45 हजार करोड़ के केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट विवाद में घिरी, कानूनी और पर्यावरणीय सवाल उठे, फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तें अधूरी…!

भोपाल। देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट एक बार फिर कानूनी और पर्यावरणीय विवादों में घिर गया है। सरकारी दस्तावेजों और परियोजना से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया गया है कि फॉरेस्ट क्लीयरेंस की कई अनिवार्य शर्तों का समय पर पालन नहीं हुआ, जबकि परियोजना का निर्माण कार्य जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मंजूरी की शर्तें पूरी नहीं हुई हैं तो परियोजना की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में सरकार या वन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पन्ना टाइगर रिजर्व पर बड़ा असर
केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बनने वाले दौधन बांध से पन्ना टाइगर रिजर्व का 6,000 हेक्टेयर से अधिक कोर वन क्षेत्र जलमग्न होने का अनुमान है। इसी कारण परियोजना को मई 2017 में स्टेज-1 और अक्टूबर 2023 में स्टेज-2 फॉरेस्ट क्लीयरेंस दी गई थी। दोनों मंजूरियों में पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास से जुड़ी कई अनिवार्य शर्तें शामिल थीं।
प्रमुख शर्तों के पालन पर सवाल
दस्तावेजों के अनुसार, क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिए चिन्हित 6,809 हेक्टेयर गैर-वन भूमि को वन विभाग को सौंपकर आरक्षित वन घोषित करना था। हालांकि, समीक्षा बैठक में बताया गया कि रिकॉर्ड में हस्तांतरण होने के बावजूद वन विभाग को अब तक कई क्षेत्रों का भौतिक कब्जा नहीं मिला है। इसकी मुख्य वजह प्रभावित परिवारों का अधूरा पुनर्वास बताया गया है।
इसी तरह फॉरेस्ट क्लीयरेंस में मुख्य वन क्षेत्र के भीतर पावर प्लांट नहीं बनाने की शर्त रखी गई थी, लेकिन परियोजना क्षेत्र में 78 मेगावाट क्षमता के पावर प्लांट के प्रस्ताव पर चर्चा होने का दावा किया गया है।
दस्तावेजों में यह भी सामने आया कि परियोजना क्षेत्र के पेड़ों की नई गिनती कराने की अनिवार्य शर्त का पालन नहीं हुआ। पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने भी नई गणना नहीं होने की पुष्टि की है।
NTCA और CEC की सिफारिशों पर भी प्रश्न
फॉरेस्ट क्लीयरेंस के अनुसार, नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA), राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL), सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन अनिवार्य था। उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि इन संस्थाओं की कई महत्वपूर्ण सिफारिशों का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ।
पुनर्वास अब भी अधूरा
स्टेज-2 फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों के अनुसार, मंजूरी के एक वर्ष के भीतर प्रभावित राजस्व गांव वन विभाग को सौंपे जाने थे। इसके लिए सभी प्रभावित परिवारों का पुनर्वास और मुआवजा प्रक्रिया पूरी होना जरूरी था। जिला प्रशासन के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पुनर्वास और मुआवजा वितरण अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, जिससे कई गांवों में विरोध भी देखने को मिला है।
अनुमति समाप्त होने के प्रावधान पर बहस
फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्त-43 में उल्लेख है कि निर्धारित समयसीमा में आवश्यक शर्तों का पालन नहीं होने पर मंजूरी समाप्त मानी जा सकती है। इसी आधार पर पर्यावरण विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर का दावा है कि परियोजना की वैधानिक स्थिति पर गंभीर कानूनी प्रश्न खड़े होते हैं। उनका यह भी कहना है कि केन नदी के प्राकृतिक प्रवाह और डाउनस्ट्रीम जल आवश्यकता का वैज्ञानिक आकलन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
पर्यावरणीय स्वीकृति पर भी सवाल
परियोजना को अगस्त 2017 में मिली पर्यावरणीय स्वीकृति की पहली शर्त के अनुसार निर्माण शुरू होने से पहले सभी प्रभावित परिवारों का 100 प्रतिशत पुनर्वास, पुनर्स्थापना और मुआवजा वितरण पूरा होना चाहिए था। उपलब्ध जिला स्तरीय आंकड़ों के अनुसार यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
हालांकि, इन सभी दावों पर अब तक केंद्र सरकार, परियोजना प्राधिकरण या वन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में परियोजना की कानूनी स्थिति और शर्तों के अनुपालन को लेकर अंतिम निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकरणों या न्यायालयों के स्तर पर ही तय होगा।

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Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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