Editorial
कार्रवाई बनाम जीरो टालरेंस

संजय सक्सेना
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर बरसों से जीरो टालरेंस की नीति चल रही है, लेकिन क्या भ्रष्टाचार रोका जा सका है? कम से कम लोकायुक्त विभाग का रिकार्ड तो इसे झुठला रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बीते चार वर्षों के दौरान लोकायुक्त में 1379 अधिकारी-कर्मचारियों के विरुद्ध जांचें चल रही हैं। जांच के दायरे में आए मामलों में 20.97 करोड़ रुपए की वसूली किए जाने के बावजूद 134 प्रकरण अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित पड़े हुए हैं। 39 प्रकरणों में चालानी कार्रवाई की गई है और 208 प्रकरणों में न्यायालय में चालान पेश किए जा चुके हैं।
विधानसभा में यह जानकारी कांग्रेस विधायक भंवर सिंह शेखावत के सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दी। जवाब में बताया गया कि लोकायुक्त संगठन में वर्ष 2022-23 से अब तक 1884 शिकायतें दर्ज हुई हैं, जबकि विशेष पुलिस स्थापना में 1063 आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध किए हैं।
इन मामलों में शिकायत एवं जांच शाखा तथा तकनीकी शाखा द्वारा इसी अवधि में 1592 जांच पूरी कर प्रकरणों का निराकरण किया है। वर्तमान में शिकायत एवं जांच शाखा में 1291 तथा तकनीकी शाखा में 88 मामले जांच के दायरे में हैं।
लोकायुक्त संगठन की विशेष पुलिस स्थापना द्वारा पंजीबद्ध 1063 आपराधिक प्रकरणों में से 393 प्रकरणों की विवेचना पूरी की जा चुकी है। इनमें 134 प्रकरण अभियोजन स्वीकृति में लंबित हैं। वहीं 39 प्रकरणों में चालानी कार्रवाई की गई है और 208 प्रकरणों में न्यायालय में चालान पेश किए हैं। इसके अतिरिक्त 12 प्रकरणों में न्यायालय में खात्मा पेश किया है, जिनमें आरोपी की मृत्यु अथवा प्रकरण के उन्मोचित होने का आधार रहा। शेष 670 प्रकरण वर्तमान में विवेचनाधीन हैं।
जवाब में यह भी बताया गया कि कुल जांच किए गए मामलों में शिकायत एवं जांच शाखा के 146 तथा तकनीकी शाखा के 7, कुल 153 प्रकरणों में अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। साथ ही शिकायत एवं जांच के आधार पर 20 करोड़ 97 लाख 17 हजार 905 रुपए की वसूली की गई है। लोकायुक्त संगठन की विशेष पुलिस स्थापना द्वारा न्यायालय में पेश किए गए 208 चालानों में से 7 प्रकरणों में आरोपियों के विरुद्ध दोष सिद्ध हुआ है। इन मामलों में संबंधित आरोपियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
ये तो रही आंकड़ों की बात। लेकिन ये कार्रवाई केवल निचले स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ की गई है। पिछले कई सालों से प्रदेश में इक्का-दुक्का मामले ही ऐसे आए हैं, जिनमें कोई बड़ा अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया हो। इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए जाते हैं। एक तो, पकडऩे वाले अधिकारियों-कर्मचारियों का ग्रेड उन अधिकारियों से कम होता है, इसलिए ऐसी शिकायतों पर गौर ही नहीं किया जाता। रिश्वत लेते हुए पकडऩा तो दूर की बात। फिर, कुछ मामले दर्ज होते भी हैं, तो सरकार की तरफ से उन मामलों में चालान पेश करने की अनुमति ही नहीं दी जाती है।
अब उन मुद्दों पर गौर करें, जो इन आंकड़ों और इस सवाल के जवाब से निकल कर बाहर आ रहे हैं। लोकायुक्त के छापे एक तरफ तो ये बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार कार्रवाई कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ ये भी साबित कर रहे हैं कि प्रदेश में भ्रष्टाचार हो रहा है। यही नहीं, भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ़ा भी है। भले ही इसमें निचले स्तर का भ्रष्टाचार सामने आ रहा है, लेकिन सिस्टम की गड़बड़ी तो सामने आ ही रही है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि सिस्टम में भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर पर ही होता है। पकड़ा जाए या न पकड़ा जाए, मामले दर्ज हों या न हों, सिस्टम में हो रहे छेद तो आसानी से दिखाई दे जाते हैं। चर्चाएं भी बिना किसी आधार के नहीं चलतीं। ये हो सकता है कि कुछ बढ़ा-चढ़ाकर लोग बताएं, लेकिन निराधार कुछ नहीं होता। लोकायुक्त छापे केवल एक छोटे से छेद को सार्वजनिक करता है, बाकी छेद बहुत बड़े हैं, फिर भी कार्यवाही के दायरे में नहीं आ पाते।
फिर भी, हलकी-फुलकी ही सही, कार्यवाही तो हो रही है। हां, जिन्हें बचाना होता है, उन्हें बचा भी लिया जाता है। यह कार्रवाई करने वाले सिस्टम की खामी तो है ही, ऊपर से आने वाले दबावों की भी इससे पुष्टि होती है। जब रिश्वत मांगने वाला कहता है कि उसे ऊपर तक देना पड़ता है, तो इसे भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए। रिश्वत में सबका, मतलब किस-किसका हिस्सा होता है, यह भी तो उजागर होना चाहिए। जैसे एक पैडलर को पकडक़र हमारी पुलिस खुश हो जाती है कि उसने तस्कर को पकड़ लिया, वैसे ही यह भ्रष्टाचार का मामला है। पैडलर तस्कर नहीं होता और भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर पर नहीं होता…।



