Madhya Pradesh में जल जीवन मिशन की धज्जियां उड़ीं… बुरहानपुर के लिए दिल्ली से पुरस्कार ले आए, वहां पानी के लिए चार चार किलोमीटर चलना पड़ता है..

भोपाल। देश में जल जीवन मिशन की हालत जो भी हो, मध्य प्रदेश में तो ये मिशन पूरी तरह से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। कागजों में इसकी सफलता दिखाई गई और अफसर दिल्ली जाकर पुरस्कार भी ले आए। हाल ही में एक बड़े अखबार ने बुरहानपुर के हालात पर खबर दी, जो जल जीवन मिशन की असलियत बताने के लिए काफी है।

खबर के अनुसार बुरहानपुर जिले की 167 ग्राम पंचायतों में 254 गांव हैं। जल जीवन मिशन की शुरुआत में (15 अगस्त 2019) में बुरहानपुर में कुल 1,01,905 घरों में से केवल 37,241 ग्रामीण परिवारों (36.54 प्रतिशत) के पास ही नल कनेक्शन के पीने का पानी था, जिसके बाद सरकार ने दावा किया था कि इन सभी गांव में 2022 तक हर घर नल से जल पहुंच गया है। इसके अलावा 640 स्कूलों, 549 आंगनवाड़ी केंद्रो में भी इस योजना के तहत पानी पहुंच गया है।

बुरहानपुर में 129 करोड़ खर्च हुए
• नल जल मिशन योजना के तहत बुरहानपुर जिले में 129 करोड़ रुपए 3 साल में खर्च हुए।
• जिले के सभी 254 ग्राम पंचायत में नल-जल योजना
के तहत पानी पहुंचाना था।
2019 में जिले में टंकी बनाने और पाइपलाइन बिछाने का काम शुरु हुआ था।
72 आरसीसी टंकी, 107 सम्पबेल के साथ 646 किमी पाइप बिछाई गई है।
• बुरहानपुर जिला प्रशासन का दावा है कि मार्च 2022
तकहर घर पानी पहुंचा दी गई है।
• दावा है कि अब 1 लाख 1905 घरों में नल के माध्यम से पानी पहुंच रहा है।

2 अक्टूबर को कलेक्टर प्रवीण सिंह राष्ट्रपति से दिल्ली में अवार्ड भी ले चुके हैं।
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी द्वीट कर बुरहानपुर जिले को बधाई दी थी। • केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने खुद द्वीट कर जानकारी दी कि बुरहानपुर देश का पहला जिला है, जहां सभी घरों में पानी की सप्लाई होने लगी है।
• पहले राज्य फिर केंद्र सरकार की टीम ने इसे सर्टिफाइड किया। भारत सरकार की पोर्टल में इसकी एंट्री भी की गई है।

और ये है हकीकत

जिला मुख्यालय से 22 किमी दूर असीरगढ़ की तीन ग्राम पंचायतें असीर, धूलकोट और खामला के कई गांवों में जेजेएम योजना के तहत पाइपलाइन तो बिछाई गई है, लेकिन पानी नहीं आता। दूसरी तरफ कई गांव ऐसे हैं जहां इस योजना का फायदा ही नहीं पहुंचा। इन सभी गांवों में ज्यादातर बारेला आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं।

मेटल्या गांव की महिलाएं 4-5 किमी दूर से पानी लाती हैं

असीरगढ़ पंचायत के मेटल्या गांव में आदिवासियों के 10-15 टोले बने हैं। इनके पास जमीन का पट्टा तो है, मगर गर्मी में गांव में पानी नहीं रहता। जब भास्कर की टीम गांव में पहुंची तो देखा कि घर सूने पड़े हैं। गांव में महिलाएं-बच्चे भी नजर नहीं आ रहे थे।
एक ग्रामीण से पूछा तो उसने बताया कि महिलाएं पानी लेने गई हैं। उसके बताए रास्ते पर जब आगे बढ़े तो महिलाएं बच्चों के साथ पानी लाते हुए नजर आईं। जब इन महिलाओं से बात की तो उन्होंने बताया कि घर से 5 किमी दूर से पानी भरकर लाना पड़ता है। कली बाई ने बताया कि छोटे बच्चे को साथ लेकर जाना पड़ता है। एक बार जाने से काम नहीं बनता। दिन में करीब 6-7 बार पानी लेने जाते हैं। कली को टोकते हुए नीना बाई बोलीं कि गांव में पानी की इतनी दिक्कत है कि नई बहुएं वापस अपने मायके चली गई हैं। गांव के राजेश सिसोदिया कहते हैं कि इस समस्या को लेकर सीएम हेल्पलाइन में दो से तीन बार शिकायत की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

