जब महात्मा गांधीजी ने भोपाल में
समझाया था रामराज्य का अर्थ
बेनजीर मैदान में उमड़ा जनसैलाब, राहत मंज़िल में गूंजे प्रार्थना गीत

अलीम बजमी
भोपाल। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने 97 साल पहले भोपाल में कहा था- “स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता का निवारण होगा।” इस दौरान उन्होंने रामराज्य का अर्थ समझाया था। हिंदू- मुस्लिम एकता पर जोर दिया था। महात्मा गांधी जब पहली बार भोपाल आए थे, तब सितंबर का महीना था। मानसून की रुखसती थी तो शहर की सड़कों, बाज़ार की गलियों में तांगे की टापें गूंजती थीं,  यही भोपाल उस ऐतिहासिक सुबह का गवाह बना, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यहां पहुंचे।
खादी में सजा शहर
10 सितंबर 1929 को गांधीजी की आमद के दौरान भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खां ने हुक्म सुनाया कि पूरा शहर खादी में नज़र आना चाहिए। दुकानों के पर्दे से लेकर स्वागत पंडाल तक, सबकुछ सफेद खादी से सजाया गया। यह नज़ारा आज़ादी की उस अलख को दर्शा रहा था, जिसे गांधीजी पूरे देश में जगा रहे थे।
बेनजीर मैदान का दृश्य
पुराने शहर के बेनजीर मैदान की ओर जाने वाले रास्तों पर भीड़ उमड़ पड़ी थी।  कुछ लोग गलियों से पैदल ही निकल पड़े। तांगे खचाखच भरे हुए थे। जब गांधीजी वहां पहुंचे, तो मैदान लबालब भरा था—करीब दस हज़ार लोग, जिनमें अमीर-गरीब, हिंदू-मुसलमान, सभी वर्गों के लोग शामिल थे। गांधीजी मंच पर आए। उनकी साधारण धोती और लाठी देखकर भीड़ स्तब्ध रह गई—इतनी सादगी में भी इतनी बड़ी ताक़त। तालियों और नारों से गूंजते मैदान में जब उनकी आवाज़ सुनाई दी, तो मानो समय ठहर गया।
उन्होंने कहा—
“रामराज्य का मतलब हिंदू राज्य नहीं है। मुसलमान भाइयों से मैं कहना चाहता हूं कि वे इसे गलत न समझें। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं। सत्य और सत्कार्य ही मेरे ईश्वर हैं। स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एक हों और अस्पृश्यता का अंत हो।”
यह संदेश सिर्फ़ शब्द नहीं था, बल्कि भीड़ में बैठे हर शख़्स के दिल की गहराई तक उतर गया।
राहत मंज़िल की प्रार्थना सभा
गांधीजी अहमदाबाद पैलेस के नजदीक राहत मंज़िल में ठहरे। यह कोठी खादी से सजाई गई थी। यहीं शाम को प्रार्थना सभा हुई। उस सभा का दृश्य आज भी भोपाल की स्मृतियों में दर्ज है—मालिक और नौकर, राजा और प्रजा, अमीर और गरीब, सब एकसाथ ज़मीन पर बैठ गए। गीता, कुरान, बाइबिल और संतों की वाणी गूंजने लगी। उस क्षण ऐसा लगा जैसे धर्म और जाति की दीवारें टूट गई हों।
बीमारी और देखभाल
भोपाल प्रवास के दौरान गांधीजी को बुखार हो गया। डॉ. अब्दुल रहमान ने उनका इलाज किया और बाक़ायदा दो बार स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किए। राहत मंज़िल में उनके लिए बकरी का दूध और खजूर का इंतज़ाम किया गया था।
ऐतिहासिक उपस्थिति
गांधीजी के साथ मीरा बेन, महादेव भाई देसाई और सी.एफ. एंड्रज थे। जमनालाल बजाज और डॉ. जाकिर हुसैन भी भोपाल पहुंचे।
बेनजीर मैदान में नागरिकों ने उन्हें 1035 रुपए और मोढ़ समाज ने 501 रुपए की थैली भेंट की।
दूसरी बार भी आए
गांधीजी 1933 में भी भोपाल आए। इस बार उनका प्रवास छोटा था—वे ट्रेन बदलने के लिए रेलवे स्टेशन पर रुके।
आत्मनिर्भरता का संदेश
भोपाल प्रवास हमें यह बताता है कि गांधीजी का हर कदम सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने वाला आंदोलन था। उन्होंने भोपाल की सरज़मीं पर जो संदेश दिया, वह आज भी गूंजता है—“स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता का निवारण होगा।”
अलीम बजमी, भोपाल।
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जब भोपाल में उतरा था रामराज्य का अर्थ
गांधीजी, खादी में सजा शहर और एकता की वह सुबह जो इतिहास बन गई
अलीम बजमी, 30 जनवरी 2026।
