सुप्रीम कोर्ट का फैसला: आरटीआई के दायरे में रहेगा एमपी लोकायुक्त का SPE

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया। इस अधिसूचना के जरिए लोकायुक्त के स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि SPE कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं है, इसलिए इसे RTI से छूट नहीं दी जा सकती। यह अधिसूचना कानून के विपरीत और ज्यादा पाई गई।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की बेंच ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त भ्रष्टाचार और लोक सेवकों से जुड़े मामलों की जांच करते हैं। SPE इन्हीं मामलों में सहायता करता है।
1981 के मध्य प्रदेश लोकायुक्त कानून के तहत उन्हें खुफिया या सुरक्षा संबंधी जांच का अधिकार नहीं है। इसलिए SPE को इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी संगठन नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार Section 24(4) RTI Act के तहत छूट दे सकती है, लेकिन केवल वास्तविक इंटेलिजेंस/सिक्योरिटी संगठनों को। SPE उस श्रेणी में नहीं आता।
यह मामला सूचना के अधिकार (RTI) और भ्रष्टाचार मामलों की जांच करने वाली एजेंसियों की जवाबदेही से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला है। 15 जून 2026 को दिए गए अपने निर्णय में Supreme Court of India ने मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस इस्टेबलिशमेंट (SPE) को RTI से छूट देने वाली राज्य सरकार की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को अवैध ठहराया और उसे निरस्त कर दिया।
मामला क्या था?
कटनी के तत्कालीन थाना प्रभारी (टीआई) कामता प्रसाद मिश्रा के खिलाफ 2017 में रिश्वतखोरी का ट्रैप केस दर्ज हुआ था। जांच के बाद 2020 में अभियोजन स्वीकृति (Sanction for Prosecution) मिली। इसके बाद मिश्रा ने RTI के तहत अभियोजन स्वीकृति से संबंधित फाइल नोटिंग, पत्राचार और अन्य दस्तावेज मांगे।
SPE ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि 2011 की अधिसूचना के तहत उसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) से छूट प्राप्त है। बाद में Madhya Pradesh State Information Commission ने भी उनकी अपील खारिज कर दी।
हाई कोर्ट का फैसला
दिसंबर 2021 में Madhya Pradesh High Court ने SPE के आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए। इसके खिलाफ SPE सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत केवल ऐसे संगठनों को छूट दी जा सकती है जो वास्तव में “इंटेलिजेंस” या “सिक्योरिटी” संगठन हों।
अदालत ने कहा कि:
SPE का गठन भ्रष्टाचार और लोक सेवकों से जुड़े अपराधों की जांच के लिए हुआ है।
इसका काम खुफिया जानकारी जुटाना, राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा या आतंकवाद-रोधी गतिविधियां नहीं है।
इसलिए इसे उन संगठनों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जिन्हें RTI से पूर्ण छूट प्राप्त है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि SPE कोई इंटेलिजेंस या सुरक्षा संगठन है। परिणामस्वरूप 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को कानून के विपरीत मानते हुए रद्द कर दिया गया।
इस निर्णय के बाद:
मध्य प्रदेश SPE RTI से स्वतः मुक्त संस्था नहीं रहेगी।
जांच और अभियोजन स्वीकृति जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी सूचनाओं पर RTI के तहत जवाब देना पड़ सकता है।
भ्रष्टाचार-निरोधक एजेंसियों की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
राज्य सरकारें केवल अधिसूचना जारी करके किसी जांच एजेंसी को “इंटेलिजेंस संगठन” घोषित कर RTI से बाहर नहीं कर सकेंगी।




