Editorial
गठबंधन सरकार की बारी


देश में अब गठबंधन सरकार की बारी है। पीएम मोदी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा नहीं, एनडीए की सरकार होगी और इसके लिए सबकी निगाहें चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार पर टिक गई हैं। नायडू की टीडीपी ने 16 सीटें जीती हैं और नीतीश की जेडीयू ने 12। दोनों एनडीए के चुनाव-पूर्व गठबंधन का हिस्सा हैं, जिसने 293 सीटें जीती हैं। लेकिन नीतीश और चंद्रबाबू, दोनों ही बहुत विश्वसनीय नहीं हैं। उनके द्वारा सरकार बनने के पहले ही रखी गई शर्तें यह अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त हैं कि गठबंधन सरकार में भाजपा के एजेंडे की क्या हालत होगी?
एनडीए के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की औपचारिक घोषणा करने के बावजूद दोनों नेता अभी भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी इंडिया गठबंधन के निशाने पर हैं।
असल में इंडिया के पास 232 सीटें हैं। अगर नीतीश और नायडू दोनों एनडीए का साथ छोडक़र इंडिया में शामिल हो जाते हैं, तब भी विपक्षी गठबंधन के पास केवल 260 सीटें होंगी। 12 और निर्दलीय या छोटे दलों को साथ लाना मुश्किल होगा। भाजपा और मोदी दोनों आश्वस्त हैं, क्योंकि एनडीए 293 सीटों के साथ बेहतर स्थिति में है। इनमें से भाजपा के पास 240 सीटें हैं। उसके सहयोगियों के पास 53 सीटें हैं, 28 सीटें नायडू और नीतीश के पास हैं। अगर वे चले जाते हैं, तब भी एनडीए के पास 265 सीटें होंगी, जो पूर्ण बहुमत से 7 सीटें कम है।
भविष्य में नायडू या नीतीश के इंडिया में शामिल होने की संभावनाएं हो तो सकती हैं, लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसा कभी होगी नहीं और यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। सबसे पहली बात तो यह कि लोकसभा चुनाव के साथ ही हुए आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी एनडीए गठबंधन ने जीत हासिल की है। इसमें टीडीपी, भाजपा और पवन कल्याण की जेएसपी शामिल हैं।
आंध्र को खास तौर पर अपनी राजधानी अमरावती में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए कई हजार करोड़ रुपयों की जरूरत है। जगन मोहन रेड्डी के मुख्यमंत्रित्व काल में अमरावती के विकास को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। रेड्डी तीन शहरों की राजधानी वाले मॉडल के पक्षधर थे, जिसमें विशाखापत्तनम, कुरनूल और अमरावती प्रशासनिक जिम्मेदारियों को साझा करतीं। लेकिन 2022 में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप किया, जिससे मामला अधर में लटक गया। अमरावती को आंध्र की राजधानी बनाने का वादा नायडू ने विधानसभा चुनाव में किया था। लेकिन तेलंगाना के हैदराबाद से मुकाबला करने के लिए अमरावती में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बहुत बड़ी धनराशि की जरूरत होगी। और फिलहाला मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ही इसे मुहैया करा सकती है।
इस तरह नायडू का भविष्य अगले पांच सालों के लिए मोदी के साथ जुड़ा हुआ माना जा रहा है। वहीं नीतीश के भी एनडीए छोडऩे की संभावना इसलिए कम है, क्योंकि तब उन्हें पटना में मौजूदा भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार को भी तोडऩा होगा। भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडिया गुट नीतीश को प्रधानमंत्री पद की पेशकश करे, लेकिन बिहार के सीएम को पता है कि इंडिया के पास आंकड़े नहीं हैं। नायडू के बिना, नीतीश की 12 सीटें इंडिया को 244 तक ले जा सकती हैं, जो 272 के बहुमत से बहुत कम है। नायडू को मिलाकर भी 260 ही सीटें बनती हैं। ऐसे में नीतीश एक और बार पलटी मारने के बजाय बिहार के लिए अधिक केंद्रीय फंड की मांग करेंगे और केंद्र में जदयू के लिए प्रमुख पदों के लिए सौदेबाजी करते हुए अपने मुख्यमंत्री पद को बरकरार रखेंगे।
स्थिति बेहतर होने के बावजूद इंडिया गुट की मोदी को सत्ता से बेदखल करने की उम्मीदें प्रभावी रूप से खत्म हो गई हैं। मोदी 8 जून को अपने तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेंगे। सत्ता से दूर होने से संसद में विपक्ष की बेंच पर बैठने से इंडिया के नेताओं के बीच पुराने तनाव फिर से उभर सकते हैं। उधर 29 सीटें जीतने वाली ममता बनर्जी से राहुल गांधी के रिश्ते ठंडे हैं। 37 सीटों वाले अखिलेश यादव भी 2027 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ को हराने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं।
कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस ने 2014 में 44, 2019 में 52 और 2024 में 99 सीटें जीती हैं, इसके विपरीत भाजपा ने 2014 में 282, 2019 में 303 और 2024 में 240 सीटें जीतीं। इस बार उसका जीत का आंकड़ा घटा है और कांग्रेस की खास तौर पर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में स्थिति बहुत मजबूत हुई है। राजस्थान में भी गहलोत को मायनस कर दिया जाता है तो कांग्रेस और मजबूत हो जाएगी, ऐसा माना जा रहा है। राहुल गांधी पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा भाजपा के निशाने पर रहे। लेकिन उन्होंने बहुत ही समझदारी के साथ इंडिया गठबंधन को जोड़े रखने के लिए समझौते किए और सफलता भी मिली। यूपी में उन्होंने अखिलेश को आगे किया, इसका फायदा मिला। आगे भी यूपी में जब विधानसभा चुनाव होंगे, अखिलेश को ही आगे रखने की रणनीति बनाई जा रही है। कांग्रेस का पहला उद्देश्य भाजपा को हराना है।
अब पहले तो देखना होगा कि गठबंधन की एनडीए नीत सरकार कितनी स्थिर  रहती है? नीतीश और नायडू कितना दबाव बना पाते हैं? और भी…। साथ ही राजनीतिक विशेषज्ञों की नजर इस पर भी रहेंगी कि इंडिया गठबंधन आने वाले यूपी, महाराष्ट्र और बिहार राज्यों के चुनावों तक एकजुट रह पाता है या नहीं और रहता है तो यहां कितनी सफलता हासिल होती है?
– संजय सक्सेना

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