Diego Garcia: हिंद महासागर में वह सैन्य ठिकाना, जिस पर ईरानी हमले से अमेरिका से ब्रिटेन तक हिले

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष में शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात एक बड़ा मोड़ तब आया, जब ईरान ने हिंद महासागर में मौजूद 4000 किलोमीटर दूर एक सैन्य ठिकाने को निशाना बनाते हुए दो बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं। यूं तो दोनों ही मिसाइलें निशाने पर नहीं पहुंचीं, लेकिन ईरान की मिसाइल क्षमताओं को लेकर पश्चिमी देशों की तरफ से अब तक जो अनुमान लगाए गए थे, वह सब धरे के धरे रह गए।
इसके साथ ही यह भी साफ हो गया कि ईरान के हमलों को रोकने के लिए भले ही अमेरिका के पास जरूरी हथियार हैं, लेकिन उसके क्षेत्र में मौजूद सभी एयरबेस ईरान की जद में हैं। यहां तक कि डिएगो गार्सिया एयरबेस भी, जिसे लेकर हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के बीच तनाव हुआ।
डिएगो गार्सिया हिंद महासागर के मध्य में स्थित चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है। यह मुख्य रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के एक बेहद रणनीतिक संयुक्त सैन्य अड्डे के रूप में जाना जाता है।
रणनीतिक स्थान: यह 17 वर्ग मील का एटोल (प्रवाल द्वीप) हिंद महासागर के बिल्कुल बीच में स्थित है। यह लाल सागर में स्थित (बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य) और दक्षिण चीन सागर (मलक्का जलडमरूमध्य) दोनों से लगभग 3,000 किलोमीटर की समान दूरी पर है, जो इसे दुनिया के दो सबसे अहम समुद्री रास्तों तक सीधी पहुंच देता है। इसके अलावा पारंपरिक युद्ध क्षेत्रों से काफी दूर इसकी अलगाव वाली स्थिति इसकी सुरक्षा का एक बड़ा फायदा मानी जाती रही है।
डिएगो गार्सिया का इतिहास?
डिएगो गार्सिया का विवादित इतिहास मुख्य रूप से वहां के मूल निवासियों (चागोस वासियों) के जबरन विस्थापन और इस द्वीप की संप्रभुता से जुड़ा है। दरअसल, 18वीं सदी के अंत तक यह द्वीप पूरी तरह खाली था। हालांकि, बाद में फ्रांस के शासक नारियल बागानों में काम करने के लिए अफ्रीका और भारत से मजदूरों को लेकर आए। बाद में 1814 में फ्रांस ने इन द्वीपों को अंग्रेजों को सौंप दिया।
जबरन बेदखली का दौर (1968–1973): डिएगो गार्सिया के रणनीतिक महत्व के कारण अमेरिका और ब्रिटेन ने यहां एक संयुक्त सैन्य अड्डा बनाने का फैसला किया। इस सैन्य अड्डे के लिए जगह खाली करने के वास्ते 1968 से 1973 के बीच, लगभग 1,500 से 2,000 चागोस वासियों (स्थानीय निवासियों) को उनके घरों से जबरन निकाल दिया गया।
इतिहासकारों के मुताबिक, इन निवासियों को बिना किसी विकल्प के और बहुत ही कम या बिना किसी मुआवजे के मॉरीशस और सेशेल्स में निर्वासित कर दिया गया। इस अमानवीय बेदखली के दौरान, द्वीप को पूरी तरह से साफ करने के लिए सैकड़ों पालतू जानवरों और मवेशियों को भी मार दिया गया।
वर्षों के शासन के बाद ब्रिटेन के कब्जे से कैसे छूटा द्वीप?
ब्रिटेन के इस अवैध कब्जे के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई चली। आखिरकार 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय- इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि ब्रिटेन का चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग करना अवैध था, और कोर्ट ने सिफारिश की कि इन द्वीपों को मॉरीशस को लौटा दिया जाना चाहिए।
शुरुआती वर्षों में तो अदालत के फैसले के बावजूद ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को देने से हिचकिचाती रही, लेकिन मई 2025 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने एक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंप दी गई।
समझौते के तहत मॉरीशस को संप्रभुता सौंपने के बावजूद, यहां मौजूद डिएगो गार्सिया का सैन्य अड्डा खत्म नहीं किया गया। समझौते के तहत सैन्य सुविधा का संचालन जारी रखने के लिए ब्रिटेन ने तुरंत डिएगो गार्सिया को 10.1 करोड़ पाउंड प्रति वर्ष की दर से अगले 99 वर्षों के लिए मॉरीशस से वापस लीज पर ले लिया। यानी ब्रिटेन चागोस द्वीप समूह के इस सैन्य ठिकाने को अभी भी संचालित करता है।
चागोस द्वीप समूह पर क्यों शुरू हुआ ट्रंप बनाम स्टार्मर?
