नई दिल्ली| “अब समय आ गया है जब हमें तेल के लिए दूसरों का मुंह ताकना बंद करना होगा। आज भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल और आधी से ज्यादा गैस विदेशों से खरीदता है। जब भी दुनिया के किसी कोने में बम फटता है या तनाव होता है, उसका सीधा असर भारत की रसोई और जेब पर पड़ता है। अब हमें कागजी कार्रवाई छोड़कर काम शुरू करना होगा।”
ये कहना है- वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल (Anil Agarwal Vedanta) का, जिन्होंने मिडिल ईस्ट तनाव और होर्मुज संकट को लेकर कड़ी चेतावनी (Anil Agarwal oil warning) दी। उनका मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने भारत की नस पर हाथ रख दिया है।
हम संसाधनों के गरीब नहीं, बस खोजने में पीछे’
अनिल अग्रवाल का साफ कहना है कि भारत तेल और गैस के मामले में गरीब देश नहीं है। कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन से बाहर निकालने की इच्छाशक्ति और तकनीक की है। अनिल अग्रवाल ने कहा कि,भारत की धरती के नीचे करीब 300 अरब बैरल तेल के बराबर का खजाना दबा हो सकता है। समस्या यह है कि हमने अभी तक अपने ही घर के संसाधनों को ठीक से ढूंढा ही नहीं है। निवेश की कमी और पुरानी तकनीकों ने हमें विदेशी आयात के जाल में फंसाए रखा है।”
अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम
अग्रवाल इस निर्भरता को महज एक समस्या नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘स्ट्रक्चरल रिस्क’ यानी एक बुनियादी खतरा मानते हैं। ग्लोबल मार्केट में जब भी तेल के दाम बढ़ते हैं, भारत में हवाई जहाज के ईंधन से लेकर एलपीजी सिलेंडर तक सब महंगा हो जाता है। अग्रवाल का तर्क है कि ऊर्जा सुरक्षा को अब हमें सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि देश की रणनीतिक प्राथमिकता (Strategic Priority) मानना चाहिए। हम कब तक बाहरी झटकों पर सिर्फ रिएक्शन देते रहेंगे? हमें खुद को इतना सुरक्षित करना होगा कि दुनिया के झगड़ों से हमारी तरक्की न रुके।
कागजी कार्रवाई छोड़ो, काम शुरू करो’
अनिल अग्रवाल ने सरकार को एक दो-टूक सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि, “पहले काम शुरू करो, सुधार बाद में होते रहेंगे।” भारत में अक्सर प्रोजेक्ट्स सरकारी मंजूरियों और फाइलों के चक्कर में दम तोड़ देते हैं। अग्रवाल कहते ने कहा कि दुनिया बहुत तेजी से भाग रही है और हमें भी अपनी रफ्तार बढ़ानी होगी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि एआई (AI) और आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल करके तेल की खोज और उत्पादन को कई गुना तेज किया जा सकता है। इसमें ‘एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग’ और ‘डिजिटल ऑयलफील्ड सिस्टम्स’ जैसी तकनीकें गेम चेंजर साबित हो सकती हैं।
वेदांता का ₹47000 करोड़ का दांव
सिर्फ सलाह ही नहीं, अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता ने इस दिशा में बड़े कदम भी उठाए हैं। कंपनी ने तेल और गैस की खोज के लिए 5 अरब डॉलर (करीब 47,000 करोड़ रुपए) निवेश करने का संकल्प (Vedanta oil investment) लिया है। उनका लक्ष्य आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन करने का है। अगर भारत के निजी और सरकारी क्षेत्र मिलकर इस लक्ष्य पर काम करें, तो विदेशों को जाने वाला अरबों डॉलर का फंड देश के विकास में लगेगा।
विदेशी कंपनियों का अनुभव और तकनीक
अग्रवाल का मानना है कि हमें अमेरिका जैसी बड़ी ऊर्जा कंपनियों के साथ हाथ मिलाना चाहिए। ये कंपनियां सिर्फ पैसा नहीं लातीं, बल्कि उनके पास ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ और ‘नॉर्थ सी’ जैसे मुश्किल इलाकों में काम करने का तजुर्बा है। गहरी समुद्री खुदाई (Deep Sea Drilling) के लिए भारत को इस ग्लोबल पार्टनरशिप की सख्त जरूरत है।
खनन ही बनेगा बदलाव का रास्ता
पुरानी सोच यह थी कि खनन और तेल उत्पादन पर्यावरण के लिए दुश्मन हैं, लेकिन अनिल अग्रवाल इसे बदलने की वकालत करते हैं। वे कहते हैं कि आज की दुनिया में खनन और हाइड्रोकार्बन उत्पादन ‘एनर्जी ट्रांजिशन’ का जरूरी हिस्सा हैं।होर्मुज संकट ने यह आईना दिखा दिया है कि बाहरी सप्लाई चेन कभी भी टूट सकती है। भारत की असली ताकत तभी दिखेगी जब हमारी ऊर्जा की चाबी हमारे अपने हाथ में होगी।
अनिल अग्रवाल का संदेश साफ है कि अगर भारत को महाशक्ति बनना है, तो उसे अपनी ऊर्जा की जंजीरें तोड़नी होंगी और अपनी धरती से ही अपनी जरूरतों को पूरा करना होगा।
