MP: महिला स्व सहायता समूह के नाम पर भी बड़ा घोटाला, कागजों पर 3500 रुपए दिए जा रहे, हकीकत में कुछ नहीं मिला

भोपाल। मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को पोषण आहार बांटकर महिला स्व सहायता समूहों को सरकारी रिकाॅर्ड में हर महीने 3500 रुपए तक का मुनाफा कमाना बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत इससे जुदा है। अध्यक्ष-सचिव को छोड़कर समूहों की महिला सदस्यों को फूटी कौड़ी तक नहीं मिलती।

इस गोरखधंधे का खुलासा भिंड में नगरीय प्रशासन विभाग की जांच में हुआ। भिंड नगर पालिका सीएमओ ने भी समूहों के बैंक खातों की जांच कराई तो पाया कि इनमें पोषाहार की राशि तो आती है लेकिन इसे समूह दूसरे अकाउंट में भेज देता है। साफ है कि काम तो महिला समूहों ने लिया है लेकिन संभाल पुरुष ठेकेदार रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर 3 जनवरी 2022 को रूबी स्वसहायता समूह के खाते में ट्रेजरी से एक लाख 76 हजार 90 रुपए भेजे गए। सात दिन बाद ही समूह के खाते से एक लाख 76 हजार रुपए विपिन सिंह को ट्रांसफर कर दिए गए यानी लगभग पूरी राशि। 4 मार्च 2022 को रूबी स्वसहायता समूह के खाते में फिर से एक लाख 82 हजार 148 रुपए ट्रेजरी से भेजे गए। अगले ही दिन समूह के खाते से एक लाख 80 हजार रुपए फिर विपिन के खाते में डाले गए।

पता चला है कि समूह की महिला अध्यक्ष और सचिवों ने साठगांठ करके पुरुष ठेकेदारों को समूह किराए पर दे दिए हैं। समूह की अन्य महिला सदस्यों को बताया तक नहीं। 10 महिला सदस्यों वाले समूहों में अध्यक्ष और सचिव ही मुनाफा ले रही हैं। शेष 8 महिला सदस्यों को कुछ नहीं मिलता। इन महिला सदस्यों को यह तक नहीं पता कि वे किसी स्व सहायता समूह की सदस्य भी हैं। यह भी पता चला है कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर खाना चुनिंदा रसोइयों से ही भेजा जा रहा है, जबकि रिकाॅर्ड में खाना बांटने वाले महिला समूहों की सदस्यों को इस बारे में पता ही नहीं है।
3500 रुपए नहीं मिल रहे, झाड़ू-पोंछा कर रहीं महिलाएं

भिंड के वैष्णवी स्वसहायता समूह को मई 2021 में 10 आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार भेजने का जिम्मा मिला। जनवरी में समूह को 1,17,667 रु का भुगतान हुआ। इस राशि में यदि 70% लागत निकाल दें तो समूह को महीने में 35 हजार रुपए की इनकम हुई। समूह के सभी 10 सदस्यों में बराबर बांटें, तो हर महिला सदस्य को हर महीने 3500-3500 रुपए मिलना थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समूह की सदस्य मनोरमा बघेल बताती हैं कि उन्हें एक रुपया भी नहीं मिला। वे मोहल्ले की अगरबत्ती फैक्ट्री में मजदूरी कर परिवार पाल रही हैं।
इन्हे नहीं पता कि स्वसहायता समूह की सदस्य हैं

भगवती स्वसहायता समूह दो आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार वर्ष 2022 से पहुंचा रहा है। समूह ने इस साल फरवरी में पोषाहार भेजने का बिल 24 हजार रुपए दिया। इसमें से 20 हजार 547 रु. स्वीकृत हुए। 70% लागत निकालने के बाद समूह को छह हजार रुपए की बचत हुई। इस तरह हर सदस्य को प्रतिमाह 600 रुपए मिलना थे। जब भास्कर ने इन सदस्यों के घर पहुंचा, तो सर्वेश प्रजापति समूह में अपना नाम जुड़ा होने की बात सुनकर चौंक गईं।
रीना प्रजापति और सपना यादव ने भी कहा कि उन्होंने तो किसी समूह में जुड़ने के लिए दस्तावेज भी नहीं दिए। समूह की अध्यक्ष छायादेवी से जब सदस्यों के मुनाफे के बारे में पूछा तो उन्होंने फोन काट दिया।
केवल कागजों में सदस्य, कोई मदद नहीं मिलती

आदर्श महिला स्वसहायता समूह भी मई 2022 से दो आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषाहार भेज रहा है। समूह ने फरवरी में 21 दिन 2100 बच्चों को पोषाहार देने का 24 हजार 80 रु का बिल दिया। इसमें से 20 हजार 120 रुपए स्वीकृत हुए। 70% लागत निकालने पर समूह को छह हजार रु की बचत हुई। यानि सभी महिला सदस्यों को 600-600 रु मिलना चाहिए थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समूह की सदस्य रीता पमार बताती हैं कि वे किसी समूह में कार्य नहीं करतीं। अन्य सदस्य रुखसाना अली और नाजमीन पत्नी असरफ ने भी बताया कि उन्हें भी नहीं पता कि उनका नाम किसी समूह में चल रहा है। उन्हें आदर्श समूह से कुछ मदद नहीं मिली है। समूह की अध्यक्ष वर्षा कुशवाह ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
कलेक्टर से लेकर विभागीय अधिकारियों तक शिकायत

आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार का कार्य लेने वाले ज्यादातर समूहों के किराए पर चलने की शिकायत कलेक्टर से लेकर विभागीय अधिकारियों तक पहुंची। डायवर्सन रोड निवासी अशोक सिंह ने आरोप लगाया कि ज्यादातर समूहों का संचालन विपिन सिंह निवासी डाक बंगला और हरपाल सिंह तोमर निवासी वार्ड क्रमांक दो (अटेर रोड) द्वारा किया जा रहा है।

13 समूह ऐसे, जिन्हें 10-10 आंगनबाड़ी केंद्र बांट दिए गए

आंगनबाड़ी केंद्रों पर पका हुआ पोषण आहार बांटने के लिए वर्ष 2021 में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा टेंडर बुलाए गए थे। भिंड की 179 आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए 30 महिला स्वसहायता समूहों को जिम्मेदारी दी गई, जिसमें 13 समूह ऐसे हैं, जिन्हें 10-10 केंद्र दिए गए।

इन समूहों को हर महीने 40 से 50 हजार रुपए की बचत हो रही है। यानि महिला सदस्यों को हर महीने 3 से 4 हजार रुपए और सालाना उन्हें 36 से 48 हजार रुपए मिलना चाहिए, लेकिन असलियत में उन्हें फूटी काड़ी नहीं मिली है। बताया जा रहा है कि उक्त समूह वर्ष 2018 से पूर्व के पंजीकृत हैं।

रिकाॅर्ड में सदस्यों के नाम, पता और फोन नंबर भी गलत

आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार बांटने का जिम्मा संभाल रहे ज्यादातर समूह ऐसे हैं, जिनके सदस्यों को ढूंढ पाना भी आसान नहीं है। कारण- डे-एनयूएलएम के एमआईएस पोर्टल पर इनके नाम पता और मोबाइल नंबर तक सही दर्ज नहीं हैं। कुछ समूह तो ऐसे भी हैं, जिनकी महिला सदस्यों के नाम से मोहल्ले के लोग उन्हें नहीं पहचान पा रहे हैं। साथ ही, इन समूहों की किचिन शेड का भी अता-पता नहीं है यानि वे किराए पर चल रहे हैं।

साभार।

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