Editorial
जल संकट और अचानक जल भराव…!

जल संकट से जूझ रहा कोई शहर अचानक पानी में डूबने लगे तो इसे क्या कहा जाना चाहिए? न तो हम पानी के संकट के लिए तैयार हैं और न ही अधिक बारिश के हमारे पास पर्याप्त इंतजाम ही हैं…! गर्मी के चलते उत्तर भारत में सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है, फिर अचानक शुरुआती मानसून ही जरूरत से ज्यादा बरसने लगता है। और हम शायद केवल तमाशा ही देखते रह जाते हैं, कुछ कर नहीं पाते।
सही बात तो ये है कि मौसम ने इस बार जैसा रंग दिखाया है, उसके बाद हमारी नींद खुल जानी चाहिए। जलवायु परिवर्तन यानि क्लाइमेट चेंज के जिस खतरे को लेकर पिछले कई बरसों से पर्यावरण के जानकार और वैज्ञानिक आगाह कर रहे थे, वह अब हमारे सामने आ चुका है। अगर इसके लिए कुछ न किया गया तो हालात और अधिक बदतर ही होंगे।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और देश के तमाम दूसरे शहरों ने जून में ही मौसम के दो चरम झेल लिए। पहले जानलेवा गर्मी पड़ी। दिल्ली में जून का औसत अधिकतम तापमान करीब 42 डिग्री सेल्सियस रहा। इसके बाद एकसाथ इतनी बारिश हो गई कि सारे इंतजाम पानी में बह गए। जान दोनों ने ली। पहले गर्मी ने, फिर बाढ़ जैसे हालात ने। अब यह सोचने वाली बात तो है ही कि जो शहर कुछ दिन पहले पानी की किल्लत से जूझ रहे थे, वे अचानक पानी में कैसे डूबने लगे?
गर्मी का रेकॉर्ड तोडऩा अब आम होता जा रहा है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.3 से 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। अभी तक जून के जो चार महीने सबसे ज्यादा गर्म दर्ज किए गए हैं, उनमें से तीन पिछले 13 बरसों में ही पड़ गए। हर साल ऐसा लगता है कि गर्मी पिछले बरस से अधिक पड़ रही है। सर्दियों का मौसम सिकुड़ता जा रहा है, दूसरी तरफ बारिश अनियमित हो चली है। किसी भी मौसम में, कभी भी बारिश होने लगती है। पहले सर्दियों में एक बार मावठा पड़ता था, लेकिन अब तो कई बार बादल आते हैं और बरस जाते हैं। ये सारे संकेत न केवल डराने वाले हैं, अपितु चेताने वाले भी हैं।
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे की बात करें तो हमें दो स्तरों पर काम करने की जरूरत है। पहला उपाय दीर्घकालिक हो और दूसरा फौरी। यानि कुछ कदम ऐसे होने चाहिए, जो तत्काल उठाए जाएं। एक्शन प्लान और गाइडलाइंस पर काम करना होगा। इसके लिए हम आंध्र प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं, जहां हर साल हीटवेव से निपटने की सरकारी योजना बनती है। इसमें लॉन्ग टर्म के साथ शॉर्ट टर्म उपाय भी रखे जाते हैं।
तुरंत राहत के रूप में उन लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए, जिन्हें खुले में काम करना पड़ता है, जैसे श्रमिक, ट्रैफिक पुलिसकर्मी, रेहड़ी-पटरी दुकानदार। स्कूल, ऑफिस आदि के समय में बदलाव मौसम के आधार पर किया जाए। सार्वजनिक कूल शेल्टर बनाए जा सकते हैं, जहां वे लोग दोपहर में आराम कर सकें, बाहर निकलना जिनकी मजबूरी है। लोगों को अपने घरों की बाहरी दीवारों और छतों पर सफेद पेंट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे घर के भीतर गर्मी कम लगती है।
सही बात तो यह है कि अगर बिगड़ते मौसम को संभालना है तो कुछ कड़े कदम उठाने होंगे और इस मामले में सरकार या सरकारों को ज्यादा सख्त होना ही पड़ेगा। हमारे महानगरों में नदियों-तालाबों पर तेजी से कब्जा हो रहा है। भोपाल जैसा झीलों का शहर इसका शिकार हो रहा है। यहां एक दर्जन से अधिक तालाब खत्म किए जा चुके हैं। शहरों-कस्बों में वेटलैंड पर ऊंची इमारतें खड़ी की जा रहीं, जो नैचरल वॉटर रिचार्ज सिस्टम का काम करते हैं। इसको रोकना होगा। हरियाली बढ़ानी होगी। सजावटी और दिखावटी पौधों के बजाय नीम, पीपल, जामुन, आम जैसे पेड़ लगाए जाएं, जो न केवल पर्यावरण की सुरक्षा करते हैं, अपितु छांव भी देते हैं और तापमान नियंत्रण भी करते हैं। घरों के निर्माण में पुरानी शैली अपनाई जाए यानी मोटी और ऊंची दीवारें, पर्याप्त वेंटिलेशन।
कुल मिलाकर भले ही हम कितने ही आधुनिक हो जाएं, यदि आगे की पीढिय़ों को बचाकर रखना है, उन्हें जलवायु परिवर्तन के झंझावातों से बचाना है, तो जड़ों की ओर लौटने और प्रकृति का सम्मान करना ही होगा। हम उस प्राचीन रहन-सहन की आलोचना भले ही करते रहे हैं, उसे भुलाना हमारे लिए समस्या को आमंत्रण देना ही साबित हो रहा है। सबसे पहले तो एक मौसम पहले ही आने वाले मौसम की तैयारी करने की आदत डालनी होगी। गर्मी का मौसम चलते बारिश की तैयारी और सर्दी के मौसम में गर्मी के लिए तैयारी की योजनाएं बनाई जानी चाहिए। कहते जरूर हैं, लेकिन बारिश आ चुकी है, भोपाल जैसे शहर में भी नाले-नालियों की पर्याप्त सफाई नहीं हुई है। हम सफाई वाली राजधानी रह चुके हैं, लेकिन नाले-नालियां सडक़ों पर बहते ही दिखते हैं। पहली बारिश में ही दिल्ली से लेकर भोपाल तक की तमाम बस्तियां यदि पानी से भर जाती हैं, तो हमारी तैयारी शून्य ही मानी जाएगी।
– संजय सक्सेना



