Editorial
विश्व आर्थिक मंच की ताजा रिपोर्ट

संजय सक्सेना
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीकों के चलते यह सेक्टर सबसे तेज गति से बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ेगा। लेकिन  इस विस्तार की भारी पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है। यह समस्या आने वाले दिनों में और विकराल रूप धारण कर सकती है।
असल में  विश्व आर्थिक मंच यानि डब्लूईएफ की ताजा रिपोर्ट हमें आने वाली कई चुनौतियों की ओर आगाह करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तकनीकी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों पर अपने बढ़ते प्रभाव और उन पर निर्भरता को लेकर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। ऐसा न करने पर न केवल उनकी सामाजिक स्वीकार्यता  बल्कि दीर्घकालिक कारोबारी स्थिरता भी खतरे में पड़ सकती है।
डब्लूईएफ के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि आज तकनीक जीवन के लगभग हर पहलू में समा चुकी है। दुनिया भर में हर साल एक ट्रिलियन यानि 1,000 अरब से अधिक सेमीकंडक्टर बेचे जा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल स्मार्टफोन, कारों और आधुनिक मशीनों में होता है। इसके साथ ही, वैश्विक स्तर पर 11,000 से अधिक डेटा सेंटर सक्रिय हैं।
रिपोर्ट के अनुसार केवल सेमीकंडक्टर निर्माण में ही हर साल 1 ट्रिलियन लीटर से अधिक ताजे पानी की खपत होती है, साथ ही बड़ी मात्रा में धातुओं और महत्वपूर्ण खनिजों का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी ओर, डेटा सेंटर 60 गीगावॉट से अधिक ऊर्जा की मांग करते हैं, जो अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की पीक पावर जरूरतों के बराबर है। यानि इस सेक्टर के लिए पानी और ऊर्जा की खपत के साथ ही कई खनिजों की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। चांदी की मांग के साथ ही इसकी कीमतों में लगातार वृद्धि इसका प्रमाण है।
तकनीकी विकास के साथ इलेक्ट्रॉनिक कचरे  की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। हर साल लगभग 60 अरब किलोग्राम ई-वेस्ट पैदा होता है, जिसमें से 25 प्रतिशत से भी कम का पुनर्चक्रण यानि रीसाइक्लिंग हो पाता है। सीधे-सीधे 75 प्रतिशत कचरा वैसा का वैसा ही रह जाता है, जो लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है और साथ ही जहरीला भी होता जा रहा है। 
डब्लूईएफ ने चेताया है कि अगर इन पर्यावरणीय प्रभावों को नहीं संभाला गया, तो टेक सेक्टर का निकट भविष्य और दीर्घकालिक मजबूती दोनों खतरे में पड़ सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2024 से अब तक अमेरिका में 64 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजनाएं स्थानीय विरोध के कारण रोकी गईं या विलंबित हुई हैं। इन विरोधों की मुख्य वजह प्राकृतिक संसाधनों और बिजली की बढ़ती मांग है। भारत में भी कई परियोजनाओं का विरोध चल रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में हालात बिगड़ते जा रहे हैं।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि नेचर-पॉजिटिव रणनीतियां अपनाने से कंपनियों के लिए वित्तीय अवसर भी पैदा हो सकते हैं। इसमें पुराने उपकरणों से धातुओं की रिकवरी, ऊर्जा और पानी की खपत घटाकर लागत में बचत जैसे फायदे शामिल हैं।
डब्लूईएफ ने टेक कंपनियों को कई प्राथमिक कदम भी सुझाए हैं, इनमें कहा गया है कि जल उपयोग को अधिक लचीला और पुनर्स्थापनात्मक बनाना होगा,
सर्कुलर इकोनॉमी के जरिए प्रदूषण कम करना होगा। बिजली के अलावा अन्य संचालन से होने वाले और एम्बॉडिड ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना होगा। भूमि संरक्षण और पुनर्स्थापन को बढ़ावा देने के साथ ही संचालन को टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों से संचालित करना होगा। इसके साथ ही, रिपोर्ट में आपूर्ति शृंखला के साथ गहन सहयोग, पारदर्शी रिपोर्टिंग और जिम्मेदार वैल्यू चेन प्रथाओं के जरिए विज्ञान-आधारित नीतियों को समर्थन देने पर भी जोर दिया गया है।
कुल मिलाकर यह रिपोर्ट हमें आने वाले खतरों से आगाह कर रही है, लेकिन ये खतरे ऐसे नहीं हैं कि उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाए। कहीं न कहीं हमारे लिए चेतावनी है। हमारे लिए विकास के साथ ही जीने के लिए अनुकूल पर्यावरण भी उतना ही जरूरी है। इसलिए बहुत सावधान रहने की जरूरत तो है ही, पर्यावरण सुधार, भू-जल संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

Exit mobile version