Editorial… ईंधन की किल्लत के आसार…

संजय सक्सेना
मध्यपूर्व में चल रहा युद्ध निकट भविष्य में थमने के आसार नजर नहीं आ रहे  हैं। कहीं ये रूस और यूक्रेन की तरह खिंच गया, तो केवल एशिया ही नहीं, दुनिया भर के लोगों की समस्याएं बढ़ जाएंगी। ईंधन की किल्लत के आसार तो अभी से नजर आने लगे हैं।
एक तरफ तो युद्ध प्रभावित देशों में भारत के सैकड़ों लोग फंसे हुए हैं। अब उन्हें सुरक्षित वापसी की चिंता सताने लगी है। दूसरी ओर, ईंधन गैसों की कमी होने की आशंका तो बढ़ ही रही है, कीमतें भी आसमान की ओर जाने की स्थितियां बनने लगी हैं। माना जा रहा है कि भारत में सीएनजी यानि कंप्रेस्ड नेचुरल गैस और पीएनजी यानि पाइप्ड नेचुरल गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं।
ईरान के ड्रोन हमले के बाद भारत को गैस सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश कतर अपने लिक्विफाइड नेचुरल गैस प्लांट का उत्पादन रोक चुका है। इससे भारत आने वाले जहाजों की आवाजाही रुक गई है और घरेलू बाजार में गैस की सप्लाई में 40 प्रतिशत तक की बड़ी कटौती की गई है। भारत अपनी जरूरत की 40 प्रतिशत लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी करीब 2.7 करोड़ टन सालाना कतर से ही आयात करता है।
विदेश से आने वाली एलएनजी को गैस में बदलकर ही सीएनजी और पीएनजी सप्लाई की जाती है। इसकी सप्लाई रुकने से सिटी गैस कंपनियों ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो सीएनजी और पीएनजी के दाम बढ़ सकते हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का लगभग बंद होना है। यह एक संकरा समुद्री रास्ता है जिससे होकर कतर और यूएई जैसे देश अपना तेल और गैस निर्यात करते हैं। ईरान और इजरायल जंग के कारण यह रूट अब सुरक्षित नहीं रहा है। इस रूट पर जहाजों की संख्या घट गई है। 28 फरवरी को इस रास्ते से 91 जहाज गुजरे थे, जो अब घटकर सिर्फ 26 रह गए हैं।
दरअसल, भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत कच्चा तेल और 54 प्रतिशत एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। पेट्रोनेट के तीन बड़े जहाज-दिशा, राही और असीम-फिलहाल कतर के रास लफान पोर्ट तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कतर-एनर्जी के मुताबिक, ईरान ने कतर के रास लफान और मेसाईद इंडस्ट्रियल सिटी स्थित प्लांट पर ड्रोन से हमला किया था। सुरक्षा कारणों से कंपनी ने एलएनजी का प्रोडक्शन फिलहाल रोक दिया है।
पिछले हफ्ते अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ठिकानों पर स्ट्राइक की थी, जिसके जवाब में ईरान ने यूएई, कतर, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और पोर्ट्स को निशाना बनाया है। भारत में आयातित एलएनजी का इस्तेमाल सिर्फ घरों और गाडिय़ों में ही नहीं, बल्कि बिजली बनाने और यूरिया (खाद) उत्पादन में भी होता है। यही नहीं, अगर गैस की कमी बनी रही तो गैस आधारित पावर प्लांट्स से पैदा होने वाली बिजली महंगी हो जाएगी। फर्टिलाइजर सेक्टर के लिए गैस एक मुख्य कच्चा माल है, सप्लाई घटने से खाद उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
गैस की किल्लत को देखते हुए एसोसिएशन ऑफ सीजीडी एंटिटीज ने सरकारी कंपनी गेल को पत्र लिखकर स्पष्टता मांगी है। कंपनियों का कहना है कि अगर कतर से आने वाली सस्ती गैस नहीं मिली, तो उन्हें स्पॉट मार्केट से महंगी गैस खरीदनी पड़ेगी। स्पॉट मार्केट में गैस की कीमत फिलहाल 25 डॉलर प्रति यूनिट पहुंच गई है, जो कॉन्ट्रैक्ट वाली गैस से दोगुनी से भी ज्यादा है।
भारत की सबसे बड़ी गैस आयात करने वाली कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर की कंपनी कतर-एनर्जी को ‘फोर्स मेजर’ नोटिस भेजा है। फोर्स मेजर का मतलब है कि किसी बड़ी वजहजैसे युद्ध या संकट के कारण कंपनी अभी तय समझौते के मुताबिक गैस सप्लाई नहीं कर पा रही है। कंपनी ने गेल, इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को भी फोर्स मेजर नोटिस जारी कर सूचित किया है कि उन्हें मिलने वाली गैस की सप्लाई कम रहेगी। कंपनी ने यह भी साफ किया है कि युद्ध के कारण होने वाले बिजनेस नुकसान पर इंश्योरेंस कवर भी नहीं मिलता है।
फिलहाल युद्ध बंद होने की बात तो दूर है, और तेज होने की आशंका बलवती हो रही है। इसरायल और ईरान के बीच में अमेरिका है, लेकिन ईरान किसी भी हालत में हथियार डालने के लिए तैयार नहीं है। और यदि कहीं उसने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर दिया, तो तबाही तय है। साथ ही विश्व युद्ध के हालात भी बन सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए सुरक्षा के साथ ही ईंधन की समस्या बढऩे वाली है। उधर, रूस से तेल की आपूर्ति बंद होने की स्थितियां बन गई हैं। तेल और गैसें महंगे हो जाएं, तो फिर भी काम चल जाएगा, लेकिन यदि सप्लाई बंद हो जाती है, तो क्या होगा? अपने सामने वेट एंड वाच के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है।

Exit mobile version