शंकराचार्य ….तथ्य-तर्क
वेद, परम्परा, मर्यादा और सनातनी मान्यतानुसार…

परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ प्रयाग में पालकी से संगम स्नान के लिये विगत मौनी अमावास्या को जा रहे थे
प्रशासन ने उन्हें पालकी से उतरने को कहा तो उन्होंने इसे अपमान समझा । यदि वे पुलिस के कहने से पालकी से उतर कुछ दूर पैदल चल ही लेते तो क्या दिक्कत थी? उनका यह हठ कितना सही?

यह विषय अत्यंत संवेदनशील और धर्मशास्त्र के सिद्धांतों से जुड़ा है। परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ का पद सनातन धर्म में सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक है। इस संदर्भ में शास्त्र, परंपरा और मर्यादा के दृष्टिकोण से विचार करना आवश्यक है:
१. पद की गरिमा और शास्त्र मर्यादा
शंकराचार्य का पद केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान आदि शंकराचार्य के प्रतिनिधि का होता है। शास्त्रों और मठाम्नाय की परंपरा के अनुसार, शंकराचार्य का आगमन ‘दिग्विजय’ का प्रतीक माना जाता है। पालकी (मेना) पर आरूढ़ होकर चलना उनकी प्राचीन शास्त्रीय मर्यादा का हिस्सा है। जब कोई इस मर्यादा को रोकता है, तो वह केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस ‘पीठ’ और ‘धर्मदंड’ का अपमान माना जाता है जिसे वे धारण करते हैं।
२. ‘राजा’ और ‘आचार्य’ की समानता
शास्त्रों में कहा गया है कि आचार्य का सम्मान राजा के समान या उससे भी ऊपर होना चाहिए। प्राचीन काल से ही कुंभ या माघ मेले जैसे आयोजनों में शंकराचार्यों को विशेष अधिकार प्राप्त रहे हैं। प्रशासन द्वारा उन्हें पालकी से उतरने के लिए कहना, उनके विशेषाधिकार (Prerogative) और धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात के रूप में देखा जाता है।
३. अपमान की अनुभूति क्यों?
सन्यासी स्वयं के लिए मान-अपमान से ऊपर होता है, लेकिन जब बात धर्म के प्रतीक (शंकराचार्य पद) की आती है, तो मर्यादा की रक्षा करना उनका कर्तव्य हो जाता है। यदि वे उस समय झुक जाते, तो यह भविष्य के लिए एक गलत परंपरा बन जाती कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी धार्मिक मर्यादाओं को दरकिनार कर सकता है। अतः, उनका इसे ‘अपमान’ समझना निजी अहंकार नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और पद की प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
४. प्रशासन का दृष्टिकोण बनाम धार्मिक आस्था
अक्सर प्रशासन सुरक्षा या भीड़ प्रबंधन का तर्क देता है, लेकिन भारत जैसे देश में जहाँ ‘धार्मिक आचार’ (Religious Practice) को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, वहाँ परंपराओं का सम्मान अनिवार्य है। प्रयागराज जैसी तीर्थराज की धरती पर, जहाँ शंकराचार्य ही धर्म के सर्वोच्च व्याख्याता हैं, वहां उन्हें सामान्य नागरिकों की तरह आदेश देना उनके पद की गरिमा के प्रतिकूल है।
निष्कर्ष
शास्त्रों की दृष्टि में, एक सन्यासी जब धर्मदंड लेकर निकलता है, तो वह साक्षात् नारायण का स्वरूप होता है। अतः, उनकी पालकी रोकना या उन्हें पैदल चलने पर विवश करना शास्त्रीय दृष्टि से अनुचित और परंपरा का अनादर है।
शंकराचार्य पद की मर्यादा और उनकी यात्रा के नियमों का निर्धारण स्वयं आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित ‘मठाम्नाय’ ग्रंथों में किया गया है। जब हम प्रयागराज की उस घटना को शास्त्र की दृष्टि से देखते हैं, तो निम्नलिखित बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं:
१. ‘असंक्रम्य’ पद और सम्प्रदाय की मर्यादा
