एग्जिट पोल के अनुमान एक बार फिर ढेर हो गए और लोकसभा चुनावों के परिणामों ने देश को एक बार फिर परिवर्तन के दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया। धर्म के नाम पर मिलने वाली सफलता के मुकाबले जाति आधारित राजनीति ने अपना कद फिर से बढ़ा लिया। नतीजों ने यह भी साबित कर दिया कि राजनीतिक पंडित कितने भी गुणा-गणित और विश्लेषण कर लें, कई बार वे जनता का मूड भांपने में गलती कर जाते हैं। इसके साथ ही मैनेजमेंट के आधार पर जीत के दावे भी जनता ने खोखले साबित कर दिए। यही नहीं, परिवर्तन का मार्ग एक बार फिर उत्तर प्रदेश ने ही प्रशस्त किया।
चुनावों में सबसे अधिक हैरान किया 80 सीटों वाले यूपी ने। जहां 2014 और 2019 में भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में इस राज्य ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, वहीं इस बार सोशल इंजीनियरिंग को नया आयाम दे दिया। यहां भाजपा और इंडिया गठबंधन में करीब-करीब बराबरी का मुकाबला दिखा, जिसकी उम्मीद बहुत कम थी।
देखा जाए तो बिहार, कर्नाटक और बंगाल में भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। महाराष्ट्र में सरकार गिराने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। इनमें से बिहार और कर्नाटक में पार्टी ने पिछले चुनावों में बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया था। इन चुनावों में कई रीजनल पार्टियों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। इसी तरह एनडीए के घटक दलों को भी नई ऑक्सिजन मिली है। अब उनकी बारगेनिंग पावर बढ़ गई है।
एग्जिट पोल्स में अकेले भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलता दिखाया गया था। अगर ऐसा होता तो नरेंद्र मोदी भारतीय इतिहास के इकलौते राजनेता बन जाते, जिनके नेतृत्व में हर जीत पहले से बड़ी होती गई। लेकिन, चुनाव परिणाम इकतरफा नहीं रहा। यही कारण है कि जहां एनडीए खुश है, वहीं इंडिया गठबंधन के पास भी जश्न मनाने के लिए आधार मिल गया है।
सीटों के लिहाज से भाजपा को नुकसान भले ही हुआ, लेकिन लगातार तीसरी बार वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। ओडिशा और तेलंगाना में पार्टी ने प्रदर्शन से सबको सरप्राइज किया। ओडिशा में लोकसभा ही नहीं, विधानसभा में भी पार्टी ने बीजू जनता दल का 24 साल से चला आ रहा वर्चस्व तोड़ा। ओडिशा की राजनीति में परिवर्तन का श्रेय भी भाजपा के खाते में गया। वहीं, गुजरात और मध्य प्रदेश भाजपा के गढ़ बने हुए हैं, यहां की सियासत में अब भी ब्रैंड मोदी सबसे बड़ा साबित हुआ।
पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पास इतनी भी सीटें नहीं थीं कि वह सदन में विपक्ष का आधिकारिक दर्जा हासिल कर सके। लेकिन, कांग्रेस ने वापसी कर जाहिर कर दिया कि देश में भाजपा को टक्कर देनी है तो उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इस चुनाव में कांग्रेस ने कई जगह गठबंधन में छोटे भाई की भूमिका निभाई। लेकिन, इंडिया को जितनी सीटें मिलीं, उससे कांग्रेस का कद तो बढ़ेगा ही, राहुल गांधी भी स्थापित नेताओं की कतार में शुमार हो गए हैं।
शरद पवार का राजनीतिक वारिस कौन और असली शिवसेना किसकी? क्या माया और ममता अब भी ताकतवर हैं? यह चुनाव ऐसे ही कई सवालों के साथ शुरू हुआ था। इनमें से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के बाकी हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव का पलड़ा भारी रहा, भाजपा को काफी नुकसान उठाना पड़ा।
आम चुनाव की जो सबसे बड़ी बात सामने आई, वो ये कि देश में एक बार फिर से हिंदुत्व की कमंडल राजनीति के सामने मंडल की जाति राजनीति समांनतर रूप से उभरी, जिसने बीजेपी को अपने दम पर बहुमत पाने से रोका। इस साल 22 जनवरी को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद जब बीजेपी हिंदुत्व लहर के सहारे तीसरे टर्म में भी 300 पार की उम्मीद कर रही थी, विपक्ष ने हिंदू बेल्ट में अपनी मंडल की सोशल इंजीनयरिंग की बदौलत उस लहर को रोक दिया। एनडीए के हिंदुत्व को विपक्ष ने जातीय समीकरण से काउंटर करने की कोशिश की। और तो और जिस अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की गई, उस क्षेत्र में ही भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपनी खोई हुई अमेठी और रायबरेली को फिर से पाने में सफलता हासिल कर ली। राहुल गांधी ने रायबरेली से उम्मीद से कहीं अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की, वहीं वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर कम होना भाजपा के लिए चिंता का कारण बन गया है। यूपी में कई केंद्रीय मंत्री भी इस बार खेत रहे, तो सोशल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ के रूप में उभरे अखिलेश यादव ने सपा को फिर से मजबूत स्थिति में ला दिया। हां, बसपा अवश्य रसातल की ओर जाती दिख रही है।
यह एक तरह से 90 के दशक की पुनरावृत्ति हो गई जब राम मंदिर आंदोलन की बदौलत उभरी बीजेपी को रोकने में मंडल आंदोलन सफल हुआ था। दरअसल हिंदी पट्टी में सालों से सवर्णों के हाथों में सत्ता रहने के बाद यह नब्बे के दशक में पिछड़ों के बीच हस्तांतरित हुई थी। 90 के दशक में कमंडल से पहले मंडल आया था। पिछड़ों को आरक्षण देने वाले मंडल कमीशन की सिफारिश लागू होने के बाद देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।
इस बार भी कहीं न कहीं नरेन्द्र मोदी, योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं के शीर्ष काल में अखिलेश, तेजस्वी जैसे नेताओं ने सोशल इंजीनियरिंग की। टिकट देने में यही रणनीति अपनाई। उसका लाभ भी दिखा। और राहुल गांधी ने संविधान का जिस तरह से मुद्दा उठाया, उसका फायदा भी कहीं न कहीं मिला। इसके साथ ही यह भी माना जा रहा है कि राहुल गांधी को पदयात्राओं का भी इस बार लाभ मिल गया है।
सही मायने में ये परिणाम भाजपा के लिए चिंतन का विषय हैं, तो कांगे्रस को भी जो सफलता मिली है, उसमें बहुत खुश होने की आवश्यकता नहीं है। सही अर्थों में देखा जाए तो कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से मजबूत होने की जरूरत है। राजस्थान में गहलोत और मध्यप्रदेश में भी दिग्गज नेताओं को पूरी तरह से रिटायर करने का वक्त आ गया लगता है। इनके कारण कांग्रेस समझौता और समर्पण की राजनीति करने लगी थी। जब नेता समझौता कर लेते हैं तो कार्यकर्ता क्या करेगा? और जब संगठन नहीं होता, तो जनता भी आंखें बंद करके वोट देने लगती है। एमपी में कांग्रेस को विकल्प के रूप में उभरना ही होगा।
– संजय सक्सेना