ये हमारे लिए शर्मनाक या हमारा कंट्रोल ट्रंप के पास? रूसी तेल खरीदने की अनुमति अमेरिका से…!

संजय सक्सेना
भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे का संकट फिलहाल खत्म हो गया है, क्योंकि भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की शर्तों के साथ छूट मिल गई है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन का स्पेशल लाइसेंस दिया है। ये लाइसेंस 3 अप्रैल तक वैलिड रहेगा, लेकिन यह तो शर्म की बात ही कही जाएगी कि अब हमें रूस से तेल खरीदने की अनुमति अमेरिका से लेनी पड़  रही है। क्या अब हम अमेरिका से संचालित हो रहे हैं? क्या हमारा रिमोट ट्रंप के हाथों में चला गया है?
ये सवाल तो उठेंगे ही। असल में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने 6 मार्च को बताया कि राष्ट्रपति ट्रम्प के ऊर्जा एजेंडे के तहत अस्थायी कदम उठाते हुए भारत को रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है, वह भी शर्तों के साथ और एक समय अवधि के लिए। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण पार्टनर हैं और ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई को स्थिर रखने के लिए यह छूट दी गई है। इस बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 4 प्रतिशत बढक़र 89.18 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। यह अप्रैल 2024 के बाद इसका उच्चतम स्तर है।
भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ओर से जो 30 दिनों की छूट का एलान किया है, उसपर सियासी घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस पार्टी ने इसे भारत की संप्रभुता पर हमला और अमेरिकी ब्लैकमेल बताया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाया है कि आखिर अमेरिका इस तरह से हमें कब तक ब्लैकमेल करता रहेगा।
नेता विपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में इस बारे में बीते सेशन का वीडियो शेयर किया है। राहुल ने कहा था- क्या अमेरिका हमें बताएगा कि हम रूस या ईरान से तेल खरीद सकते हैं या नहीं? यह अमेरिका तय करेगा, हमारे प्रधानमंत्री नहीं? सीधी बात है, राहुल गांधी ने पहले ही आशंका जता दी थी, जो अब सच हो रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े अगर ये कह रहे हैं कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय संप्रभुता गंभीर खतरे में है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी पर एपस्टीन फाइल्स और अडानी मामले को लेकर दबाव डाला जा रहा है। तो इसमें गलत क्या है? अमेरिका द्वारा भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए ‘अनुमति’ देने और 30 दिनों की ‘छूट’ देने की घोषणा साफ तौर पर दिखाती है कि मोदी सरकार लगातार कूटनीतिक क्षेत्र छोड़ती जा रही है। इस तरह की भाषा आमतौर पर प्रतिबंधित देशों के लिए इस्तेमाल की जाती है, न कि भारत जैसे देश के लिए, जो वैश्विक व्यवस्था में एक जिम्मेदार और बराबरी का साझेदार रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर हिंदी में एक पोस्ट करके लिखा है, ‘ट्रंप का नया खेल, दिल्ली दोस्त को कहा, पुतिन से ले सकते हो तेल, कबतक चलेगा ये अमेरिकी ब्लैकमेल।’
एक तरफ हम विश्व गुरू बनने की बात कर रहे हैं। भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे हैं। हर चीज का उत्पादन देश में ही करने की शर्त रख रहे हैं। दूसरी ओर अमेरिका केवल तय ही नहीं कर रहा कि हम रूस से कब तक और कितना तेल खरीदें, एक समय अवधि के लिए छूट दे रहा है। क्या ये हमारी संप्रभुता से सौदा नहीं है? क्या हमने अमेरिका के साथ ऐसी कोई संधि की है, जिससे हम अपने लिए फैसले  नहीं ले पा रहे हैं? क्या अब ट्रंप तय करेंगे कि भारत को किससे संबंध रखना है, किससे नहीं? किससे क्या खरीदना है, किसे क्या बेचना है, क्या ये अधिकार भी हम ट्रंप को देने जा रहे हैं?
सरकार आखिर कितना झूठ बोलेगी? और देश के अंधभक्त कितनी हद तक अंधे  बने रहेंगे? सरकारी भोंपुओं को केवल वही दिखता है, जो सरकार दिखाना चाहती है। जो हमारी सरकार के जिम्मेदार बोलते हैं, ये भोंपू उसी को सही मानकर कुतर्कों की झड़ी लगा देते हैं। इससे शर्मनाक हालात हमने तो बीते कई दशकों से नहीं देखे हैं। दूसरों पर आरोप लगाकर खुद देश को गिरवी रख रहे हैं और सरासर झूठ भी बोल रहे हैं। आज सच सामने है। हमें अमेरिका दूसरे देश से तेल खरीदने की अनुमति दे कर हम पर अहसान कर रहा है। हम पंगु हो गए हैं, दया की भीख मांग रहे हैं…?

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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