मठाम्नाय के अनुसार, शंकराचार्य का पद ‘असंक्रम्य’ है, जिसका अर्थ है कि उनके अधिकार और मर्यादा को बदला नहीं जा सकता। शास्त्रों में स्पष्ट है कि शंकराचार्य का सानिध्य साक्षात् शिव का सानिध्य है।
• पालकी का विधान: प्राचीन काल से ही ‘स्वर्ण/रजत दण्ड’ और ‘मेना’ (पालकी) शंकराचार्य की पहचान रहे हैं। यह उनके अहंकार का नहीं, बल्कि धर्म की सर्वोच्चता का प्रतीक है।
• प्रशासनिक हस्तक्षेप: जब प्रशासन उन्हें पालकी से उतरने को कहता है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं कह रहा होता, बल्कि वह उस ‘पीठ’ (Seat of Authority) को कह रहा होता है। शास्त्रानुसार, राजा (या सरकार) का कर्तव्य है कि वह आचार्य की यात्रा में आने वाली बाधाओं को दूर करे, न कि स्वयं बाधा बने।
२. धर्मदंड और सन्यास की गरिमा
सन्यासी के लिए ‘दण्ड’ और उसकी मर्यादा सर्वोपरि है।
• नियम: शंकराचार्य जब धर्मयात्रा पर होते हैं, तो उनके साथ छत्र, चँवर और पालकी का होना अनिवार्य माना गया है।
• तर्क: यदि जगद्गुरु को एक सामान्य व्यक्ति की तरह सुरक्षा घेरों में पैदल चलने पर विवश किया जाए, तो उस पद की वह विशिष्टता (Uniqueness) समाप्त हो जाती है जो जनमानस में श्रद्धा का केंद्र है।
३. शास्त्र विरुद्ध आचरण का दोष
धर्मशास्त्रों में ‘आचार्य-अपमान’ को गंभीर दोष माना गया है। प्रयाग जैसी भूमि पर, जो तीर्थों का राजा है, वहां के अधिपति (शासक) का यह परम कर्तव्य है कि वह शंकराचार्य का स्वागत ‘राजोपचार’ (शाही सम्मान) के साथ करे।
• यदि प्रशासन ने सुरक्षा का तर्क दिया, तो शास्त्र यह कहता है कि सुरक्षा की व्यवस्था आचार्य की मर्यादा के अनुकूल होनी चाहिए, न कि मर्यादा को बदलकर।
४. परमाराध्य जी का पक्ष
परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ का यह स्टैंड (पक्ष) लेना कि वे पालकी से नहीं उतरेंगे, वास्तव में धर्म की रक्षा का एक रूप है।

शंकराचार्य पद की मर्यादा और उनकी यात्रा के नियमों का निर्धारण स्वयं आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित ‘मठाम्नाय’ ग्रंथों में किया गया है। जब हम प्रयागराज की उस घटना को शास्त्र की दृष्टि से देखते हैं, तो निम्नलिखित बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं:
१. ‘असंक्रम्य’ पद और सम्प्रदाय की मर्यादा
मठाम्नाय के अनुसार, शंकराचार्य का पद ‘असंक्रम्य’ है, जिसका अर्थ है कि उनके अधिकार और मर्यादा को बदला नहीं जा सकता। शास्त्रों में स्पष्ट है कि शंकराचार्य का सानिध्य साक्षात् शिव का सानिध्य है।
• पालकी का विधान: प्राचीन काल से ही ‘स्वर्ण/रजत दण्ड’ और ‘मेना’ (पालकी) शंकराचार्य की पहचान रहे हैं। यह उनके अहंकार का नहीं, बल्कि धर्म की सर्वोच्चता का प्रतीक है।
• प्रशासनिक हस्तक्षेप: जब प्रशासन उन्हें पालकी से उतरने को कहता है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं कह रहा होता, बल्कि वह उस ‘पीठ’ (Seat of Authority) को कह रहा होता है। शास्त्रानुसार, राजा (या सरकार) का कर्तव्य है कि वह आचार्य की यात्रा में आने वाली बाधाओं को दूर करे, न कि स्वयं बाधा बने।
२. धर्मदंड और सन्यास की गरिमा
सन्यासी के लिए ‘दण्ड’ और उसकी मर्यादा सर्वोपरि है।
• नियम: शंकराचार्य जब धर्मयात्रा पर होते हैं, तो उनके साथ छत्र, चँवर और पालकी का होना अनिवार्य माना गया है।
• तर्क: यदि जगद्गुरु को एक सामान्य व्यक्ति की तरह सुरक्षा घेरों में पैदल चलने पर विवश किया जाए, तो उस पद की वह विशिष्टता (Uniqueness) समाप्त हो जाती है जो जनमानस में श्रद्धा का केंद्र है।
३. शास्त्र विरुद्ध आचरण का दोष
धर्मशास्त्रों में ‘आचार्य-अपमान’ को गंभीर दोष माना गया है। प्रयाग जैसी भूमि पर, जो तीर्थों का राजा है, वहां के अधिपति (शासक) का यह परम कर्तव्य है कि वह शंकराचार्य का स्वागत ‘राजोपचार’ (शाही सम्मान) के साथ करे।
