लल्लनटॉप से सौरभ द्विवेदी के जाने का मतलब…

सौरभ द्विवेदी टीवी टुडे ग्रुप के सबसे चमकीले ब्रांड दि लल्लनटॉप का अब हिस्सा नहीं हैं. द्विवेदी अब इंडिया टुडे हिन्दी के संपादक भी नहीं हैं. सौरभ द्विवेदी अब सिर्फ और सिर्फ सौरभ द्विवेदी है. आज उन्होंने इंडिया टुडे समूह के साथ अपने 12 साल के इस सफ़र को यहीं विराम दे दिया है. अब वो किसी दूसरे काम और प्लेटफॉर्म पर नज़र आएंगे.

मुझे इस ख़बर को लेकर बहुत ज़्यादा हैरानी नहीं हुई. मैं इंडिया टुडे समूह को जितना जानता हूं, उस हिसाब से ये बेहद स्वाभाविक बल्कि अपने पैटर्न के अनुसार ही एक घटना है; संभवतः बड़ी ज़रूर है. इस समूह की सबसे बड़ी बात है कि वो किसी भी हाल में अपने ब्रांड के आगे किसी चेहरे को बड़ा होने नहीं देता. वो तब तक उसे जगह देता है, पुचकारता है और स्पेस देता है, जब तक उसके होने से ब्रांड बड़ा हो. जब वो चेहरा बड़ा होने लग जाय तो समूह इस बात को लेकर बहुत सीरियस हो जाता है. समूह की यह बात उसके शुरुआत से ही जुड़ी है.

आजतक जब शुरु हुआ था कि एस.पी.सिंह घर-घर की आँखों के सितारे हो गए. दर्शकों के लिए आजतक का मतलब एसपी. बाईस मिनट के कैप्सूल कार्यक्रम के बाद बतौर ख़बरिया चैनल पर इस्तेमाल होनेवाला एक-एक शब्द, पंच..एस.पी. गढ़ा हुआ. इंतज़ार कीजिए कल तक, देखते रहिए आजतक से जो सिलसिला शुरु हुआ वो आगे चलकर ख़बरों का सिलसिला जारी रहेगा- देखते रहिए आजतक..गया. एस.पी. नहीं रहे लेकिन चैनल के लिए गढ़े गए उनके मुहावरे, इस्तेमाल किए गए शब्द, अंदाज़ और सबसे ज़्यादा स्क्रीन-उपस्थिति..सबकी सब रह गयी. अब चैनल जल्दी एस.पी का नाम तक नहीं लेता लेकिन उनके शब्द अभी भी चैनल का हिस्सा हैं.

एक समय पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, दीपक चौरसिया आजतक के जरिए घर-घर पहुंचे और अलग-अलग कारणों से इन्हें लगा कि ये चैनल के चेहरे हैं. समूह ने सबको बाय-बाय किया या फिर ऐसी स्थिति पैदा होती चली गयी कि इन्हें विदा करना ज़्यादा बेहतर लगा. हम दूर बैठे दर्शकों के बीच संदेश गया कि आजतक रहेगा, लोग आते-जाते रहेंगे.

दि लल्लनटॉप की जब शुरुआत हुई तो अच्छे-अच्छे लोगो को पता तक नहीं चला कि ये इंडिया टुडे ग्रुप का नया ब्रांड है. तब हिन्दी ब्लॉगिंग अपने चरम पर था और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वीडियो कंटेंट की शुरुआत ही हुई थी. जिस तरह सालों के अनुभव के साथ मीडियाकर्मी कुछ प्रयोग करते दिखाई देते, दि लल्लनटॉप को लेकर लोगों के बीच ऐसी ही समझ बनी कि कोई सरोकारी मंच है. तब इसकी माइक मीडियाकर्मी इस तरह पकड़ते कि इंडिया टुडे की छाय तक इस पर न पड़े. देखते-देखते ऐसी चमक और धमक ऐसा बनी कि उसके आगे आजतक फीका नज़र आने लगा. अपनी अलग भाषा, भदेस किन्तु सतर्क अंदाज़ से दि लल्लनटॉप ने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजीदां-एलीट दर्शकों के बीच भी अपनी जबरदस्त पकड़ बनायी और यह सब करते हुए दि लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी एक-दूसरे के पर्याय हो गए.

