BHOPAL: शहर की नाइट लाइफ पर पाबंदी लगाने के बजाय पुलिसिंग दुरुस्त करें

अलीम बजमी। भोपाल की पहचान रतजगा। पटिएबाजी के लिए मशहूर। हांलाकि पटिए और ओटले टूटे लेकिन सड़कों, चौराहों और बाजारों में देर रात तक बैठने की रिवायत बरकरार। हुजूर चौक में तो आपको कई राजनेता, शायर, कवि, कारोबारी से लेकर सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय लोगों की बड़ी जमात आज भी देखने को मिलेगी। ऐसा ही एक ठिया अब नादरा बस स्टैंड पर भी है। यह मंजर सिर्फ पुराने शहर का नहीं है। न्यूमार्केट, पांच नंबर, छह नंबर और दस नंबर मार्केट में कई लोगों के ठिए आपको मिलेंगे। ऐसा ही नजारा बैरागढ़ मेन रोड पर भी दिखाई देगा। भेल में बीएचईएल कारखाने के कारण यह दस्तूर पुराना है। इन सभी स्थानों पर हर उम्र के लोग दिखाई देंगे। वादियों के शहर की अब नाइट लाइफ भी बदली है। देर रात तक पब-होटल में नाइट पार्टियां। शादियों का जश्न। मॉल में पिक्चर देखने का शौक। परिवार के संग खुली जीप में लांग ड्राइव का लुत्फ। कुछ कोचिंग क्लासेज में भी देर रात स्टडी के लिए स्टूडेंट का जमघट। कॉल सेंटर में लड़कियां। यह सब भोपाल के जिंदा दिल होने का अहसास दिलाता है। रात में आपको कई लड़कियां दोपहिया या चार पहिया वाहन चलाते हुए नजर भी आएगी। बेफिक्री से घर लौटते दिखाई देगी। ये मौजूं भोपाल के वाइब्रेंट होने का है। अब रेंज रोवर, ऑडी से लेकर जगुआर जैसी कारों का दिखाई देना शहर के आधुनिक होने का परिचय है। अपना भोपाल अब 1975 का वह शहर नहीं, जिसकी सीमा 71. 23 वर्ग किमी थी। अब फैलता और बढ़ता भोपाल 418 वर्ग किमी में है। आबादी का आंकड़ा 24 लाख से ऊपर पहुंच चुका है। इसकी जरुरतें मेट्रो सिटी जैसी है। बदलाव के साथ मेट्रो कल्चर भी तेजी से विकसित हुआ है। इस सबसे वाकिफ होने के बाद भी पुलिस के  मुखियाजी शहर के सभी बाजार रात 11 बजे बंद रखने के हिमायती है। लेकिन उनका ये दृष्टिकोण व्यवहारिक नहीं है। क्योंकि भोपाल की तासीर खुलेपन की और मिजाज शाहाना है।
यहां की फिजा में मासूमियत है। जुबां शीरी। बड़े तालाब की अल्हड़ लहरें शहर की शौकी को बयां करती है। इस वजह से पुलिस के मुखियाजी को सोच में ही बदलाव लाना पड़ेगा। वैसे भी शहर के पटिएबाजों को सड़कों और चौराहों से आपने धकेला तो एक नया बवाल खड़ा होगा। फजीहत होगी आपकी ही। अब क्षेत्रफल और आबादी की गरज से भोपाल अब  बदल चुका है। ऐसे में रात में सारे बाजार बंद हो गए तो लोग परेशान हो रहे हैं। पुलिस को ही कोस रहे है। हुजूर आप  कुछ भी कदम उठाएं लेकिन ख्याल रखें, आपकी जवाबदेही पब्लिक के लिए हैं। लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर लोगों को तकलीफ में न लाएं। ऐसे में लोगों की जरुरतों के साथ उनकी हिफाजत का ख्याल रखना आपकी जिम्मेदारी है। मशविरा इतना है कि दो-तीन स्थानों के बाजार तो खुले रहे ताकि लोगों की जरुरत पूरी हो सके। नागरिकों को शहर में भटकना न पड़े।
अभी सिर्फ भोपाल रेलवे स्टेशन पर ही चुनिंदा चाय-नाश्ते की दुकानें खुलती है। यह काफी नहीं है। इंसानी जरुरतें इसके इतर है। अच्छा हो कि आप अपने मातहतों की मुश्कें कसे। उनकी काउंसलिंग करें। वैसे भी पुलिस की तारीफ तो इस बात से होगी कि बाजार हमेशा खुले रहे और क्राइम पर कंट्रोल रहे। अमूमन आपके महकमे की तारीफ करने वालों की तादाद शहर में ढूंढने से भी कम मिलती है। वजह साफ है, पुलिस का गुंडों में खौफ ही नहीं है। अपने तजुर्बे के कुछ नुस्खे आजमाइए फिर देखिए, करिश्मा। वैसे भी आपका मुखबिर तंत्र तो माशाल्लाहा हैं।
  मध्यप्रदेश पुलिस के आदर्श श्रद्धेय श्री केएफ रुस्तमजी (पूर्व आईजी) से जुड़ी एक बात याद आई। यह मैंने पुलिस अफसरों से ही सुनी है। वे अक्सर कहा करते थे कि बेस्ट पुलिस आफिसर वह है, जिसे ये पता हो कि उसके इलाके में किसके घर में क्या पका है। हांलाकि तब और अब में आबादी और दायरे का फर्क हो सकता है लेकिन मजबूत संपर्क है तो यह मुमकिन है।
प्रसंगवश: पुलिस के मुखिया को याद दिलाना चाहूंगा कि वर्ष 1980 में भोपाल पुलिस के एसपी आरएलएस यादव रहे , तो उनकी पकड़ इतनी सख्त थी कि भोपाल में कोई भी घटना होने पर उन्हें जल्द सूचना मिल जाती और वे खुद वायरलैस सेट पर संबंधित थाने को निर्देश देने के साथ मौके पर पहुंचते। सूचना मिलने का सबसे बड़ा कारण उनका जीवंत संपर्क था। वे जब भोपाल पुलिस के डीआईजी बने तो भी ये सिलसिला कायम रहा। इसी मिसाल को कायम रखा बाद के एसपी स्वराज पुरी और आनंद राव पंवार ने। लेकिन हुजूर अब तो पुलिस अफसरों को नागरिकों के बदले राजनेताओं और मंत्रालय में असर रखने वालों की परिक्रमा और संवाद, संपर्क रखने से ही फुर्सत ही नहीं है।
थोड़ा फ्लैश बैक में: भोपाल में रतजगा की रिवायत नवाबी दौर से है। तब जुमेराती का समद होटल, इब्राहीमपुरा का अहद होटल था। इन दो होटलों की खास बात ये थी कि इनमें दरवाजे नहीं थे। सुबह चार बजे एक घंटे के लिए दोनों होटल बंद होते थे। इसी तरह चौक में ओटले पर एक नाश्ते की दुकान थी तो इब्राहीमपुरा में युसूफ होटल भी रात में खुला रहता था। इन स्थानों पर शहर की कई शख्सियतें मौजूद रहती थीं। मजाल है कि इन लोगों की देर रात तक मौजूदगी से शहर की फिजा में कोई आंच आ जाए।
अलीम बजमी के फेसबुक वॉल से साभार

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