जनवरी की एक शांत स्मृति नहीं, बल्कि सितंबर 1929 की वह ऐतिहासिक सुबह-जब मानसून की विदाई के बाद भोपाल की हवा में नमी और उम्मीद एक साथ घुली हुई थी। पुराने शहर की तंग गलियों में तांगे की टापों की गूंज थी, बाज़ारों में हलचल थी और हर चेहरे पर एक अनकहा उत्साह। यह वही भोपाल था, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वागत के लिए सज रहा था-सिर्फ़ फूलों से नहीं, बल्कि विचारों से।
खादी में लिपटा एक शहर
10 सितंबर 1929 को, भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला ख़ान के हुक्म पर पूरा शहर खादी के सफ़ेद रंग में नहा गया। दुकानों के पर्दे, स्वागत पंडाल, कोठियां-सब पर खादी की सादगी छा गई। यह दृश्य किसी उत्सव से अधिक, आज़ादी की उस अलख का प्रतीक था, जिसे गांधीजी देश के कोने-कोने में जगा रहे थे। खादी यहाँ वस्त्र नहीं, विचार बन चुकी थी।
बेनजीर मैदान: जनसैलाब और मौन की ताक़त
पुराने शहर के बेनजीर मैदान की ओर जाने वाले हर रास्ते पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कोई पैदल चला आ रहा था, कोई खचाखच भरे तांगे में। जब गांधीजी मैदान में पहुंचे, तो लगभग दस हज़ार लोगों की भीड़, हिंदू-मुसलमान, अमीर-गरीब यानी हर वर्ग एक साथ सांस ले रहा था।
मंच पर गांधीजी साधारण धोती और हाथ में लाठी के साथ थे। चेहरे पर सौम्य मुस्कान। न कोई राजसी ठाठ, न अलंकरण फिर भी उनके व्यक्तित्व में ऐसी शक्ति थी कि तालियों और नारों के बीच भी एक क्षण को समय ठहर-सा गया। जब उन्होंने बोलना शुरू किया, तो उनकी आवाज़ भीड़ के शोर को नहीं चीरती थी-वह सीधे दिलों में उतरती थी।गांधीजी ने कहा-
“रामराज्य का मतलब हिंदू राज्य नहीं है।
मेरे लिए राम और रहीम में कोई भेद नहीं।
सत्य और सत्कार्य ही मेरे ईश्वर हैं।
स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एक हों और अस्पृश्यता का अंत हो।”
ये शब्द भाषण नहीं थे-यह एक नैतिक घोषणा थी, जो सुनने वालों के भीतर तक उतर गई।
राहत मंज़िल: जहां मजहब की दीवारें पिघल गईं
गांधीजी अहमदाबाद पैलेस के पास स्थित राहत मंज़िल में ठहरे। शाम को वहीं प्रार्थना सभा हुई। दृश्य अद्भुत था-मालिक और नौकर, राजा और प्रजा, अमीर और ग़रीब, सब ज़मीन पर एक साथ बैठे थे।
गीता के श्लोक, क़ुरान की आयतें, बाइबिल के संदेश और संतों की वाणी एक ही स्वर में गूंज रही थीं। उस क्षण भोपाल की फिज़ा में ऐसा लगा, मानो धर्म और जाति की दीवारें स्वयं टूटकर गिर गई हों। अफसोस, अब राहत मंजिल के अवशेष भी शेष नहीं बचे। यह इमारत सूफिया मस्जिद के सामने थी।
बीमारी में भी सेवा का संस्कार
भोपाल प्रवास के दौरान गांधीजी को बुख़ार हो गया। डॉ. अब्दुल रहमान ने उनकी देखभाल की और नियमित स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किए गए। राहत मंज़िल में उनके लिए बकरी के दूध और खजूर की व्यवस्था थी-सादगी, संयम और सेवा का वही भाव, जो गांधीजी के जीवन का मूल था। उनकी सेहत की फिक्र को लेकर शहर की कई शख्सियतें राहत मंजिल परिसर में मौजूद रही।
इतिहास की संगत
इस यात्रा में मीरा बेन, महादेव भाई देसाई और सीएफ एंड्रयूज़ भी गांधीजी के साथ थे। जमनालाल बजाज और डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसी शख्सियतें भी भोपाल पहुंची। शहर से रुबरु हुई।
बेनजीर मैदान में नागरिकों ने 1035 रुपये और मोढ़ समाज ने 501 रुपये की थैली भेंट की-यह सहयोग केवल आर्थिक नहीं, वैचारिक समर्थन भी था।
फिर एक झलक
1933 में गांधीजी दूसरी बार भोपाल आए, हालांकि यह प्रवास संक्षिप्त था-रेलवे स्टेशन पर ट्रेन बदलते समय का ठहराव। फिर भी उनकी उपस्थिति मात्र से शहर ने उन्हें महसूस किया।
आज भी गूंजता संदेश
भोपाल की सरज़मीं पर गांधीजी का यह प्रवास हमें याद दिलाता है कि उनका हर कदम केवल राजनीति नहीं था-वह सामाजिक चेतना का आंदोलन था।
आज भी वह स्वर गूंजता है-
“स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता का निवारण होगा।”
यह सिर्फ़ इतिहास नहीं-यह भविष्य का रास्ता है।

फेसबुक से साभार

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