड़ी जीत भी हासिल कर ली। यूपी में अमेठी से गांधी परिवार के विश्वासपात्र के एल शर्मा को खड़ा करने की बात हो या अखिलेश को अधिक से अधिक स्पेस मुहैया कराने की, ये सब कदम कारगर साबित हुए। अब राहुल वायनाड सीट छोडऩे और रायबरेली के माध्यम से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस लाने के प्रयास कर सकते हैं। आगे यूपी के चुनाव में भी कांग्रेस समाजवादी पार्टी को ही आगे करके मैदान में आएगी, क्योंकि उसकी रणनीति अगले आम चुनाव में भाजपा को सत्ता से पूरी तरह बाहर करने की है।
देश के दूसरे महत्वपूर्ण और बड़े राज्य महाराष्ट्र की बात करें तो यहां की राजनीति पिछले पांच वर्षों में जिस तरह की उथल-पुथल और घालमेल से गुजरी, उसमें कांग्रेस का सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी के रूप में उभरना निश्चित रूप से काफी मायने रखता है। वहां तो इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं और बीजेपी की आक्रामकता के मुकाबले महाराष्ट्र की गरिमा का सवाल खड़ा करते हुए भी कांग्रेस के सामने अपने सपोर्ट बेस को सुरक्षित रखने की चुनौती होगी। लेकिन महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ आए उद्धव की शिवसेना को भी जिस तरह से चुनाव में शिंदे गुट से ज्यादा सफलता मिली है और पवार की एनसीपी ने अजीत पवार को जिस तरह से लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका दिया है, ऐसा लगता है कि यहां की राजनीति में महाविकास अघाड़ी की जोरदार वापसी हो सकती है। 
कांग्रेस के लिए एक बात अधिक मायने रखती है। वो ये कि विपक्षी गठबंधन में सबसे ज्यादा भाजपा की तरफ से हमले राहुल गांधी पर हुए और राहुल गांधी ने बड़ी समझदारी के साथ उनका न केवल सामना किया, अपितु ऐसे मुद्दे उठाए, जिनके चलते भाजपा को शायद पहली बार डिफेंसिव खेलना पड़ा। पीएम मोदी संविधान को लेकर रक्षात्मक हो गए। बढ़ी हुई दलित चेतना के साथ खड़े होते हुए जातिगत जनगणना जैसे मसले को आक्रामक ढंग से उठाना भी उत्तर भारत के एक बड़े तबके में कांग्रेस को लेकर उम्मीद जगा रहा है। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि संविधान और लोकतंत्र को कथित खतरों से बचाने वाली इस चुनावी लड़ाई के बाद कांग्रेस आगे की यात्रा के लिए खुद को कैसे तैयार करती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए की बैठक के दौरान संविधान की पुस्तक को जिस तरह से माथे से लगाया, उसे विशेष तौर पर राहुल गांधी की सफलता से ही जोडक़र देखा जा रहा है। अब चुनाव की समीक्षा हो रही है, तो कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक स्थिति को प्राथमिकता पर रखना होगा। खासकर ओडिशा और मध्यप्रदेश जैसे राज्य इस मामले में विशेष तवज्जो की मांग करते हैं। ध्यान रहे, देश में 215 सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला रहा, उनमें 70 प्रतिशत बीजेपी के पक्ष में गईं।
अगर कांग्रेस को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी को बराबरी की टक्कर देते हुए दिखना है तो उसे इस अंतर को पाटने पर ध्यान देना होगा। मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां कांग्रेस की दुर्गति यहां के नेताओं के कारण ही ज्यादा हुई। अब दिग्गज नेताओं की जगह जब युवा हाथों में कमान दी गई है, तो इन्हें पुराने नेटवर्क को फिर से जिंदा करना होगा और मैदानी तौर पर अपनी ताकत बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। इसके लिए पार्टी नेतृत्व को इन्हें न केवल खुली छूृट देनी होगी, अपितु सही मार्गदर्शन भी देते रहना होगा।
– संजय सक्सेना

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