दि लल्लनटॉप में जो भाषा और मुहावरे सुनाई-दिखाई पड़ते हैं, उन पर द्विवेदी की छाप है. उनके जाने के बाद भी उनकी छाया से ये पूरी तरह मुक्त हो जाएगी, ऐसा हो पाना आसान नहीं है. ऐसे में प्लेटफॉर्म का फ्लेवर ही चला जाएगा.

हंस ने रविकांत और मुझे सोशल मीडिया विशेषांक संपादित करने की जब जिम्मेदारी दी तो इस माध्यम से जुड़े कईयों का हमने इंटरव्यू किया, उस इंटरव्यू में द्विवेदी ने विस्तार से बताया है कि भाषा को लेकर उनकी अपनी क्या समझ रही है और दि लल्लनटॉप के लिए लोगों का चयन करते समय क्या सोच काम कर रही होती है. तब हमारी दि लल्लनटॉप के दफ़्तर में इस संबंध में दो घंटे से ज़्यादा बातचीत हुई. मौक़ा मिला तो वो बातचीत मैं आपसे साझा करूंगा.

फ़िलहाल तो ये कि पिछले बारह साल में द्विवेदी ने दि लल्लनटॉप के जरिए जो काम किया और जिस अंदाज़ में किया, पिछले कुछ सालों से वो ब्रांड से ज़्यादा बड़े नज़र आने लगे. जूते और जुराब की साईज़ अलग-अलग पड़ने लगी. मुझे नहीं पता कि कौन अपनी साईज़ बड़ी मानने लगे लेकिन सच तो यही है कि टीवी टुडे ग्रुप से द्विवेदी जैसे ऐसे आधे दर्जन से भी ज़्यादा चेहरे तब अलग हुए जब वो शोहरत और पहचान के मामले में अपनी चरम पर रहे.

मैं एक दर्शक और मीडिया अध्येता के तौर पर यही महसूस करता हूं कि सौरभ द्विवेदी को देखकर देशभर के सैकड़ों मीडिया छात्रों ने उनकी तरह होना चाहा. उनकी तरह किताब पढ़ने और काम के आगे ख़ुद को पूरी तरह झोंक देने का साहस न कर सके तो हाव-भाव और गर्दन में गमछा-स्टोल झुलाकर ही. उनके अंगरखे और चटख रंगों के कैजुअल्स ने पत्रकारिता को प्रॉप्स जर्नलिज्म की तरफ ले जाने में बड़ी भूमिका निभायी है जो एक समय बाद ख़ुद उन पर हावी होता चला गया.दूसरी तरफ,

उन्होंने तेज़तर्रार लोगों के भीतर एक ख़ास तरह का भरोसा पैदा किया कि प्रतिभा और मेहनत का ज़माना पूरी तरह गया नहीं है. वो ख़ुद को लेकर जितना ऑब्सेस्ड रहे हैं, नयी प्रतिभाओं को लेकर उतने ही उदार भी. बाद में वो प्रतिभाएं हमारी पसंद बने. टीवी और किताबों का विवाद के अलावा कोई रिश्ता नहीं है, इस भ्रम को तोड़कर स्क्रीन पर किताबों ती जो थोड़ी-बहुत वापसी हुई, उसमें द्विवेदी की भूमिका रही है..भले ही वो छपे गए अक्षरों के बजाय भौकाल टाइट करने के लिए ही क्यों न हो.

मुझे उम्मीद है कि आज सौरभ द्विवेदी पत्रकारिता की सीढ़ियों से चढ़कर जिस मक़ाम तक पहुंचे हैं, वो सीढ़ियाँ उन्हें पत्रकारिता की दुनिया से इतर नहीं धक्का देगी. कम से कम ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं कि हमें यकीं करने में मुश्किल हो कि किताबों की बात करनेवाला ये शख़्स, किताबों से कितनी दूर जाकर खड़ा हो गया !
फेसबुक वाल से साभार

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