Editorial
कुछ गड़बड़ी तो है, आरोप नकारने के बजाय सिस्टम दुरुस्त करे सरकार..

क्या प्रतियोगी परीक्षाओं का सिस्टम वाकई गड़बड़ाने लगा है? अभी तक तो मध्यप्रदेश में ही एक दर्जन से ज्यादा घोटाले सामने आ चुके हैं, लेकिन अब नीट की परीक्षा में जिस तरह की गड़बड़ी सामने आ रही है, वह वाकई चिंताजनक है। यह जरूरी नहीं कि सरकार या परीक्षा लेने वाली संस्था का कोई इंटेंशन हो, लेकिन तथ्य सामने यही है कि नीट में ग्रेस माक्र्स दिए जाने में परीक्षा नियंत्रक संस्था एनटीए से गड़बड़ी हुई है। किस हड़बड़ी में यह गड़बड़ी हुई, या किसी ने इसमें जानबूझकर ऐसा कराया? यह तो बाद में पता चलेगा, या हो सकता है कि न भी चले, लेकिन बच्चों के मन में एक बात घर कर के बैठ गई है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी गड़बड़ी हो रही है।
नीट डीजी ग्रेस माक्र्स की प्रक्रिया को पवित्र और निष्पक्ष बताई जा रही है, हो सकता है, ऐसा हो भी, लेकिन एक स्टूडेंट को डेढ़ सौ तक ग्रेस माक्र्स देना समझ से परे है। यही वजह है कि साढ़े छह सौ माक्र्स लाने वाले जिन विद्यार्थियों को पहले सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश आसानी से मिल जाता था उनकी रैंक इस बार पचास हज़ार से भी ऊपर चली गई। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद कुछ शांति जरूर मिली है, लेकिन अभी न्याय नहीं मिला।
अब ग्रेस मार्क्स पाने वाले बच्चों की दोबारा परीक्षा होनी है। हो सकता है इससे उन स्टूडेंट्स के साथ न्याय हो पाए जो बिना किसी ग्रेस माक्र्स के अच्छे नंबर लाए हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि दोबारा उन बच्चों के उतने ही अंक आएं, ऐसे में बच्चों की मानसिकता क्या होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। हालाँकि पूरी परीक्षा को ही रद्द करके दोबारा कराने वाली याचिकाओं पर कोई निर्णय नहीं हो सका है क्योंकि सरकार का कहना है कि पेपर लीक होने के कोई सबूत नहीं मिले हैं।
असल में नीट के मामले में मुद्दा केवल ग्रेस वाले अंकों की ही नहीं है, एक ही परीक्षा केंद्र से परीक्षा देने वाले कई बच्चों का एक साथ टॉपर होना भी संदेह तो पैदा कर ही रहा है। इस परीक्षा में शामिल होने वाले कई बच्चे भी यही सवाल उठा रहे हैं, इस सवाल का जवाब सरकार को भी देना चाहिए। यह बात और है कि फि़लहाल इस बारे में कोई निर्णय नहीं हो पा रहा है। अभी तो सर्वोच्च न्यायालय ने केवल यह कहा है कि ग्रेस अंक पाने वाले 1563 बच्चों के लिए संस्था 23 जून को दोबारा परीक्षा आयोजित करेगी और तीस जून तक इस परीक्षा का रिज़ल्ट जारी कर दिया जाएगा।
एनटीए द्वारा गठित की गई कमेटी ने तो यह सुझाव भी दिया है कि ग्रेस अंक हटाकर इन बच्चों के ओरिजिनल अंक भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए। वैसे यह उचित भी होगा, क्योंकि ग्रेस अंक वाले बच्चों की सही जानकारी भी सामने आ जाएगी, कि वे ग्रेस अंकों के योग्य हैं भी या नहीं। वैसे केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग का कहना है कि एनटीए पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना ठीक नहीं है क्योंकि यह बहुत ही विश्वसनीय संस्था है। लेकिन यहां गड़बड़ी तो हुई है। शिक्षा मंत्री को आरोपों का खंडन करने के बजाय परीक्षा करने वाली संस्था को भी सख्त हिदायत देना चाहिए था, जो कि नहीं किया गया।
सरकार भले ही यह कह रही है कि बच्चों का भविष्य खराब नहीं होने दिया जाएगा, उनका नुक़सान नहीं होने दिया जाएगा। सरकार ने इसकी गारंटी ली है। लेकिन यह सवाल तो अपनी जगह बना हुआ ही है कि एक, दो या चार नहीं बल्कि एक साथ 67 बच्चों को ऑल इंडिया रैंक 1 कैसे मिल गई? जो बच्चे मेहनत के बावजूद परीक्षा उत्तीर्ण करने से थोड़ा सा रह गए, वो तो अपने भाग्य के साथ ही साथ परीक्षा प्रणाली और सरकार को ही कोसेंगे। यह भी जरूरी नहीं कि अगले साल भी उन्हें अपनी मेहनत का फल मिल पाए। कुछ भी हो सकता है।
कुल मिलाकर आरोपों का खंडन करने के बजाय केंद्रीय शिक्षा मंत्री को नीट परीक्षा की पूरी प्रणाली की गंभीरता से जांच करना चाहिए। वहां महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों की भी जांच होना चाहिए, कहीं उनके रिश्तेदारों या परिजनों को फायदा पहुंचाने के लिए उन्होंने जानबूझकर यह काम तो नहीं किया, जैसा कि अक्सर होता है। अधिकारी-कर्मचारी या तो पैसे के लिए ऐसे काम करते हैं या फिर किसी परिजन के लिए। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का परिपालन तो किया ही जाए नीट से लेकर अन्य परीक्षाओं की प्रणाली सुधारी जाए। बच्चों के भविष्य से खेलने का अधिकार किसी को नहीं है।
– संजय सक्सेना



