सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान यह महत्वपूर्ण जानकारी साझा की कि भारतीय अदालतों में लंबित मामलों में से 2.33 करोड़ से अधिक मामले मध्यस्थता (Mediation) के माध्यम से सुलझाए जाने के लिए उपयुक्त हैं।
बड़ी संख्या में लंबित मामले: हाई कोर्ट्स से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर, वर्तमान में 2.33 करोड़ से अधिक ऐसे मामले हैं जिन्हें आपसी सहमति और बातचीत (मध्यस्थता) से खत्म किया जा सकता है।
मध्यस्थता की भूमिका: जस्टिस नाथ ने जोर दिया कि मध्यस्थता केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मानवीय व्यवहार, सुनने की क्षमता और भावनाओं को समझने पर आधारित है।
मानवीय अनुभव का महत्व: उन्होंने कहा कि मध्यस्थता में भावनाओं और मानवीय अनुभवों को केंद्र में रखा जाता है, जो अक्सर पारंपरिक अदालती कार्यवाही में संभव नहीं हो पाता।
सुधार की आवश्यकता: उन्होंने मध्यस्थों के लिए बेहतर प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि कानूनी प्रक्रियाओं में होने वाली देरी को कम किया जा सके।
मध्यस्थता अधिनियम, 2023: जस्टिस नाथ ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 की सराहना करते हुए इसे विवादों के समाधान की दिशा में एक आशाजनक कदम बताया
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता और सुलह परियोजना समिति (MCPC) के अध्यक्ष भी हैं, और उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में मुकदमों को कम करने के लिए कई पहलों की शुरुआत की है.
