20 साल से कवायद… पांच नगर सरकार-दो दर्जन कलेक्टर बदल गए, लेकिन डेयरियां शहर से बाहर शिफ्ट नहीं हो पाईं

अलीम बजमी

45 बरस से शहर का सबसे बड़ा दर्द… अवैध डेयरियां। प्रदेश की नौ सरकारें, पांच नगर सरकारें और दो दर्जन कलेक्टर बदल गए, लेकिन कोई भी अवैध डेयरियों को शहर से बाहर नहीं कर पाया है। हालांकि 20 साल पहले शहर को “कैटल फ्री’ करने का ऐलान हुआ, लेकिन हकीकत में तस्वीर बदल नहीं पाई। यह फरमान भी अवैध डेयरियों का मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल में पहुंचने पर जारी हुआ था। बीते दो दशक में शहर के अलग-अलग हिस्सों में डेयरियों के विस्थापन के लिए जगहें भी चिह्नित हुईं, लेकिन अब तक नतीजा सिफर ही रहा। सिस्टम की बेपरवाही का खामियाजा शहर के लोग रोज ही उठा रहे हैं। भोपाल में पहली बार डेयरी को शहर से बाहर विस्थापित करने की कवायद 1976 में गोर्वधन परियोजना के रूप में हुई थी। तब भोपाल नगर निगम के प्रशासक महेश नीलकंठ बुच थे। उन्होंने डेरियों का विस्थापन कोकता में कराया था। यहां शहर की तमाम डेरियों को भेजा भी गया। बुनियादी प्रबंध भी किए गए। डेरी मालिकों की परिवहन सुविधा के लिए तीन शिफ्ट में दो-दो ट्रक और दो शिफ्ट में एक बस चलाने का निर्णय हुआ, लेकिन एक दशक में यह सुविधा बंद होने पर एक-एक करके तमाम डेरियां वापस शहर में ही लौट आईं।

2016 में हुई “कैटल फ्री’ शहर घोषणा की गई
ये मामला 2010 में फिर गर्माया। तब शहर में डेयरियों के विस्थापन की योजना बनी थी। उस समय करीब 250 डेरियां थीं। इनके संचालकों को निगम ने भैसाखेड़ी में 1500-1500 वर्गफीट के प्लॉट आवंटित किए थे। सिर्फ 10% लोग ही यहां गए, जो एक महीने बाद ही शहर में लौट आए। 2016 में एनजीटी के आदेश पर शासन ने बड़े शहरों के रिहायशी इलाकों में पशु पालन पर रोक लगाते हुए शहर को “कैटल फ्री’ जोन घोषित किया था। डेयरी विस्थापन के लिए गाइड लाइन के तहत उन्हीं डेयरी संचालकों को निगम सीमा से बाहर रियायती दरों पर जमीन आवंटित करने को कहा था, जिनके पास 2015 या उससे पहले का गुमास्ता (लाइसेंस) और दुग्ध संघ में रजिस्ट्रेशन हो। निगम अधिकारियों ने डेरियों की पड़ताल की तो पता चला- 90% डेयरी संचालकों के पास गुमास्ता और दुग्ध संघ का रजिस्ट्रेशन ही नहीं है। ऐसे में निगम प्रशासन ने शासन से डेयरी शिफ्टिंग गाइड लाइन को शिथिल करने का प्रस्ताव भेजा जो अब भी राज्य सचिवालय की फाइलों में कहीं दबा पड़ा है।

यहां आवंटित हुई हैं जमीनें
डेयरी विस्थापन के लिए जिला प्रशासन ने नगर निगम को शहर से बाहर चारों दिशाओं में सात-सात एकड़ जमीन ग्राम दीपड़ी, परवलिया, अरवलिया, कालापानी, तूमड़ा, मुगालियाकोट और कालापानी में आवंटित कर रखी है, लेकिन चिह्नित स्थानों पर बुनियादी सुविधाएं जैसे- सड़क, बिजली और पानी नहीं है। नतीजतन, डेयरी विस्थापन अब तक अटका हुआ है।

विस्थापन नीति न होने से मामला अटका
भोपाल में डेयरियों को हटाने के लिए नीति नहीं होने पर शासन ने जुलाई 2017 में नीति निर्धारण तथा क्रियान्वयन के लिए समिति गठित की थी। जिसमें प्रमुख सचिव पशुपालन, नगरीय विकास एवं आवास तथा प्रमुख सचिव, राजस्व को सदस्य बनाया गया। समिति में ऊर्जा विभाग, वाणिज्यिक कर विभाग, वित्त विभाग, कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त को डेयरी मालिकों से सुझाव लेने एवं उनकी आपत्तियों पर चर्चा करने का जिम्मा सौंपा था, लेकिन समिति गठित होने के बाद ठोस रूप में अमल में नहीं आ सकी।

ग्रीन ट्रिब्यूनल के कहने पर भी नहीं बना एक्शन प्लान
ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 11 मार्च को तीन महीने में डेरियों के विस्थापन के लिए एक्शन प्लान बनाने को कहा था, लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी प्लान नहीं बन सका। इस दौरान निगम ने करीब 400 डेरियों के संचालकों को नोटिस जरूर दिए, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं की। वहीं, उसने अब तक शहर में मौजूद डेरियों में कुल मवेशियों की संख्या का भी सर्वे नहीं किया है।

मवेशी से टकराने में हुई थी दो युवकों की मौत
गत जुलाई में 26 साल के गौरव बिलखिरिया से देर रात को अपने घर की ओर लौट रहे थे। वे अंधेरे में मवेशियों से टकरा गए। दुर्घटना इतनी भयानक थी कि कई दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद उन्होंने दम तोड़ दिया। ये कोई पहला मामला नहीं है। अगस्त महीने में कोलार रोड पर 32 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रत्यूष त्रिपाठी की बाइक सड़क पर बैठे आवारा मवेशी से टकरा गई। टक्कर में सिर में चोट लगने से प्रत्यूष की मौत हो गई थी।

साभार

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

Related Articles