• यदि प्रशासन ने सुरक्षा का तर्क दिया, तो शास्त्र यह कहता है कि सुरक्षा की व्यवस्था आचार्य की मर्यादा के अनुकूल होनी चाहिए, न कि मर्यादा को बदलकर।
४. परमाराध्य जी का पक्ष
परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ का यह स्टैंड (पक्ष) लेना कि वे पालकी से नहीं उतरेंगे, वास्तव में धर्म की रक्षा का एक रूप है।

शंकराचार्य पद की मर्यादा और उनकी यात्रा के नियमों का निर्धारण स्वयं आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित ‘मठाम्नाय’ ग्रंथों में किया गया है। जब हम प्रयागराज की उस घटना को शास्त्र की दृष्टि से देखते हैं, तो निम्नलिखित बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं:
१. ‘असंक्रम्य’ पद और सम्प्रदाय की मर्यादा
मठाम्नाय के अनुसार, शंकराचार्य का पद ‘असंक्रम्य’ है, जिसका अर्थ है कि उनके अधिकार और मर्यादा को बदला नहीं जा सकता। शास्त्रों में स्पष्ट है कि शंकराचार्य का सानिध्य साक्षात् शिव का सानिध्य है।
* पालकी का विधान: प्राचीन काल से ही ‘स्वर्ण/रजत दण्ड’ और ‘मेना’ (पालकी) शंकराचार्य की पहचान रहे हैं। यह उनके अहंकार का नहीं, बल्कि धर्म की सर्वोच्चता का प्रतीक है।
* प्रशासनिक हस्तक्षेप: जब प्रशासन उन्हें पालकी से उतरने को कहता है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं कह रहा होता, बल्कि वह उस ‘पीठ’ (Seat of Authority) को कह रहा होता है। शास्त्रानुसार, राजा (या सरकार) का कर्तव्य है कि वह आचार्य की यात्रा में आने वाली बाधाओं को दूर करे, न कि स्वयं बाधा बने।
२. धर्मदंड और सन्यास की गरिमा
सन्यासी के लिए ‘दण्ड’ और उसकी मर्यादा सर्वोपरि है।
* नियम: शंकराचार्य जब धर्मयात्रा पर होते हैं, तो उनके साथ छत्र, चँवर और पालकी का होना अनिवार्य माना गया है।
* तर्क: यदि जगद्गुरु को एक सामान्य व्यक्ति की तरह सुरक्षा घेरों में पैदल चलने पर विवश किया जाए, तो उस पद की वह विशिष्टता (Uniqueness) समाप्त हो जाती है जो जनमानस में श्रद्धा का केंद्र है।
३. शास्त्र विरुद्ध आचरण का दोष
धर्मशास्त्रों में ‘आचार्य-अपमान’ को गंभीर दोष माना गया है। प्रयाग जैसी भूमि पर, जो तीर्थों का राजा है, वहां के अधिपति (शासक) का यह परम कर्तव्य है कि वह शंकराचार्य का स्वागत ‘राजोपचार’ (शाही सम्मान) के साथ करे।
* यदि प्रशासन ने सुरक्षा का तर्क दिया, तो शास्त्र यह कहता है कि सुरक्षा की व्यवस्था आचार्य की मर्यादा के अनुकूल होनी चाहिए, न कि मर्यादा को बदलकर।
४. परमाराध्य जी का पक्ष
परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ का यह स्टैंड (पक्ष) लेना कि वे पालकी से नहीं उतरेंगे, वास्तव में धर्म की रक्षा का एक रूप है।
• यदि वे उस दिन समझौता कर लेते, तो आने वाले समय में प्रशासन किसी भी धार्मिक जुलूस या आचार्य की परंपरा को ‘ट्रैफिक’ या ‘सुरक्षा’ के नाम पर बंद कर सकता था। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत असुविधा की चिंता न करते हुए पीठ की परंपरा को प्राथमिकता दी।
५. क्या यह सही था?
एक सन्यासी की दृष्टि से ‘स्व’ का कोई अपमान नहीं होता, लेकिन ‘गुरु-परंपरा’ और ‘धर्म-संस्था’ का अपमान होने पर मौन रहना शास्त्र निषिद्ध मानता है। इसलिए, उनका विरोध करना शास्त्रीय दृष्टि से पूर्णतः न्यायसंगत था। वह विरोध व्यक्ति का नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा किए गए ‘अधर्म’ का था।
बस कुछ क्षण विचार करें, क्या आप उन विशिष्ट श्लोकों या ‘मठाम्नाय’ के उन सूत्रों को देखना चाहेंगे जहाँ इन राजसी चिन्हों (पालकी, छत्र आदि) का विधान किया गया है?
