MP: बिना नियम कायदे के ही चल रहा था पैरा मेडिकल कौंसिल, दो साल से हो रहा फर्जीवाड़ा, अब नियम बनाएगी प्रदेश सरकार !

भोपाल। क्या पेरामेडिकल कौंसिल अवैध रूप से कार्य कर रही थी? क्या बिना नियम के कोई कौंसिल अस्तित्व में रह सकती है? क्या नियमों को ताक में रखकर मध्य प्रदेश में पैरा मेडिकल के तमाम कोर्स चलाए जा रहे थे..? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस प्रदेश में हुए नर्सिंग घोटाले में सरकार की संलिप्तता को प्रमाणित कर रहे हैं। दो साल बाद पिछली कैबिनेट में यह स्वीकार किया गया कि पैरा मेडिकल कौंसिल बिना नियमों के ही चल रही थी और परीक्षाएं भी कराई जा रही थीं।

Jiकैबिनेट की बैठक के बाद इसका खुलासा हुआ कि जिस एलाइड कौंसिल के नियम अब तक केंद्र ने ही नहीं बनाये,  सेंट्रल में जिस का कोरम पूरा कर के गठन ही नहीं  हुआ, किसी राज्य ने इसे लागू  किए बिना पैरा मेडिकल कौंसिल चलाई जा रही थी। बिना केंद्र सरकार की अनुमति और जानकारी दिये प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा विभाग के कतिपय भ्रष्ट अफ़सरों ने इसे मोहन सरकार बनते ही आठ माह पहले सीएम सहित पूरी कैबिनेट को अंधेरे में रख कर मनमर्ज़ी से पेरामेडिकल की जगह इसे गठित करा लिया और ये सब पेरामेडिकल कौंसिल में मनमर्ज़ी से नियम बदल कर एक एमबीए डिग्री धारी घोटालेबाज़ व्यक्ति को डिप्टी रजिस्ट्रार बना दिया गया। ये तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग “उस के लगभग आधा दर्जन साथी जो मेडिकल और पेरामेडिकल के बारे में ना केवल पूरी तरह अनुभवहीन है वल्की इन की डिग्रियाँ भी एमबीए और इंजीनियरिंग की हैं लेकिन नर्सिंग घोटाले में घिरे तत्कालीन मन्त्री के पिछलग्गू होने का फ़ायदा उठाते हुए इन्हें परमानेंट लाखों रुपए की तनख़्वाह पर सरकारी नौकरी देने नियम तोड़मरोड़ कर मेडिकल से जुड़ी इतनी संवेदनशील संस्था में नियुक्त कर बिठा दिया गया और रजिस्ट्रार सेलोज जोशी के साथ मिल कर इस पूरी टीम ने अपनी मनमर्ज़ी की नियुक्ति को पुख़्ता करने और हमेशा के लिए कौंसिल में अपना कब्जा जमाये रखने बिना केंद्र की मंज़ूरी या नियम लागू हुए इस तरह से कौंसिल को ख़त्म कर नई एलाइड कौंसिल बनाने और अपनी अपनी डिग्रियों के हिसाब से नई कौंसिल में पदों की योग्यता तय कर उस पर नये सेटअप में अपने समायोजन करने सहित उस के गठन का प्रस्ताव फ़रवरी में पूरी कैबिनेट को अंधेरे में रखवा कर मंज़ूर करवा लिया.. ख़ास बात ये रही कि इस षड़यंत्रकारी टीम की मिली भगत और भ्रष्टाचार का खेल इतना ख़तरनाक था कि विधि विभाग.. वित्त विभाग..जीएडी..सचिवस्तरीय समिति और तत्कालीन एसीएस जिन के मन्त्री की मिलीभगत के सहयोग से इस फ़र्ज़ी खेल को अमली जामा पहनाया उन सब ने आँख बंद कर के अभिमत के साथ इसे मंजूरी देते हुए गोलमोल तर्क दे कर नई नई बनी मोहन केबिनेट से मंज़ूर करा कर मुख्यमंत्री सहित पूरी कैबिनेट को हंसी का पात्र बनवा दिया..नीचे से ऊपर तक किसी ने भी ये देखने समझने की ज़हमत तक नहीं उठाई कि जिस का गठन और नियम अभी केंद्र ने ही मंज़ूर नहीं किए जो किसी राज्य में भी नहीं उसे हम बिना देखे समझे परीक्षण किए कैसे लागू किए दे रहे हैं.. और इस कृत्य पर केंद्र के अफ़सरों की फटकार और साल भर से अधर में लटक चुकी कौंसिल से मान्यताएँ रुक जाने और काम बंद होने के बाद फिर एक बार लौट के बुद्धू घर को आए की तर्ज़ पर मान्यताओं का खेल फिर चालू कराने दो साल के लिए उसी पेरामेडिकल कौंसिल को यथावत रखने का प्रस्ताव कैबिनेट से ही दोबारा मजबूरी में मंज़ूर करवाया.. जिस से फिर एक बार सीएम और सीएस सहित पूरी कैबिनेट प्रदेश ही नहीं देश भर में मज़ाक़ का पात्र बन गई
ये किसी ने गौर नहीं किया कि अगर यही करना था तो इसे आठ महीने पहले भंग कर के नई एलाइड काउंसल क्यों इतनी जल्दबाज़ी में गठित की थी..इस को भंग करने के बाद सारे एसेट्स और पद जो उस के हिसाब से बदल कर मर्ज़ कर दिये,   वे कहां  रहेंगे?  अगर एक दूसरे का प्रभार ही देना है तो इस की ज़रूरत क्या थी..? और सब से बड़ी बात जिस रजिस्ट्रार डिप्टी रजिस्ट्रार और सरकार में बैठे तमाम ज़िम्मेदार अफ़सरों ने ऐसे प्रस्ताव को आगे बढ़ा कर कैबिनेट से मंज़ूर कराने का खेल रच कर मुख्यमन्त्री..मुख्यसचिव और पूरी कैबिनेट को देश और प्रदेश भर में दो दो बार हंसी का पात्र बनवा दिया क्या उन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाएगा , क्योंकि मामला पूरी सरकार की कार्यप्रणाली और इज़्ज़त से जुड़ा है?

Exit mobile version