मुख्यमंत्री यादव के खिलाफ  कागज जुटाए जा रहे थे , एडीजी इंटेलिजेंस को भनक तक नहीं  लगी!

मध्यप्रदेश के प्रशासनिक क्षेत्र में 7-8 सालों में यह दूसरा बड़ा अवसर है जब एडीजी इन्टेलिजेंस के कथित रूप से अक्षम होने से राज्य के मुख्यमंत्री सीधे तौर पर मुश्किल में आए हों।  याद कीजिए-2020 को , जब सत्तारूढ़ कांग्रेस के सिंधिया समर्थक विधायक एकाएक अपने मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ न केवल बागी हो गए  बल्कि अज्ञातवास में चले गए । इतनी बड़ी मुहिम एक दिन में नहीं हुई होगी। गुपचुप रूप से  एक-दूसरे से मुलाकात और आगे की रणनीति पर काम चल रहा होगा। यदि तब के मुख्यमंत्री  कमलनाथ को समय रहते यानी अपने खिलाफ षडयंत्र की शुरूआत  में ही उन्हें सूचनाएं मिलतीं तो शायद वह ‘डेमेज कंट्रोल ‘ कर सकते थे , अपनी कुर्सी बचा सकते थे।
इसी प्रकार कल के इण्डियन एक्सप्रेस में डेढ़ पेज की खबर छपी कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिजन ने उज्जैन में उन स्थानों पर पहले से बड़ी तादात में जमीन खरीदीं, जहां बाद में सरकारी सड़कें , अन्य सरकारी योजनाएं आने वालीं थीं। जब जमीन खरीदीं , सस्ती थीं, सरकारी योजनाएं आने के बाद बहुत महंगी हो गईं। अखबार के मुताबिक  मोहन यादव के मुख्यमंत्री होने का लाभ मुख्यमंत्री के परिजन ने उठाया। मध्यप्रदेश कांग्रेस को भी मुख्यमंत्री यादव के खिलाफ बड़ा मुद्दा मिल गया। पटवारी और उमंग सिंगार ने मुख्यमंत्री यादव व उनके  परिजन पर जमीन घोटाले के आरोप लगाए। सुप्रीम कोर्ट के जज से जांच से मांग की।
मुख्यमंत्री यादव ने अभी तक इस पर कुछ नहीं बोला है। उनके परिजन ने भी कुछ नहीं बोला है। उनके परिजन ने भी कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल ने मुख्यमंत्री यादव का बचाव कर कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद यादव ने ,उनकी पत्नी ने , पुत्र ने कोई नई जमीन नहीं खरीदी है। भाजपा अध्यक्ष के मुताबिक मोहन यादव की पुत्रवधु  ने जरूर 10 एकड़ जमीन खरीदी है। अन्य परिजन जो व्यवसाय कर रहे हैं, उससे मोहन यादव को नहीं जोड़ा जा सकता।
वैसे ,मोहन यादव व उनके परिजन (चाचा, भाई, बहन) बहुत पहले से जमीन के व्यवसाय  में हैं।
इण्डियन एक्सप्रेस की खबर  से मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता । उन्होंने  या उनके परिजन ने पैसे दिए और जमीन खरीदी। इसमें सरकारी नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
लेकिन, प्रश्न नैतिकता का है।  आप मुख्यमंत्री हैं और आपके मुख्यमंत्री कार्यकाल में आपसे जुड़े परिजन की सम्पत्ति कई गुना बढ़ रही है, तो सवाल तो  खड़े होंगे ही ।
खेैर ! एक और सोचने की बात है कि मुख्यमंत्री यादव के , उनके परिजन के जमीन दस्तावेज अखबार के लोग या अन्य लोग सरकारी कार्यालय में तलाशते रहे , बटोरते रहे , एक तरह से साक्ष्य इकठ्ठा करते रहे और राज्य की खुफिया  पुलिस को पता तक नहीं चला।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक(एडीजीपी) स्तर का वरिष्ठ आईपीएस अफसर जिसे एडीजी इंटेलिजेंस कहते हैं, मुख्यमंत्री के लिए सीधे खुफिया खबरें जुटाता है। यानी एडीजी इंटेलिजेंस  का मुख्य काम ही है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ ,उसकी सरकार के खिलाफ कहीं कोई षडयंत्र-विरोधी मुहिम हो रही हो , होने वाली हो, उसका पता लगाना । इसके लिए  हर जिले में इंटेलिजेंस पुलिस तैनात रहती है।
संभवत: मुख्यमंत्री यादव को अपने खिलाफ गुपचुप  मुहिम की खबर मालूम नहीं पड़ी या हो सकता है मुख्यमंत्री को हर सुबह रिपोर्ट करने वाले एडीजी इंटेलिजेंस ने उन्हें आगाह किया हो  , लेकिन मुख्यमंत्री ने  हलके में लिया हो।
अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब व्यक्ति के  अच्छे दिन चल रहे होते हैं , वह ज्यादा सतर्कता नहीं बरतता।
यहां यह समझाइश देने का मकसद नहीं है कि समय रहते अखबार को मैनेज कर सकते थे ; बल्कि यह है कि एडीजी इंटेलिजेंस को जो गुपचुप सूचनाएं  मिलतीं ;  उन आधार पर मुख्यमंत्री पहले से ही मीडिया को अपने हिसाब से बताकर अमूक अखबार के होने वाले धमाके को समय रहते फुस्स कर सकते थे।
मुख्यमंत्री कह सकते थे कि मेरे खिलाफ कुछ लोग  षडयंत्र कर रहे हैं।
बहरआल ,  मध्यप्रदेश की खुफिया पुलिस को स्वयं भी मनन करने की जरूरत है कि मुख्यमंत्री को समय रहते सतर्क रखने की जिम्मेदारी उसके ऊपर है, इसमें  वह लगातार असफल क्यों हो रही है?
प्रदीप मांढरे
सम्पादक
ग्वालियर हलचल सान्ध्य दैनिक
फेसबुक से साभार

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