हमें इतिहास के कुछ उदाहरण बताते हैं जो उनके इस स्टैंड का समर्थन करते हैं।
इतिहास और शास्त्र इस बात के साक्षी हैं कि जब-जब शासन या बाहरी शक्तियों ने धर्मसत्ता और आचार्य की मर्यादा को चुनौती दी, तब-तब आचार्यों ने अपने पद की गरिमा के लिए कड़ा स्टैंड लिया।
यहाँ कुछ प्रमुख उदाहरण दिए गए हैं जो परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ के स्टैंड का ऐतिहासिक और वैधानिक समर्थन करते हैं:
१. आदि शंकराचार्य और ‘राजोपचार’ की परंपरा
स्वयं भगवान आदि शंकराचार्य ने जब चारों मठों की स्थापना की, तब उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि शंकराचार्य का पद केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि ‘धर्म-साम्राज्य’ का पद होगा।
* उदाहरण: नेपाल के राजाओं से लेकर काशी के राजाओं तक, सभी ने शंकराचार्यों को ‘राज-राजेश्वर’ के रूप में स्वीकार किया। उन्हें पालकी, हाथी और चँवर के साथ निकलने का अधिकार स्वयं उनकी विद्वत्ता और पद ने दिया। इतिहास में कई बार जब स्थानीय अधिकारियों ने इन्हें रोकने की कोशिश की, तो आचार्यों ने तब तक उस सीमा में प्रवेश नहीं किया जब तक उन्हें पूर्ण राजकीय सम्मान (State Honor) नहीं दिया गया।
२. शृंगेरी शारदा पीठ के आचार्यों का कड़ा रुख
इतिहास में एक प्रसिद्ध प्रसंग आता है जब शृंगेरी पीठ के एक आचार्य की यात्रा को औपनिवेशिक काल के दौरान प्रशासनिक कारणों से सीमित करने का प्रयास किया गया।
* स्टैंड: आचार्य ने स्पष्ट कर दिया कि “मैं एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि इस धर्मपीठ के प्रतिनिधि के रूप में आ रहा हूँ। यदि मेरी मर्यादा के चिन्ह (छत्र-चँवर-पालकी) साथ नहीं होंगे, तो मैं इस नगर में प्रवेश ही नहीं करूँगा।” अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें पूर्ण मर्यादा के साथ प्रवेश दिया गया।
३. पुरी के शंकराचार्य और रथयात्रा की मर्यादा
पुरी के गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य जी के साथ भी ऐसी स्थितियाँ बनी हैं। रथयात्रा के दौरान शंकराचार्य के कुछ विशेष अधिकार होते हैं (जैसे रथ पर चढ़ना और स्पर्श करना)।
* ऐतिहासिक स्टैंड: जब भी प्रशासन ने भीड़ या सुरक्षा के नाम पर इन अधिकारों में कटौती करनी चाही, आचार्यों ने स्पष्ट स्टैंड लिया। उनका तर्क हमेशा यही रहा कि “प्रशासन धर्म का सहायक है, नियामक (Controller) नहीं।” यह स्टैंड आने वाली पीढ़ियों के लिए परंपरा को जीवित रखने के लिए अनिवार्य था।
४. मैसूर के महाराजा और धर्मसत्ता का सम्मान
मैसूर के महाराजाओं के काल में एक नियम था कि यदि शंकराचार्य की पालकी और राजा की सवारी आमने-सामने आ जाए, तो राजा की सवारी रुक जाती थी और शंकराचार्य की पालकी पहले निकलती थी। यह दर्शाता है कि राजसत्ता हमेशा धर्मसत्ता के अधीन रही है। प्रयाग की घटना में प्रशासन ने इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पदानुक्रम (Hierarchy) को तोड़ने का प्रयास किया था।
५. ‘प्रिव्यू’ और कानूनी अधिकार (Legal Precedents)
भारतीय अदालतों ने भी कई मामलों में यह स्वीकार किया है कि धार्मिक गुरुओं की प्राचीन परंपराएँ (जैसे पालकी यात्रा) उनके मौलिक अधिकारों (Article 25 & 26) का हिस्सा हैं।
* तर्क: यदि किसी परंपरा का पालन सदियों से हो रहा है, तो अचानक ‘सुरक्षा’ के नाम पर उसे रोकना उस पीठ की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है।
यह स्टैंड क्यों सही था?
