Politics: शिकारी”…शिकार हो गए..!! संघ-संगठन के लिए आंख की किरकिरी बन चुकी थी मोदी-शाह की कार्यशैली

नितिन मोहन शर्मा
वे जो स्वयम को सबसे बड़ा शिकारी मानते-मनवाते थे, वे ही शिकार हो गए। वे अपनी जुबानी ” दुनाली” व मुद्दों के ” मचान” को लेकर बहुत भरोसेमंद थे कि यहां से बैठकर शिकार आसानी से हो जाएगा। जाल भी ऐसा ही बिछाया था कि शिकार आया..की फंसा। वे दूसरे के घर मे सेंध लगाने में माहिर थे लेकिन इससे बेखबर थे कि सेंध स्वयम के घर मे भी लग सकती हैं। वे जिन्हें लग रहा था कि खुला मैदान है, वे ही उस मैदान में ऐसे घिरा गए कि निकलने के रास्ते तंग हो गए। शिकारी जिस ” असलाह ” के साथ स्वयम को सबसे ताकतवर मान रहे थे, वो हाथ मे ही फुट गया। अब आहत मन से “आगा-पीछा” देख रहे है कि चूक कहां हुई?_

*बात है जुगलजोड़ी की। ये जोड़ी है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की। गुजरात से शुरू हुई इस जोड़ी की जुगलबंदी दिल्ली आकर सबकी आंख का तारा बन गई थी। लेकिन दस बरस में ही ये जुगलजोड़ी आंख की किरकिरी बन गई। उस संगठन की जिसने पलक पाँवड़े बिछाकर जोड़ी का स्वागत किया था। उस मातृसंस्था की भी जिसने तमाम वरीयता क्रम को दरकिनार कर जोड़ी को गुजरात से दिल्ली का रास्ता दिखाया। जोड़ी अपेक्षाओं पर अक्षरसः खरी भी उतरी। जयजयकार भी हुए। लेकिन इन्ही जय जयकारों में कब संगठन गौण हो गया, अहसास ही नही हुआ। कब व्यक्ति, संगठन से ऊपर हो गया, पता ही नहीं चला। यहां तक भी बेमन से ही स्वीकार कर लिया गया कि इतनी ” लिबर्टी” देश को चलाने के लिए जरूरी भी है लेकिन उस दल में व्यक्तिवाद ही सिरमौर हो जाएगा, किसे पता था? सिरमौर भी ऐसा कि फिर किसी की नही सुनना। जो जोड़ी ने तय कर लिया, वो ही “ब्रह्मवाक्य”।*

मोदी-शाह की जुगलजोड़ी कब देखते ही देखते उन आंखों की किरकिरी बन गई, जिन आंखों की वो तारा थी। ये किरकिरी व्यक्ति से नही, उसकी कार्यशैली से जुड़ी थी। ” अहमं ब्रह्मासि” का मनोभाव ऐसा समाया कि ये भी विस्मृत हो गया कि 2014 के पहले भी भाजपा थी। उसके नेता थे। संगठन था जो उस दौर की सबसे मजबूत सत्ता से दो दो हाथ कर यहां तक पार्टी को लेकर आया। ये भी विस्मृत हो गया कि जब सत्ता मिली तो ये वो ही दल और नेता रहे है जिसने उस दौर के सबसे मजबूत विपक्ष से भी सामना किया। पूरी लोकतांत्रिक गरिमा के साथ। लेकिन कभी भी व्यक्ति को संगठन पर हावी नही होने दिया। जबकि उस दौर में अटल-आडवाणी जैसे कालजयी नेताओ की एक लंबी फेहरिस्त रही, जिनका सम्मान पक्ष के साथ विपक्ष में भी समतुल्य रहा। लेकिन जुगलजोड़ी तो ये सब बिसरा के ” भाग्यविधाता”हो चली।

