भोपाल। क्या केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड की तर्ज पर सनातन बोर्ड का गठन करने की तैयारी कर रही है? क्या इसमें उन्ही साधु संतों क़ो शामिल किया जायेगा, जो सरकार के साथ हैँ? और, क्या वाकई सभी मंदिरों क़ो इस बोर्ड के अधीन करके बीजेपी सभी धर्मस्थलों पर अपना अधिकार ज़माने में सफल हो जाएगी?
हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में जगदगुरु शंकराचार्य अविमुक्तरेश्वरानंद के साथ जो अभद्र और अशोभनीय व्यवहार हुआ, उसके बाद एक बार फिर उक्त सवाल उठने लगे हैँ। पिछले साल माघ मेले में धर्म संसद में इस तरह का प्रस्ताव पारित कराया गया था। हालांकि उस प्रस्ताव क़ो उस समय ज्यादा महत्व मिलते नहीं दिखा, लेकिन भाजपा और संघ के तमाम लोग इस पर अमल करने क़ो आतुर दिखाई देते रहे हैँ.
महाकुंभ में पिछले साल 27 जनवरी को धर्म संसद का आयोजन किया गया. इसमें देश भर के प्रमुख साधु-संत शामिल हुए. महाकुंभ में सोमवार को हुई धर्म संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सनातन बोर्ड बनाने की मांग की गई. हालांकि, धर्म संसद में 13 अखाड़े और सभी 4 शंकराचार्य इसमें शामिल नहीं हुए. इस संसद में कई बातों को लेकर चर्चा हुईं.
महाकुंभ में सनातन धर्म संसद में आध्यात्मिक नेता देवकीनंदन ठाकुर ने कहा, “हमने सनातनी हिंदू बोर्ड अधिनियम के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है, और यहां मौजूद सभी धार्मिक नेताओं ने इस पर सहमति व्यक्त की है… हम इस संविधान को भारत सरकार को भेजेंगे और इस पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका समय मांगेंगे, इस उम्मीद के साथ कि अगर वक्फ बोर्ड होगा, तो सरकार हिंदुओं और सनातनियों को एक सनातन बोर्ड का तोहफा देगी…”
इसका उद्देश्य मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना, केंद्रीय प्रबंधन प्रणाली बनाना और सनातन संस्कृति का प्रचार करना बताया गया। लेकिन असल मुद्दा ये है कि in पर सत्तपक्ष के लोग कब्ज़ा करने की तैयारी कर रहे हैँ।
जैसे वक्फ बोर्ड मदरसे चला रहा हैँ, ऐसे ही मंदिरों में धर्म के स्कूल खोलने की तैयारी की जाएगी। इनका प्रबंधन पूरी तरह सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रहेगा।