पिपराना गांव में झिरी से पानी लाते हैं ग्रामीण

असीरगढ़ किले के सामने से एक रास्ता जंगलों के बीच से ग्राम पंचायत धूलकोट की तरफ जाता है। धूलकोट ग्राम पंचायत में 2 गांव आते हैं, धूलकोट और पिपराना। इसके अलावा यहां करीब 12 से 13 बस्तियां आदिवासियों की हैं।

धूलकोट से पहले पिपराना गांव पड़ता है। जल जीवन मिशन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार धूलकोट के 1 हजार 178 घरों तक पानी पहुंचा दिया गया है, लेकिन इन आंकड़ों में धूलकोट के करीब 4-5 फालिए (बस्ती) शामिल नही है। वेबसाइट के अनुसार ही धूलकोट का 15 घरों वाला मोफी फालिया क्षेत्र है, जहां सभी घरों में पानी पहुंचा दिया है लेकिन हकीकत ये कि इस क्षेत्र में पानी के लिए पाइप लगा ही नही। इसी तरह पिपराना गांव में भी 275 घरों तक जल पहुंचाने का आकंड़ा दर्ज है लेकिन गांव के मुख्य सड़क से सटे इलाकों में ही न नल और न ही पानी पहुंचा है।

झिरी का गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण

झिरी गांव का पानी इतना गंदा है कि उसे पीकर बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत हो रही है। यहां एक छोटा सा गड्डा है, जिसमें मटमैला पानी भरा हुआ था। एक महिला झिरी के पास पहुंची उसने गंदे पानी को हटाया। झिरी से कटोरे से महिलाएं बर्तनों में पानी भरती हैं। एक मटका भरने में दो घंटे से ज्यादा का समय निकल जाता है। पानी का सिर्फ ये एक ही जरिया है। जानवर भी इसी झिरी पर पानी पीने आते हैं।

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Madhya Pradesh में जल जीवन मिशन की धज्जियां उड़ीं... बुरहानपुर के लिए दिल्ली से पुरस्कार ले आए, वहां पानी के लिए चार चार किलोमीटर चलना पड़ता है.. 4

सरकारी आंकड़ों में खामला के 132 घरों में नल से पानी, हकीकत कुछ और है

मेल्टया और पिपराना गांव में तो नल जल योजना का फायदा नहीं मिल रहा, लेकिन जहां मिल रहा है, वहां भी हालात ठीक नहीं है। बुरहानपुर की खामला ग्राम पंचायत में एक गांव और करीब 4 फालिए आते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पंचायत के खामला में 132 घरों तक पानी पहुंचा दिया गया है, लेकिन जमीन पर देखें तो इस योजना की पाइपलाइन से करीब 5 घरों के लिए एक कॉमन नल है। यानी 1 नल से करीब 5 घर के लोग पानी भर रहे हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि नलों में पानी भी रात के करीब 3 बजे छोड़ा जाता है। इस पंचायत के अंतर्गत करीब 4 से ज्यादा फालिए आते हैं, लेकिन सरकारी आकड़े के अनुसार 20 घरों वाले मनरालिना फालिए में ही नल लगे हैं। इसके अलावा जो बाकी फालिए हैं, वहां न नल पहुंच पाएं हैं और न ही पानी। उन फालियों में रहने वाले लोग दूरदराज के कुएं और हैंडपंप से पानी लाने को मजबूर हैं।

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Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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