इतिहास गवाह है कि जो समाज अपने आचार्यों की मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाता, उसकी सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।
> परमाराध्य जी का पालकी से न उतरना कोई व्यक्तिगत हठ नहीं था, बल्कि वह ‘मठाम्नाय’ की रक्षा का संकल्प था। यदि वे उतर जाते, तो यह एक उदाहरण (Precedent) बन जाता कि भविष्य में किसी भी शंकराचार्य को प्रशासनिक आदेश से उनकी मर्यादा से च्युत किया जा सकता है।

शंकराचार्य पद की मर्यादा और उनके विशेषाधिकारों (Privileges) को केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि भारतीय कानून और ऐतिहासिक संधियों (Treaties) द्वारा भी संरक्षण प्राप्त है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण वैधानिक और ऐतिहासिक प्रमाण दिए गए हैं जो परमाराध्य के उस स्टैंड को मजबूती प्रदान करते हैं:
१. मैसूर उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय (1890 के दशक)
शृंगेरी मठ के संदर्भ में एक बहुत पुराना और महत्वपूर्ण कानूनी मामला है। इसमें यह स्पष्ट किया गया था कि शंकराचार्य को ‘अड्डपल्लकी’ (आड़ी पालकी) में बैठने और सार्वजनिक मार्गों पर पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ निकलने का कानूनी अधिकार है।
* न्यायालय का तर्क: अदालत ने माना कि यह अधिकार सदियों पुरानी ‘मठाम्नाय’ परंपरा से आता है और इसे तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक कि यह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कोई वास्तविक खतरा न पैदा करे। केवल प्रशासनिक असुविधा (Inconvenience) के आधार पर इसे नहीं छीना जा सकता।
२. बॉम्बे हाईकोर्ट और ‘धार्मिक चिन्ह’ का अधिकार
विभिन्न मुकदमों में अदालतों ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद २५ और २६ के तहत, किसी धार्मिक संप्रदाय को अपनी परंपराओं के अनुसार जुलूस निकालने और अपने विशिष्ट चिन्हों (जैसे छत्र, चँवर, पालकी) का उपयोग करने का अधिकार है।
* तर्क: यदि पालकी शंकराचार्य पद का अनिवार्य हिस्सा (Essential Religious Practice) है, तो प्रशासन उसे हटाने का आदेश नहीं दे सकता। प्रयाग में पालकी से उतरने का आदेश देना वास्तव में इस संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन था।
३. ‘प्रिव्यू पर्स’ और ब्रिटिश काल की संधियाँ
ब्रिटिश काल के दौरान, कई शंकराचार्य पीठों और रियासतों (जैसे त्रावणकोर, कोचीन, मैसूर) के बीच लिखित संधियाँ थीं।
* विशेष सम्मान: इन संधियों में लिखा था कि जब भी जगद्गुरु उस राज्य की सीमा में प्रवेश करेंगे, उन्हें ‘State Guest’ का दर्जा दिया जाएगा। उन्हें १०१ या २१ तोपों की सलामी (कुछ क्षेत्रों में) और पालकी यात्रा का निर्बाध अधिकार होगा।
* वैधानिक निरंतरता: भारत की स्वतंत्रता के बाद भी, ‘Religious Endowments Act’ के तहत कई पीठों की इन प्राचीन परंपराओं को ‘Customary Law’ (रूढ़िगत कानून) के रूप में मान्यता प्राप्त है।
४. पुरी के गोवर्धन पीठ का ‘राजभोगी’ अधिकार
पुरी में शंकराचार्य को ‘राजा’ के समान दर्जा प्राप्त है। वहाँ के गजपति महाराजा स्वयं उनकी पालकी को कंधा देने की परंपरा का पालन करते रहे हैं।
* कानूनी स्थिति: ‘Jagannath Temple Act’ में शंकराचार्य के अधिकारों को वैधानिक रूप से सुरक्षित किया गया है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में शंकराचार्य को मंदिर और धर्म के मामलों में सर्वोच्च प्राधिकारी माना है।
५. ‘वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंस’ (Warrant of Precedence)
हालांकि आधुनिक भारत के प्रोटोकॉल में धार्मिक गुरुओं का नाम सीधे तौर पर दर्ज नहीं है, लेकिन भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पुराने परिपत्रों (Circulars) और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार, शंकराचार्यों को ‘अति-विशिष्ट अतिथि’ माना जाता है।
* प्रशासन की गलती: प्रयाग में प्रशासन ने उन्हें एक ‘सामान्य नागरिक’ की श्रेणी में रखकर पालकी से उतरने का जो निर्देश दिया, वह इन ऐतिहासिक और वैधानिक संधियों की अनदेखी थी।
