Editorial
राजधानी में भी भगीरथपुरा का इंतजार?

संजय सक्सेना

इंदौर के भागीरथपुरा में फीकल कॉलिफॉर्म, ई-कोलाई, विब्रियो कोलेरी और प्रोटोजोआ जैसे खतरनाक बैक्टीरिया वाले पानी की वजह से अब तक 20 जानें जा चुकी हैं। यही ई-कोलाई बैक्टीरिया भोपाल के पानी में भी मिला है। राजधानी के कई इलाकों में पेयजल इतना दूषित है कि इसे पीना तो दूर हाथ-मुंह या बर्तन धोने से भी लोग डरते हैं। नल से आ रहा पानी चंद मिनटों में ही लाल हो जाता है। बदबू इतनी होती है कि सांस लेना भी दूभर है।
वैसे तो गैस त्रासदी के बाद पुराने भोपाल के तमाम इलाकों में भूजल प्रदूषित हो चुका है, लेकिन इस तरफ शासन से लेकर प्रशासन तक कोई इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। ध्यान देना तो दूर, इस बात से ही इंकार किया जा रहा है कि जमीन के अंदर का पानी प्रदूषित हुआ है या वर्तमान में भी दूषित है। शहर के अंडरग्राउंड वाटर में आयरन यानि लोहे की मात्रा ज्यादा है, इस कारण यहां का पानी भारी रहता है।
अब खबर आ रही है कि भोपाल के आदमपुर छावनी, हरिपुरा, पड़रिया, शांति नगर, अर्जुन नगर, कोलुआ, खानूगांव और वाजपेयी नगर के ग्राउंड वाटर में कैंसर, हैजा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए जैसी बीमारियों की वजह बनने वाला खतरनाक बैक्टीरिया मिला है। यहां की आबादी अच्छी खासी है। पीने के पानी में बैक्टीरिया की पुष्टि खुद भोपाल नगर निगम की रिपोर्ट से हुई है।
इस पानी में आयरन की मात्रा 10 या 20 गुना नहीं, बल्कि पूरे सौ गुना अधिक बताई जा रही है। यदि भूल से भी ये पानी कोई पी ले तो हेमोक्रोमैटोसिस जैसी बीमारी होने के पूरे चांस हैं। यहां के ग्राउंड वॉटर में टीडीएस यानि टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स, कैल्शियम, टोटल हार्डनेस, सल्फेट, कोलीफॉर्म भी ज्यादा मात्रा में हैं। आदमपुर खंती के आसपास का पानी पीने क्या, बर्तन या हाथ-पैर धोने के लिए भी उपयोगी नहीं मिला है। इस वजह से लोग बाहर से आने वाले टैंकरों के पानी पर डिपेंड हैं।
खंती के समीप स्थित पडरिया गांव में करीब 8 हैंडपंप हैं, लेकिन एक भी ऐसा नहीं है, जो साफ पानी दे रहा है। पानी में लाल रंग के बैक्टीरिया नंगी आंखों से ही नजर आ जाते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अगस्त 2025 में अपनी 80 पेज की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश की थी। इसमें पानी में इतना आयरन बताया गया था कि यह न सिर्फ पीने, बल्कि सब्जी और फसलों के पैदावार के लिए भी ठीक नहीं है। कुल 25 पैरामीटर में से 9 ऐसे थे, जो ज्यादा खतरनाक स्थिति में मिले।
यह बात तो रही उन कुछ इलाकों की, जहां फिलहाल जांच की गई है या किसी ने सर्वे किया है, शहर की अधिकांश निजी कालोनियों में कोलार या कलियासोत का पानी प्रदाय नहीं किया जाता है। वहां बोरिंग के पानी से टंकी भरी जाती है और फिर सप्लाई किया जाता है। लेकिन अधिकांश क्षेत्रों का पानी पीने लायक नहीं है। पेट और त्वचा संबंधी बीमारियां तुरंत होने लगती हैं। निजी कालोनियों के ज्यादातर लोग आरओ लगवाते हैं या बाहर से आरओ का पानी पीते हैं।
नगर निगम की पेयजल व्यवस्था की बात करें तो आज से नहीं, कई दशकों से वहां पेयजल सप्लाई में प्रयोग किये जाने वाले रसायनों की खरीद में ही भ्रष्टाचार हो रहा है। एलम हो या क्लोरीन, पानी साफ करने के बजाय स्टोर से ही गायब होता रहा है। गंदे पानी की सप्लाई की समस्या आज भी जारी है। पानी जिस भी तरीके से साफ होता है, उसमें ईमानदारी का प्रतिशत पचास भी नहीं है। यानि आधे से अधिक लोग बिना साफ किया हुआ पानी ही पीते हैं।
्रपानी की सफाई करना तो अलग बात है, जिन टंकियों में पानी भरकर फिर वहां से सप्लाई किया जाता है, वहां की सफाई नियमित नहीं हो पाती है। टंकियों में काई जम जाती है, वहां बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, लेकिन इस मामले को कतई गंभीरता से नहीं लिया जाता। इंदौर की घटना के बाद सरकार के आदेश पर ही जांच की औपचारिकता निभाई जा रही है। पानी की टंकियों की नियमित सफाई अब भी होगी या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता। और भूजल को लेकर न तो शासन की तरफ से कोई आदेश निकला और न ही नगर निगम प्रशासन कोई रुचि ले रहा है।
कुल मिलाकर राजधानी होने के बावजूद यहां के नागरिकों के स्वास्थ्य से खुले तौर पर खिलवाड़ किया जा रहा है। अमृत 2 योजना के तहत फिर सीवेज पाइप लाइन के लिए खुदाई शुरू हो गई है। कई जगह पानी की पाइप लाइन तोड़ दी गई है। कहीं लीकेज है तो कहीं जमीन के अंदर की गंदगी पीने के पानी में मिल रही है। भोपाल गैस कांड से कोई सबक लिया हो, ऐसा नहीं लगता। और अब इंतजार किया जा रहा है, भागीरथ पुरा जैसे कांड का।

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