एक ‘गुमनाम खत’ के चलते गरमाई भाजपा की राजनीति.. विधायक अरुण भीमावत के खिलाफ खोला मोर्चा..

इंदौर।  एक ‘गुमनाम खत’ के चलते शाजापुर की राजनीति इन दिनों खासी गर्माई हुई है। निशाने पर हैं बीजेपी के दूसरी बार के विधायक अरुण भीमावद। यह खत ऐसे समय में सामने आया है, जब प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार और संगठन में नई नियुक्तियों की सुगबुगाहट तेज है।

खत में विधायक की कार्यशैली और छवि को लेकर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन उस पर लिखने वाले का नाम नहीं है। शाजापुर के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले इसे नई घटना नहीं मानते। यहां जब भी राजनीतिक समीकरण बदलते हैं या किसी नेता का कद बढ़ता है, तो ‘लेटर वार’ शुरू हो जाना एक पुरानी रवायत रही है।
अरुण भीमावद एक साधारण पृष्ठभूमि से आते थे। राजनीति के इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा

कोर्ट के बाहर स्टाम्प बेचना: राजनीति में कदम रखने से पहले, अरुण भीमावद शाजापुर कोर्ट परिसर में एक स्टाम्प वेंडर के रूप में काम करते थे। यह उनके जीवन का वह दौर था, जब वे एक आम नागरिक की तरह अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे थे।
छात्र राजनीति से शुरुआत: स्टाम्प बेचने के साथ-साथ उनका झुकाव राष्ट्रवादी विचारधारा की ओर हुआ और वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़ गए। छात्र राजनीति ने उन्हें युवाओं के बीच एक पहचान दी। इसके बाद वे भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के जिलाध्यक्ष बने, जिससे मुख्यधारा की राजनीति में उनका प्रवेश हुआ। संगठन में उनकी पकड़ मजबूत होती गई और वे भाजपा के जिला उपाध्यक्ष और फिर दो बार जिलाध्यक्ष भी रहे।
साल 2013 बना टर्निंग पॉइंट: 2013 तक शाजापुर विधानसभा सीट कांग्रेस का एक अभेद्य किला मानी जाती थी। 1989 से यहां लगातार कांग्रेस का कब्जा था। 2013 में भाजपा ने एक बड़ा दांव खेलते हुए संगठन के कार्यकर्ता अरुण भीमावद को टिकट दिया। मुकाबला कड़ा था, लेकिन भीमावद ने 25 साल पुराने कांग्रेस के इस किले को ढहा दिया और करीब 1900 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। यह जीत भाजपा के लिए एक चमत्कार से कम नहीं थी।
गुमनाम खत में 8 बड़े आरोप
इस गुमनाम पत्र में विधायक अरुण भीमावद पर भू-माफिया से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग तक के संगीन आरोप लगाए गए हैं, जो उनकी छवि पर सीधा प्रहार करते हैं।

आरोप-1. भू-माफिया से सांठगांठ
शाजापुर में कटने वाली हर अवैध कॉलोनी में विधायक की कथित तौर पर साझेदारी है। जब भी प्रशासन इन कॉलोनियों पर कार्रवाई की कोशिश करता है, तो विधायक का राजनीतिक दबाव आड़े आ जाता है।

यह भी दावा किया गया है कि जो कॉलोनाइजर उन्हें ‘चढ़ावा’ नहीं देते, उनकी जमीनों का लैंड यूज (CLU) जानबूझकर नहीं होने दिया जाता, जिससे वे परेशान होकर घुटने टेक दें।

आरोप-2. मेडिकल माफिया और रेफरल का खेल
पत्र में जिले की स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि विधायक के संरक्षण में कुछ चुनिंदा डॉक्टर सरकारी अस्पताल आने वाले मरीजों को जबरन निजी अस्पतालों में रेफर करते हैं।
इस ‘रेफरल खेल’ में मोटे कमीशन का लेनदेन होता है। इसके अलावा, आयुष्मान भारत योजना के फंड में बड़े पैमाने पर गबन करने और इंदौर व पचोर में पार्टनरशिप में अस्पताल बनवाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं।

आरोप-3. ठेकेदारी में 10-20% कमीशन का तंत्र
पत्र के अनुसार, शहर में होने वाले हर बड़े सरकारी प्रोजेक्ट में विधायक का 10% और नगर पालिका के कामों में 20% कमीशन तय है। आरोप है कि हाल ही में स्वीकृत हुए एबी रोड चौड़ीकरण के ठेकेदार से करोड़ों रुपए की रिश्वत की डील चल रही है।
दिलचस्प बात यह है कि पत्र में विपक्षी दलों से जुड़े ठेकेदारों से भी उनके मधुर संबंधों का दावा किया गया है।
खत में कुछ लोगों के नाम का जिक्र करते हुए उन्हें विधायक की ‘गुंडा-टीम’ का सदस्य बताया गया है। आरोप है कि यह टीम आरटीओ, पुलिस, शिक्षा विभाग और मेडिकल संस्थानों से अवैध वसूली करती है। शहर में फल-फूल रहे सट्टे और जुए के कारोबार को भी विधायक का संरक्षण होने की बात कही गई है।