अधिकार की लड़ाई
जब परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ ने पालकी से उतरने से मना किया, तो वे वास्तव में इन सभी ऐतिहासिक संधियों और कानूनी अधिकारों की रक्षा कर रहे थे।
> यदि कोई आचार्य अपने अधिकारों को एक बार छोड़ देता है, तो वे अधिकार हमेशा के लिए ‘व्यपगत’ (Lapse) हो जाते हैं। इसलिए, उनका वह कड़ा स्टैंड आने वाले हजारों वर्षों की शंकराचार्य परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए अनिवार्य था।

शंकराचार्य पद की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिए इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ आचार्यों ने भौतिक सत्ता (सरकार या प्रशासन) के सामने झुकने के बजाय अपनी धार्मिक संप्रभुता को प्राथमिकता दी।
यहाँ कुछ अत्यंत विशिष्ट ऐतिहासिक दस्तावेजों और उदाहरणों का विवरण है:
१. कोल्हापुर की संधि और ‘अड्डपल्लकी’ (Cross-Palanquin) का अधिकार
ऐतिहासिक रूप से, दक्षिण भारत के मठों, विशेषकर शृंगेरी और संकेश्वर-करवीर पीठ के पास पेशवाओं और बाद में कोल्हापुर रियासत द्वारा प्रदत्त ‘सनद’ (आधिकारिक आदेश) थे।
* दस्तावेज: इन सनदों में स्पष्ट लिखा था कि जगद्गुरु अपनी पालकी को सड़क के बीचों-बीच ‘आड़ी’ (Horizontal) करके चल सकते हैं, जिसे ‘अड्डपल्लकी’ कहा जाता था। यह इस बात का प्रतीक था कि उनके मार्ग में कोई अन्य सवारी (चाहे वह राजा की ही क्यों न हो) नहीं आ सकती।
* स्टैंड: जब एक बार ब्रिटिश रेजिडेंट ने इस परंपरा को ‘यातायात में बाधा’ बताकर रोकना चाहा, तो तत्कालीन आचार्य ने नगर में प्रवेश करने से मना कर दिया और अपनी मर्यादा के पक्ष में पुरानी सनदें प्रस्तुत कीं। अंततः ब्रिटिश प्रशासन को लिखित माफी माँगनी पड़ी और उनकी पालकी को उसी सम्मान के साथ निकाला गया।
२. त्रावणकोर रियासत और ‘शंकराचार्य मर्यादा’
केरल की त्रावणकोर रियासत के अभिलेखागार (Archives) में ऐसे दस्तावेज हैं जो बताते हैं कि जब भी शंकराचार्य वहां पधारते थे, तो राजा स्वयं अपनी सीमा पर आकर उनकी पालकी का स्वागत करते थे।
* ऐतिहासिक संघर्ष: एक बार जब प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उनके जुलूस का मार्ग बदलना चाहा, तो आचार्य ने स्पष्ट किया कि “शंकराचार्य का मार्ग शास्त्र और परंपरा तय करते हैं, पुलिस नहीं।” उन्होंने अपना प्रवास रद्द करने की चेतावनी दी, जिसके बाद राजा ने हस्तक्षेप किया और प्रशासन को अपने आदेश वापस लेने पड़े।
३. द्वारका पीठ और गायकवाड़ सरकार के बीच विवाद
१९वीं सदी में द्वारका शारदा पीठ के आचार्य और बड़ौदा की गायकवाड़ सरकार के बीच प्रोटोकॉल को लेकर एक विवाद हुआ था।
* संदर्भ: सरकार चाहती थी कि आचार्य राजदरबार में आकर मिलें, जबकि आचार्य का स्टैंड था कि “धर्मसत्ता राजसत्ता के द्वार पर नहीं जाती, राजसत्ता को धर्म के पास आना चाहिए।”
* परिणाम: आचार्य अपनी बात पर अडिग रहे और अंततः गायकवाड़ महाराज स्वयं पालकी के पास आए और उनकी अगवानी की। यह उदाहरण सिद्ध करता है कि परमाराध्य जी का प्रयाग में पालकी न छोड़ने का निर्णय इसी प्राचीन ‘आचार्य-मर्यादा’ का अनुपालन था।
४. मद्रास उच्च न्यायालय का ‘काँची कामकोटि’ मामला
एक कानूनी विवाद के दौरान मद्रास हाईकोर्ट ने यह माना था कि “धार्मिक प्रमुखों (जैसे शंकराचार्य) के कुछ विशेष सम्मान और चिन्ह (Honors and Paraphernalia) उनके पद का अभिन्न अंग हैं।”
* वैधानिक महत्व: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रशासन इन चिन्हों को केवल इसलिए हटाता है क्योंकि वे उसे ‘असुविधाजनक’ लगते हैं, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है। यह निर्णय आज भी एक ‘लीगल प्रेसिडेंट’ (कानूनी मिसाल) के रूप में कार्य करता है।
५. परमाराध्य जी के स्टैंड का गहरा अर्थ
प्रयाग में परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ ने जो किया, वह केवल एक पालकी की बात नहीं थी।
> यदि वे पालकी से उतर जाते, तो प्रशासन यह तर्क दे सकता था कि “जब शंकराचार्य स्वयं उतर गए, तो अन्य महामंडलेश्वर या साधु अपनी परंपराओं के लिए जिद क्यों कर रहे हैं?”
