High court: भूमि पर बिना स्वामित्व लंबे समय तक कब्जा होने से निषेधाज्ञा का अधिकार नहीं मिलता

ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के एक अधिकारी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने सरकारी जमीन पर अपने कब्जे का दावा किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भूमि पर लंबे समय तक कब्जा मात्र से, बिना किसी वैध अधिकार के, कोई कानूनी हक या संरक्षण नहीं मिलता। जस्टिस हिर्देश की पीठ ने कहा कि— “जिस व्यक्ति के पास विवादित संपत्ति पर कोई वैधानिक अधिकार या स्वामित्व नहीं है, वह अनधिकृत कब्जेदार या अतिक्रमणकारी होता है। ऐसे व्यक्ति को उस भूमि के संबंध में किसी प्रकार की अस्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) देने का प्रश्न ही नहीं उठता। सार्वजनिक संपत्ति पर केवल लंबे समय तक कब्जा किसी भी प्रकार का लागू करने योग्य अधिकार नहीं देता।”
यह मामला विदिशा जिले के लोहंगीपुर, गणेशगंज मार्ग स्थित एक भूमि से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसकी 1982 में नियुक्ति के बाद उसे विभागीय क्वार्टर के पास खाली जमीन पर अपने खर्च से तीन टिन शेड कमरे बनाने की अनुमति दी गई थी और वहां उसके नाम से बिजली कनेक्शन भी था। वह 30 मई 2020 को सेवानिवृत्त हुआ और 19 जून 2020 को विभागीय क्वार्टर खाली कर दिया, लेकिन इसके बाद भी वह और उसका परिवार विवादित संरचना में रहना जारी रखे हुए थे।
याचिकाकर्ता ने यह स्वीकार किया कि जमीन पर उसका कोई कानूनी स्वामित्व नहीं है, लेकिन उसने लंबे समय से कब्जे के आधार पर संरक्षण मांगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कहा कि वह सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से रह रहा है, इसलिए उसे कोई राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराते हुए कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिल सकती और केवल लंबे समय तक कब्जा होने से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।