*आरएसएस तो व्यक्तिवाद को रत्तीभर पसन्द नही करता। तभी तो दुनिया के सबसे बड़े संगठन ने अपनी स्थापना काल से ही व्यक्ति की जगह ध्वज को अपना गुरु बनाया। वह आरएसएस अपनी आंख के सामने देख रहा था कि कैसे एक दो व्यक्ति सरकार के साथ संघ-संगठन पर भी हावी होते जा रहें हैं। लोकसभा चुनाव के पूर्व हुए हिंदी राज्यो के विधानसभा चुनाव में इसकी झलक साफ नजर आई। इसकी ताजा बानगी चलते लोकसभा चुनाव में दिखाई दी जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कह दिया कि अब भाजपा को आरएसएस की वैसी जरूरत नही, जैसी अटलजी के समय थी। यानी अब पार्टी ही इतनी मजबूत है कि वह सब कर गुज़रेगी। ये बयान की स्क्रिप्ट अकेले राष्ट्रीय अध्यक्ष की हो सकती थी क्या? इतनी हिमाक़त तो आज तक भाजपा में कोई करना तो दूर, सोच भी नही सकता। लेकिन आम चुनाव के बीच मातृसंस्था को ये भी सुनना पड़ा।बयान की गूंज लाखो लाख स्वयंसेवको के कानों तक भी पहुँची। तभी सोशल मीडिया पर एक पूर्व विधायक की पोस्ट बहुत वायरल हुई- आरएसएस वाकई कुछ नही करता, लेकिन स्वयंसेवक बहुत कुछ करता हैं।*

भाजपा का एक बड़ा धड़ा भी बेहद दुःखी हो चला था। इसमे ज्यादातर वे नेता थे जो अटल अडवाणी युग का अब भी प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे सब पुराने नेता भी इस जुगलजोड़ी के निशाने पर ही रहे। 2014 से शुरू हुआ ये सिलसिला 2024 तक आते आते इतना तेज हो गया कि कब किस नेता को अस्ताचल की तरफ रवाना कर देगी ये जोड़ी, कुछ खबर नही। फिर सुनवाई भी नही। किससे कहे? हालात इस कदर हो चले थे कि प्रधानमंत्री तो दूर, गृह मंत्री तक से मिलने में पसीने छूट जाते रहे। बड़े से बड़े और कितने ही वयोवृद्ध नेता हो, पीएम तो दूर, गृह मंत्री तक पहुँच दुष्कर हो चली। ये पहुँच उनके लिए आसान थी जो जोड़ी को पसन्द थे। हद तो तब हो गई जब उत्तरप्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की राह भी तंग करना शुरू हुई। पार्टी में ये बात आम हो चली कि यूपी के पुलिस मुखिया योगी की जगह शाह को रिपोर्ट करते थे। अगर ऐसा नही होता तो जेल से छूटते ही अरविंद केजरीवाल ये डंके की चोट पर कैसे कहते कि ये लोग जीते तो अगला शिकार योगी का करेंगे।

*अब ये ही शिकारी, शिकार करने से पहले स्वयम शिकार हो गए। सूत्रों की माने तो ये शिकार सबने मिलकर किया। सबने आपसी समझ के साथ बेलगाम कार्यशैली पर लगाम कसने की दिशा में काम किया। इस काम मे ” मोदी की ग्यारंटी” शब्द ने भी अहम भूमिका निभाई। भाजपा जिस मातृसंस्था की शाखा है, वहां उम्मीद थी मोदी की जगह भाजपा की ग्यारंटी गूंजे। लेकिन हुआ उलट। व्यक्ति, संघ-सगठन से बड़ा साबित कर दिया गया। नतीजा ये रहा कि मातृसंस्था ने इस सबसे अहम आम चुनाव से स्वयम को समय रहते दूर कर लिया। अन्यथा आज तक ऐसा नही हुआ कि आरएसएस का स्वयंसेवक आम चुनाव में देश के ज्वलन्त मुद्दे से सजे पत्रक के साथ घर घर दस्तक न दे। इस बार ये दस्तक नही हुई। न पत्रक नजर आए। यानी वो बात सही साबित हुई कि संघ कुछ नही करता लेकिन स्वयंसेवक बहुत कुछ करता हैं। उम्मीद है जुगलजोड़ी अब इस बात को समझे।*

सोशल मीडिया से साभार

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