Railway: पातालकोट एक्सप्रेस.. रोहतक से भोपाल..एक यादगार संघर्षपूर्ण रेल यात्रा
संजय सक्सेना
रविवार दिनांक 12 मई की सुबह कोई साढ़े आठ बजे हम रोहतक में होटल से निकल कर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। हरियाणा का बड़ा शहर होने के बावजूद रोहतक रेलवे स्टेशन किसी गांव के रेलवे स्टेशन की तरह ही है। चार प्लेटफार्म हैं, लेकिन एक भी ऐसा नहीं कि उसे ठीक भी कहा जा सके। खैर…। पातालकोट एक्सपे्रस से भोपाल के लिए रवाना होना था। उसका जो समय था, उससे कोई आधा घंटे लेट आई ट्रेन। यह तो सामान्य सी बात है। लेकिन जब ट्रेन आई तो कबीरदास की उलटवासी जैसा मामला हो गया। जहां ऐसी वाले कोच आने थे, वहां जनरल आ गए। प्लेटफार्म पर भगदड़ मच गई। लोग अपने -अपने कोच की ओर भागने लगे। अचानक ट्रेन चल पड़ी। ड्रायवर को क्या लेना देना। कहीं बीहड़ या जंगल में किसी ट्रेन को क्रास करने या अन्य कारण से कितनी भी देर तक ट्रेन रोकी जा सकती है, लेकिन यात्रियों की सुविधा के लिए एक मिनट भी नहीं। और हां, इस स्टेशन पर कुली तक उपलब्ध नहीं थे। और अधिकारी जो मौजूद थे, उनकी लापरवाही साफ दिख रही थी। उन्होंने ट्रेन के कोच का डिस्प्ले गलत किया, लेकिन कोई अपनी गलती मानने के लिए तैयार ही नहीं था।
सो जिसे जो डिब्बा सामने मिला, उसमें घुस लिया। यहां एक मुसीबत और सामने आई। किसी सत्संग से लौटने वाले धार्मिक लोग हर डिब्बे में घुसे हुए थे। उन्हें किसी से मतलब नहीं था। आखिर सत्संग से लौट रहे थे, कैसी संवेदनशीलता और कैसी शराफत? हम कोई तीन दर्जन लोग थे। महिलाओं और बुजुर्गों सहित। सामान भी चालीस नग से ज्यादा। सो जहां गुंजाइश मिली, चढ़ गए। टीटी साहब के दर्शन हुए, उसी भीड़ में। न लोग खुद बैठ पा रहे थे और न ही किसी को बैठने दे रहे थे। टीटी साहब को बताया गया तो बोले, डिब्बे उलटे लग गए। अब आप अगले स्टेशन पर बदल लेना। अगला स्टेशन आया। सामान लेकर हम और हमारे और साथी कुछ सामान लेकर दौड़े। लेकिन दो मिनट में एक फेरा हुआ। कुछ लोग मशक्कत करके अपने आरक्षित डिब्बे तक पहुंचने में सफल हुए। फिर अगला स्टेशन आया, कोच में अंदर ही अंदर जाने का रास्ता तो अराजक यात्रियों की भीड़ ने ही रोक रखा था। सो प्लेटफार्म पर उतर कर वहीं मशक्कत। यह स्टेशन शकूरबस्ती था, जो दिल्ली में है। टीटी ने कंट्रोल रूम फोन लगाकर अगले स्टेशन के लिए मदद मांगी। यह स्टेशन सफदरजंग था।
अब तीसरे स्टेशन पर जाकर एक-दो मिनट ज्यादा मिले, तब दो-तीन चक्कर लगाने के बाद हमारे सहयात्री और सामान अपने डिब्बों में पहुंच पाया। तीन डिब्बों में हम लोग बैठे। फिर काफी देर तक सामान और सहयात्रियों को गिन कर देखा गया। तब जाकर कुछ राहत मिली। लेकिन रेलवे की हालत देखिए, अपने ही स्टाफ के अनुरोध को नहीं सुना। सफदरजंग में भी कोई मदद मुहैया नहीं कराई गई। और यात्रियों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। और हां, हमने रोहतक स्टेशन से चलते समय ही रेल मंत्रालय को ट्वीट किया, लेकिन मजाल है कि कोई उत्तर मिलता। मदद तो दूर की बात। एक आरक्षित बोगी के दरवाजे के समीप खड़े होकर एक-डेढ़ घंटे से ज्यादा की यात्रा करनी पड़ी, जबकि हमारे पास एसी थ्री का टिकट था। यहां अनारक्षित टिकट वाले सत्संगी मजे से बैठे हुए थे। उन्हें कोई लेना-देना नहीं था कि किसे तकलीफ हो रही है।
और जिस पातालकोट ट्रेन में हम यात्रा कर रहे थे, उसकी हालत रेलवे विभाग जैसी ही थी। वंदे भारत ट्रेन चलाकर हमने वाहवाही तो लूटी, लेकिन बाकी ट्रेनों को लेकर रेल मंत्रालय की जैसे कोई जिम्मेदारी नहीं। इस ट्रेन में तो एसी कोच तक की हालत ठीक नहीं थी। वहां के शौचालय ऐसे थे, जैसे सामान्य डिब्बों में भी नहीं होने चाहिए। भोपाल तक पहुंचते-पहुंचते ट्रेन कोई पौन घंटे लेट थी, जो ज्यादा नहीं था।
तो यह एक संघर्षमय रेल यात्रा की बानगी है। ऐसी कई यात्राएं की हैं, जो यादगार रहीं, यह भी रहेगी। हम उस देश की बात कर रहे हैं, जहां सत्ता में बैठे लोग अपनी आलोचना सहन नहीं करते। हम वंदे भारत चला रहे हैं। स्टेशन और ट्रेन बेच रहे हैं। बुलेट ट्रेन की बात कर रहे हैं। दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था होने का गर्व है हमें। लेकिन आम आदमी के लिए सुविधाओं का दायरा बढ़ाने के लिए तैयार नहीं। क्योंकि, वो तो आंखें बंद करके वोट दे रहा है ना। उसे तो आपने फ्रीबीज योजनाओं के माध्यम से खरीद लिया है। उसे तो आपने अपने भ्रमजाल में उलझाकर हिप्नोटाइज कर लिया है। इस चुनाव के दौर में भी जो मतदाता अपने हित के मुद्दों को ही नहीं समझ पा रहा, मुद्दों पर वोट नहीं कर पा रहा हो, वह तो ऐसे ही संघर्ष का अधिकारी है। देश शायद सही दिशा में जा रहा है। हमें इसी दिशा की उम्मीद भी रही है।