मॉरीशस को चागोस द्वीप समूह देने के खिलाफ थे ट्रंप
ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह मॉरीशस को सौंपने के लिए जो समझौता किया, उस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार नाराजगी जता चुके हैं। दरअसल, चागोस द्वीप समूह भले ही ब्रिटेन के कब्जे में थे, लेकिन 1966 में ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया द्वीप अमेरिका को लीज पर सौंप दिया था। अमेरिका को यह लीज सैन्य ठिकाने तैयार करने के लिए मिली थी और तबसे अमेरिका लगातार इस बेस को मजबूत बनाता आया था।
ऐसे में जब मई 2025 में ब्रिटेन ने मॉरीशस से समझौता कर चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता उसे सौंप दी तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसका जमकर विरोध किया। ब्रिटेन की तरफ से डिएगो गार्सिया को अलग से 99 साल की लीज पर लिए जाने के बावजूद ट्रंप का साफ कहना था कि ब्रिटेन ने गलत फैसला लिया है।
. ब्रिटेन ने ईरान युद्ध के लिए नहीं दी अमेरिका को बेस के इस्तेमाल की इजाजत
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त अभियान से ठीक पहले जब वार्ता का दौर जारी था, तब ब्रिटेन भी इस बातचीत में शामिल था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रिटेन ने यह भांप लिया था कि ईरान अपनी परमाणु क्षमताओं को न बढ़ाने के लिए तैयार था। हालांकि, इसके बावजूद इस्राइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया, जिसके बारे में न तो ब्रिटेन को पूर्व-सूचना दी गई और न ही उसकी सहमति ली गई।
ऐसे में ब्रिटेन लंबे समय से अमेरिका को इस सैन्य बेस का इस्तेमाल ईरान के साथ युद्ध में करने की इजाजत नहीं दे रहा था। इसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर की आलोचना कर चुके थे और उन पर अपने एक सहयोगी की मदद न करने का भी आरोप लगा रहे थे। हालांकि, स्टार्मर लंबे समय तक ट्रंप के इन विवादित बयानों के बावजूद ईरान के साथ युद्ध में ब्रिटेन को नहीं शामिल करना चाह रहे थे।
अमेरिका के लिए कितना अहम है डिएगो गार्सिया?
डिएगो गार्सिया अमेरिका के लिए रणनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण से बेहद अहम है। इसे अक्सर अमेरिका का न डूबने वाला सबसे बड़ा ‘विमानवाहक पोत’ कहा जाता है।
हिंद-प्रशांत में प्रमुख बॉम्बर बेस: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के केवल दो अहम बॉम्बर बेस हैं, जिनमें से एक डिएगो गार्सिया है, जबकि दूसरा प्रशांत महासागर के सुदूर पश्चिम में गुआम एयरबेस है। यहां 12,000 फुट लंबा रनवे है, जिसे खास तौर पर बी-1, बी-2 और बी-52 जैसे भारी रणनीतिक बमवर्षक विमानों के उड़ान भरने के लिए बनाया गया है।
आधुनिक सैन्य और रसद क्षमताएं: 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अमेरिका ने इस बेस का बड़े पैमाने पर विस्तार किया था। इस बेस पर परमाणु पनडुब्बियां और मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत तैनात रहते हैं। इसके अलावा, यहां बड़े आपूर्ति जहाजों की मौजूदगी भी हर वक्त रहती है, जिनसे एक पूरी मरीन ब्रिगेड के लिए भारी मात्रा में हथियार और रसद मुहैया कराए जाते हैं। इससे अमेरिका को एशिया, अफ्रीका और खाड़ी देशों में अपनी सेना बहुत तेजी से तैनात करने की क्षमता भी मिलती है।
अंतरिक्ष और उपग्रह निगरानी का केंद्र: पारंपरिक सैन्य इस्तेमाल के अलावा यह बेस अमेरिकी स्पेस फोर्स के सैटेलाइट ट्रैकिंग और निगरानी बुनियादी ढांचे के लिए भी बेहद अहम है।
ऐतिहासिक संघर्षों में बना लॉन्च पैड: डिएगो गार्सिया ने दशकों तक अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के लिए एक लॉन्च पैड की तरह काम किया है। यहां से 1990-91 के खाड़ी युद्ध, 2001 में अफगानिस्तान युद्ध और 2003 में इराक युद्ध के शुरुआती चरणों के दौरान कई बड़े हवाई अभियान शुरू किए गए थे।
अब ईरान ने इस सैन्य ठिकाने को निशाना क्यों बनाया है?
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने ट्रंप से लंबे समय तक तनाव के बाद आखिरकार शुक्रवार को अमेरिका को ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए इस संयुक्त सैन्य अड्डे का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी। इसके जवाब में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन ऐसा करके ब्रिटिश लोगों की जान खतरे में डाल रहा है और ईरान अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का कड़ाई से प्रयोग करेगा। आखिरकार शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात को ईरान ने 4000 किलोमीटर दूर डिएगो गार्सिया की तरफ अपनी बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च कर दीं।
अब ईरान ने इस सैन्य ठिकाने को निशाना क्यों बनाया है?
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने ट्रंप से लंबे समय तक तनाव के बाद आखिरकार शुक्रवार को अमेरिका को ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए इस संयुक्त सैन्य अड्डे का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी। इसके जवाब में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन ऐसा करके ब्रिटिश लोगों की जान खतरे में डाल रहा है और ईरान अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का कड़ाई से प्रयोग करेगा। आखिरकार शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात को ईरान ने 4000 किलोमीटर दूर डिएगो गार्सिया की तरफ अपनी बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च कर दीं।





