नई दिल्ली। डॉलर के प्रवाह को भारत की ओर आकर्षित करने और रुपये को स्थिरता देने के लिए सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। शुक्रवार को जारी किए गए एक अध्यादेश के जरिए सरकार ने आयकर अधिनियम में बदलाव करते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सैक्स) में किए गए निवेश पर लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। इस बड़े फैसले का मुख्य उद्देश्य लंबे समय तक टिकने वाली पूंजी को भारतीय बाजार में आकर्षित करना है, क्योंकि इन सरकारी ऋण साधनों की अवधि काफी लंबी होती है।
इस नए अध्यादेश से पहले विदेशी संस्थागत निवेशकों को इक्विटी और ऋण (डेट) निवेश से होने वाले मुनाफे पर 12.5 प्रतिशत का लंबी अवधि का पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर चुकाना पड़ता था, जिसे जुलाई 2024 के बजट में 10 प्रतिशत से बढ़ाकर लागू किया गया था। कर छूट का यह फैसला ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में आया है जब भू-राजनीतिक तनाव के कारण विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक शेयर बाजार से 2.6 लाख करोड़ रुपये की भारी रकम निकाल ली है। यह आंकड़ा पूरे 2025 में निकाले गए 1.66 लाख करोड़ रुपये से काफी अधिक है, और केवल जून के पहले तीन दिनों में ही विदेशी निवेशकों ने 34,000 करोड़ रुपये की निकासी कर ली है।
रुपये की ऐतिहासिक गिरावट और गहराता दबाव
विदेशी फंड की इस भारी निकासी, महंगे कच्चे तेल, बढ़ते व्यापार घाटे और अमेरिकी व्यापार शुल्क (अमेरिकी टैरिफ) के कारण भारतीय मुद्रा पर भारी दबाव पड़ा है। 20 मई 2026 को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था। 28 फरवरी को ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये में लगभग 6 प्रतिशत और इस पूरे साल (2026) में अब तक कुल सात प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। कभी एशिया की सबसे स्थिर मुद्राओं में गिना जाने वाला भारतीय रुपया अब उभरते बाजारों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गया है।
विदेशी निवेशकों को बड़ी राहत, सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ से मिली छूट