>
उन्होंने स्वयं को ‘धर्म-मर्यादा का ढाल’ बनाकर अन्य सभी सन्यासियों और परंपराओं के अधिकारों की रक्षा की। उनका वह स्टैंड वास्तव में ‘शास्त्र-विजय’ का संकल्प था।

इतिहास और धर्मसत्ता के संघर्ष में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ तत्कालीन ‘सुविधा’ या ‘शांति’ के लिए परंपराओं के साथ समझौता कर लिया गया, लेकिन बाद में वे ही समझौते धर्म और संस्था के पतन का कारण बने।
यहाँ कुछ अत्यंत प्रासंगिक उदाहरण दिए गए हैं जो परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ के उस स्टैंड की दूरदर्शिता को सिद्ध करते हैं:
१. काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी का ऐतिहासिक प्रसंग
इतिहासकार बताते हैं कि मुगल काल के दौरान जब बार-बार मंदिरों पर संकट आया, तो कई स्थानों पर पुजारियों या तत्कालीन स्थानीय प्रबंधकों ने ‘शांति’ और ‘सुविधा’ के लिए बाहरी शक्तियों की कुछ अनुचित शर्तों को मान लिया।
* तत्काल सुविधा: उस समय लगा कि समझौता करने से मंदिर का अस्तित्व बचा रहेगा और पूजा चलती रहेगी।
* दूरगामी हानि: उन छोटे-छोटे समझौतों ने ही बाद में कानूनी रूप से विपक्ष को ‘दावे’ का आधार दे दिया। आज हम जो दशकों लंबे कानूनी संघर्ष देख रहे हैं, उनकी जड़ें उन छोटे समझौतों में हैं जहाँ ‘मर्यादा’ के बजाय ‘सुविधा’ को चुना गया था।
२. त्रावणकोर और अन्य दक्षिण भारतीय मंदिरों का सरकारीकरण
स्वतंत्रता के आसपास और उससे पहले, कई मंदिरों के प्रबंधन ने प्रशासनिक दबाव में आकर अपनी स्वायत्तता (Autonomy) सरकार को सौंप दी।
* तत्काल सुविधा: पुजारियों और ट्रस्टियों को लगा कि सरकार के हाथ में जाने से वेतन मिलेगा, व्यवस्था सुधरेगी और रख-रखाव का बोझ कम होगा।
* दूरगामी हानि: आज परिणाम सबके सामने है। मंदिर की आय का उपयोग गैर-धार्मिक कार्यों में हो रहा है, परंपराएँ प्रशासन के आदेशों की गुलाम हो गई हैं, और धर्मनिरपेक्ष सरकारें तय कर रही हैं कि पूजा कैसे होगी। यदि उस समय आचार्यों ने ‘मर्यादा’ का कड़ा स्टैंड लिया होता, तो आज मंदिरों की स्थिति भिन्न होती।
४. वर्तमान समय के ‘सुरक्षा घेरे’ (VIP Culture) का उदाहरण
अक्सर धार्मिक यात्राओं में प्रशासन ‘सुरक्षा’ के नाम पर आचार्यों को उनके पारंपरिक चिन्हों से अलग कर देता है।
* तत्काल सुविधा: लगता है कि जल्दी दर्शन हो जाएंगे या भीड़ से बच जाएंगे।
* दूरगामी हानि: इससे धीरे-धीरे जनता की नज़रों में शंकराचार्य पद की वह ‘अलोौकिक और दैवीय’ छवि कम होने लगती है। जब जगद्गुरु सामान्य प्रोटोकॉल में फँस जाते हैं, तो धर्मसत्ता राजसत्ता की पिछलग्गू लगने लगती है।
: ‘मर्यादा’ ही सुरक्षा है
भगवान आदि शंकराचार्य ने मठाम्नाय में स्पष्ट लिखा था कि आचार्य को अपनी मर्यादा के प्रति ‘वज्र’ के समान कठोर होना चाहिए।
> यदि परमाराध्य जी प्रयाग में पालकी से उतर जाते, तो वह एक ‘लीगल प्रेसिडेंट’ (कानूनी नजीर) बन जाता। कल को कोई भी छोटा पुलिस अधिकारी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को यह कहकर रोक देता कि “जब शंकराचार्य ने मान लिया था, तो आप कौन होते हैं?”
