संजय सक्सेना
उत्तराखंड के देहरादून में दम तोडऩे वाले त्रिपुरा के एंजेल चकमा के आखिरी थे, मैं भारतीय हूं…। उसके ये शब्द हर भारतीय को झकझोरने वाले होने चाहिए। अपनी पहचान से संघर्ष करते हुए एक युवा को जान देनी पड़ी, वो भी भारत में। यह शर्मनाक ही नहीं, बहुत गंभीर मामला है कि देश के भीतर देश के ही कुछ हिस्सों के लोगों की भारतीयता पर बार-बार सवाल उठाए जाते हैं। और इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
24 साल का एंजेल पिछले एक साल से देहरादून में रहकर एमबीए की पढ़ाई कर रहा था। 9 दिसंबर को वह अपने भाई माइकल के साथ कुछ सामान लेने निकला था, जब कुछ लडक़ों ने उन पर आपत्तिजनक कमेंट्स किए। एंजेल ने जब विरोध किया कि हम चीनी नहीं हैं, तो आरोपियों ने चाकू से हमला कर दिया। इस शुक्रवार को एंजेल ने दम तोड़ दिया, जबकि उसके माइकल की हालत गंभीर है।
हालांकि 6 में से 5 आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, लेकिन यह एक घटना नहीं, बड़े मुद्दे के रूप में सामने आ रहा है। इस घटना से त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में जबरदस्त गुस्सा है, और यह जायज भी है। अमेरिका, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के खिलाफ नस्लभेदी अपराध होने पर तो हम और हमारा देश विरोध जताता है, लेकिन अब हमारे देश के भीतर ही कुछ तबकों में इतनी गहरी और खतरनाक नस्लीय सोच मौजूद है, यह बहुत गंभीर है। इनके निशाने पर बार-बार पूर्वोत्तर के लोग ही ज्यादा आते हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) ने 2021 में एक स्टडी के नतीजे जारी किए थे। तब सर्वे में शामिल पूर्वोत्तर के 78 प्रतिशत लोगों का मानना था कि उनके चेहरे-मोहरे के कारण उन्हें निशाना बनाया जाता है। यह बताता है कि लोगों में अपने ही देश के बारे में कितनी कम जागरूकता है। दूसरी बात, पूर्वोत्तर के लोगों को अपने ही देश के कई हिस्सों में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है? और वे अपने ही देश में पराये माने जाने लगते हैं।
ऐसी हर घटना के बाद कड़ी कार्रवाई की बात तो की जाती है, लेकिन गंभीर बात यह है कि उन घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया जा रहा है। 2014 में दिल्ली में अरुणाचल के छात्र को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई। वहां से अभी तक, क्या कोई बदलाव आया? नहीं, क्योंकि और भी कई घटनाएं हुईं, फिर उत्तराखंड में एंजेल की हत्या कर दी गई। इसके के बाद कई संगठनों ने नस्लवाद विरोधी कानून की मांग की है, जो बिल्कुल सही है।
नस्लवाद देश की एकता और अखंडता के लिए खतरनाक है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जब भी भारत के किसी शहर में किसी एंजेल के साथ भेदभाव किया जाता है, तो उससे एक बड़े वर्ग की भावनाओं को चोट पहुंचती है। हम यदि दूसरे देशों में हो रही घटनाओं की निंदा करते हैं, तो कम से कम हमें तो उनकी पुनरावृत्ति अपने देश में नहीं करना चाहिए। अन्य देशों के लोगों या दूसरी नस्ल के लोगों के प्रति यदि हम दुश्मनी करने लगेंगे, तो हमें यह ध्यान भी रखना होगा कि दुनिया में अन्य देशों में कितनी बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं।
कहीं न कहीं ये जो कट्टरवाद की भावना आ रही है, नस्लवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है, यह सभी के लिए समस्या बन रही है। हम भी सुरक्षित रह पाएंगे? यह सवाल भी हमारे दिमाग में कौंधना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अक्षुण्ण रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी उदारता और सहिष्णुता ही है। यदि हम अपनी संस्कृति को आगे भी बनाए रखना चाहते हैं, तो इसके प्रमुख गुण को समाप्त न करें और न होने दें। आगे ऐसी घटना न हो कि एक भारतीय को यह कहना पड़े कि वह भारतीय है…और फिर भी उसकी हत्या कर दी जाए…।
Editorial
मैं भारतीय हूं…