आरोप-5. धर्म का ‘नाटकीकरण’ और जमीनों पर कब्जा
धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार के नाम पर मंदिरों की बेशकीमती जमीनों पर दुकानें बनवाकर उन्हें अपने करीबियों को औने-पौने दामों में बांटने का आरोप है। पत्र में विशेष रूप से नीमबाड़ी राम मंदिर और भूतेश्वर महादेव मंदिर की जमीन पर ‘व्यावसायिक कब्जे’ की योजना का जिक्र किया गया है।
आरोप-6. विकास कार्यों में जानबूझकर अनदेखी
पत्र में आरोप है कि विधायक केवल उन्हीं कामों में रुचि दिखाते हैं, जहां उन्हें निजी लाभ मिलता है। शहर के चिल्लर डैम की गंदगी और सड़कों के गड्ढों जैसे जनहित के मुद्दों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है, क्योंकि इन कार्यों से उन्हें कोई ‘फायदा’ नहीं होता।

आरोप-7. मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी निवेश
सबसे संगीन आरोप भ्रष्टाचार से कमाई गई दौलत को ठिकाने लगाने से जुड़ा है। पत्र के अनुसार, शाजापुर से वसूला गया काला धन इंदौर की प्रॉपर्टी और सिंगापुर में स्थित ‘शेल कंपनियों’ में विधायक के दामाद के जरिए निवेश किया जा रहा है। यह आरोप मामले को स्थानीय राजनीति से उठाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय अपराधों से जोड़ता है।
आरोप-8. संगठन और विचारधारा पर प्रहार
पत्र के अंत में लिखने वाले का दावा है कि विधायक नशे की हालत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ पदाधिकारियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं। उसने बीजेपी के बाकी नेताओं और संगठन से इस ‘माफिया राज’ से शाजापुर को मुक्ति दिलाने की भावुक अपील की है।

शाजापुर का ‘लेटर कल्चर’

विधायक के खिलाफ वायरल हो रहा यह पत्र शाजापुर की सियासी संस्कृति में कोई नई बात नहीं है। इस शहर का ‘गुमनाम पत्रों’ से पुराना नाता रहा है। राजनीतिक विश्लेषक मनोज पुरोहित इस ट्रेंड को समझाते हुए कहते हैं, शाजापुर में यह विरोध का एक स्थापित तरीका है।

जब विरोधी या असंतुष्ट गुट सामने आकर मुकाबला करने की स्थिति में नहीं होते, तो वे ऐसे पत्रों का सहारा लेकर चरित्र हनन की कोशिश करते हैं। वे बताते हैं कि शाजापुर से लंबे समय तक विधायक और मंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता हुकुम सिंह कराड़ा के खिलाफ भी उनके कार्यकाल में इसी तरह के गुमनाम पत्र जारी हो चुके हैं।
यह ‘लेटर बम’ सिर्फ राजनीति तक ही सीमित नहीं है। पिछले कुछ समय में सोनी समाज और बोरा समाज के प्रतिष्ठित लोगों के खिलाफ भी ऐसे ही पत्र वायरल किए गए थे।

विधायक पर 18 मामले दर्ज

अरुण भीमावद की छवि को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच उनका आपराधिक रिकॉर्ड भी ध्यान खींचता है। चुनावी हलफनामे और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 1995 से लेकर अब तक उन पर कोतवाली थाने सहित अन्य जगहों पर करीब डेढ़ दर्जन (18) मामले दर्ज हुए हैं।

चार मामलों में दोषी करार: रिकॉर्ड के मुताबिक, चार अलग-अलग मामलों (वर्ष 1998, 1999 और 2001) में कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए ‘अर्थदंड’ (जुर्माना) की सजा सुनाई ।
गंभीर धाराओं में केस: वर्ष 2018 में उन पर अपनी ही पार्टी के ‘युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष’ के साथ मारपीट करने, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी (धारा 323, 294, 506) का केस दर्ज हुआ था। एक निजी परिवाद के आधार पर उन पर धोखाधड़ी (420) और कूटरचना (467, 468) जैसी गंभीर धाराओं में भी केस दर्ज हुआ था, जिसकी अपील फिलहाल जबलपुर हाईकोर्ट में लंबित है।

अन्य मामले: इसके अलावा उन पर शासकीय कार्य में बाधा (353), बलवा (147, 148) और एससीएसटी एक्ट के तहत भी मामले दर्ज रह चुके हैं। एक मामला (वर्ष 2001) राज्य शासन द्वारा वापस ले लिया गया था।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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