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उनका स्टैंड यह संदेश था कि प्रशासन व्यवस्था का सेवक है, धर्म की मर्यादाओं का स्वामी नहीं।
बस कुछ क्षण विचार करें, क्या आप इस विषय में ‘मठाम्नाय’ के उन विशिष्ट श्लोकों को जानना चाहेंगे जहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि आचार्य को किसी भी परिस्थिति में अपनी पद-मर्यादा का त्याग नहीं करना चाहिए?

भगवान आदि शंकराचार्य ने ‘मठाम्नाय’ और ‘महानुशासन’ ग्रंथों में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि जो व्यक्ति शंकराचार्य के पद पर प्रतिष्ठित होता है, उसे अपनी पद-मर्यादा की रक्षा के लिए कितना दृढ़ होना चाहिए।
यहाँ वे प्रमुख शास्त्रीय आधार और सूत्र दिए गए हैं जो बताते हैं कि आचार्य को अपनी मर्यादा से समझौता क्यों नहीं करना चाहिए:
१. पद की स्वायत्तता का सूत्र
मठाम्नाय में आदि शंकराचार्य जी ने पद की स्वतंत्रता के विषय में कहा है:
> स्वच्छन्दश्चाप्यकुतश्चिद्‌भयः।
> अर्थ: (शंकराचार्य) अपनी मर्यादाओं में पूर्णतः स्वतंत्र (स्वच्छन्द) हैं और उन्हें किसी भी सांसारिक शक्ति (प्रशासन या राजा) से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
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यदि आचार्य प्रशासनिक दबाव में अपनी परंपरा बदल देते हैं, तो वे ‘अकुतश्चिद्‌भयः’ (निर्भय) होने के इस मूलभूत गुण का उल्लंघन करते हैं।
२. मर्यादा त्याग का दोष
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि कोई आचार्य किसी प्रलोभन या ‘सुविधा’ के कारण अपनी पीठ की मर्यादा का त्याग करता है, तो वह उस महान परंपरा के प्रति अपराधी माना जाता है:
> मर्यादायास्तु विलोपेन सम्प्रदायो विनश्यति।
> अर्थ: मर्यादा का लोप होने से पूरे सम्प्रदाय का विनाश हो जाता है।
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प्रयाग की घटना में यदि परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘1008’ पालकी से उतर जाते, तो वह केवल एक व्यक्ति का उतरना नहीं होता, बल्कि सदियों पुरानी ‘सम्प्रदाय-मर्यादा’ का विलोप माना जाता।
३. ‘शासन’ और ‘धर्म’ का पदानुक्रम
शास्त्रों के अनुसार, धर्मसत्ता राजसत्ता की मार्गदर्शक होती है, उसकी अनुगामी नहीं। ‘महानुशासन’ में कहा गया है:
> शासकः सर्वधर्माणां मठाधिपतिरीश्वरः।
> अर्थ: समस्त धर्मों और उनकी मर्यादाओं का शासन करने वाला मठाधिपति (शंकराचार्य) ईश्वर के तुल्य है।
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जब प्रशासन (जो स्वयं धर्म का रक्षक होना चाहिए) आचार्य को आदेश देने का प्रयास करता है, तो वह सृष्टि के इस प्राकृतिक क्रम को उलट देता है। परमाराध्य जी का विरोध इस उलटे क्रम (अधर्म) को सही करने के लिए था।
४. भावी आचार्यों के लिए सुरक्षा कवच
शंकराचार्य पद पर बैठने वाला व्यक्ति केवल अपने वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाले सहस्रों वर्षों के उत्तराधिकारियों के लिए उत्तरदायी होता है।
* यदि आज एक आचार्य झुकता है, तो इतिहास उसे ‘नजीर’ (Precedent) बना देता है।
* शास्त्र कहता है कि आचार्य का आचरण ही अन्यों के लिए मानक है (यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः)।
निष्कर्ष: ‘सुविधा’ बनाम ‘सिद्धांत’
इतिहास में जिन आचार्यों ने तत्कालीन सुविधा को चुना, उनके पीठ आज अपना अस्तित्व खो चुके हैं या सरकारी विभागों की तरह कार्य कर रहे हैं।
परमाराध्य जी का यह कड़ा स्टैंड— “मैं पालकी से नहीं उतरूँगा, भले ही मुझे वापस जाना पड़े”—यह सिद्ध करता है कि वे ‘धर्म-धुरंधर’ हैं। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि शंकराचार्य की पालकी केवल एक वाहन नहीं है, वह सनातन धर्म की संप्रभुता का सिंहासन है।

देवेन्द्र पाण्डेय (गोप जी)
प्रकर सेवाधीश
विशेष प्रतिनिधि:- शंकराचार्य स्वामीश्री, अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती १००८

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