Editorial
Bhopal स्मार्ट सिटी की दुर्गति…इसके लिए कौन जिम्मेदार?


मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जब स्मार्ट सिटी योजना लागू की गई थी, तभी से इसका विरोध हो रहा था। सबसे पहले तो इसके स्थान का चयन ही गलत था, फिर जिस तरह से क्रियान्वयन शुरू हुआ, तमाम विशेषज्ञों ने दावा किया था कि ये योजना फ्लाप हो जाएगी। और हश्र भी यही हुआ। आज एक बड़े अखबार ने इसका ब्योरा प्रकाशित किया है और जमीनी हकीकत से रूबरू कराया है कि हजारों पेड़ों की बलि देने के बाद वहां कांक्रीट का जंगल और अब झुग्गियां तन रही हैं।
पहले नजर डालते हैं खबर पर। इसके अनुसार भोपाल का स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट नौ साल में भी अढ़ाई कोस नहीं चल सका है। टीटी नगर की जिस 342 एकड़ जमीन को स्मार्ट सिटी बनाने का ख्वाब दिखाकर खाली कराया गया था, दो हजार परिवारों को शिफ्ट किया गया, तीन हजार पेड़ काटे गए और बारह सौ करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए, वह आज उजाड़ है। हालत यह है कि माता मंदिर से लेकर जवाहर चौक तक झुग्गियां बनती जा रही हैं।
स्मार्ट सिटी का एक भी शुरुआती प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ है। 342 एकड़ जमीन को आवासीय मानकर मौजूदा कलेक्टर गाइडलाइन से इसकी कीमत लगाई जाए तो यह 9964 करोड़ रुपए की होती है। यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 1200 करोड़ खर्च हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से एक पेड़ की उम्र 100 साल मानते हुए उसकी कीमत 72 लाख रुपए होती है। यानी तीन हजार पेड़ों की कीमत 2160 करोड़ रुपए होती है। इस तरह 13,324 करोड़ बर्बाद हो चुके हैं।
आलम यह है कि रंगमहल के पास खाली पड़ी जमीन पर नई झुग्गियां बन गईं। जवाहर चौक के पास खाली जमीन पर झुग्गियां व गुमठियां हैं, माता मंदिर व जवाहर चौक पर टूटे मकानों पर लोगों के कब्जे हैं। माता मंदिर के पास स्मार्ट सिटी के प्लॉट पर धार्मिक स्थल भी बना लिया गया है और पुराने नूतन सुभाष स्कूल के पास मकानों में अब भी सरकारी कर्मचारी रह रहे हैं।
अब देखते हैं कि स्मार्ट सिटी का पैसा कहां-कहां खर्च किया। 50 करोड़ की एमपी नगर मल्टीलेवल पार्किंग, 55 करोड़ से 11 कचरा ट्रांसफर स्टेशन, 36 करोड़ की टीटी नगर मल्टीलेवल पार्किंग, 39 करोड़ रुपए का आर्च ब्रिज बनाया,
180 करोड़ से महालक्ष्मी परिसर बीडीए के 551 फ्लैट बनाए, जो प्रोजेक्ट सबसे पहले बने, वही पूरे नहीं हुए। तीन फेज में 3000 सरकारी मकान बनना थे। पहले फेज का छठा टॉवर विवादों के कारण नहीं बना, जो 5 टॉवर बने उनमें सीवेज जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं तक नहीं हैं। अधिकांश लोगों ने वहां जाने से ही इंकार कर दिया है। जिससे वो खाली पड़े हैं।
माता मंदिर से जवाहर चौक तक बुलेवर्ड स्ट्रीट – 40 करोड़ खर्च कर दिए। लेकिन सडक़ का एक हिस्सा अधूरा ही छोड़ दिया गया है। टीटी नगर दशहरा मैदान को 31 करोड़ की लागत से स्मार्ट दशहरा मैदान में बदलना था, लेकिन यह प्रोजेक्ट भी अधूरा है। टीटी नगर हाट बाजार तो जैसे खत्म ही कर दिया गया है। यहां कुछ दुकानें खुल गईं हैं, लेकिन पानी और सीवेज जैसी सुविधाएं नहीं हैं। स्मार्ट सिटी एरिया के बाहर डिपो चौराहा से पॉलिटेक्निक तक स्मार्ट रोड। तो बना दी गई है, लेकिन रोड पर स्मार्ट सुविधाएं तो छोडि़ए पार्किंग भी नहीं मिलती।
विशेषज्ञ बताते हैं कि स्मार्ट सिटी एक अच्छा कॉन्सेप्ट था। नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलें, चौबीस घंटे- सातों दिन पानी से लेकर कचरा प्रबंधन तक सब ऑटोमेशन हो और घर, दफ्तर, अस्पताल, स्कूल- कॉलेज सब आसपास हो, प्रदूषण न हो, मनोरंजन के साधन हों। हरियाली और खुला स्पेस हो। खेल मैदान हो। लेकिन ऐसा कुछ भी यहां नहीं बन सका है। कहा जा रहा है कि सरकारी अधिकारियों ने जैसा विदेशों में देखा उसे जस का तस यहां कॉपी कर दिया। जबकि हर शहर को अपनी जरूरत के हिसाब से लोगों को शामिल करते हुए प्लान बनाना था। प्लान गलत बना, बाद में उसमें नगर निगम के प्रोजेक्ट जुड़ गए। इससे और गड़बड़ी हो गई।
सीधी बात है, अधिकारी विदेशों में जाकर करोड़ों रुपए सरकार के खर्च करके जो प्रोजेक्ट देखकर आते हैं, उन्हें जब धरातल पर उतारते हैं, तो उनकी प्लानिंग ही गलत रहती है। उसमें कहीं सत्तापक्ष से जुड़े लोगों के हित शामिल हो जाते हैं तो कहीं सरकारी मशीनरी अपने हित देखने लगती है। और कुछ अधिकारी तो ऐसी योजनाओं को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उसे लागू करने पर अड़ ही जाते हैं।
भोपाल के बीआरटीएस कारीडोर से बेहतर अधिकारियों की जिद और बेवकूफी का उदाहरण और क्या हो सकता है, इस पर खर्च हुए करोड़ों रुपए अब क्या अधिकारियों से वसूले जाएंगे? कतई नहीं। उनकी गलती, गलती नहीं होती। फैसले तो उन्हें ही लेना होते हैं। सो चाहे बीआरटीएस कारीडोर को बनाकर तोडऩे का मामला हो या स्मार्ट सिटी पर बर्बाद हुए करोड़ों रुपए का मामला, किसी का कुछ बिगडऩा नहीं है। यही कारण है कि योजनाओं में लापरवाही बरतना सामान्य बात हो गई है। पैसा सरकार का है, सो एक कहावत लागू हो जाती है…मुफत का चंदन, घिस मेरे नंदन…। बाकी वसूलने और भुगतने के लिए जनता तो है ही।
– संजय सक्सेना

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