संसद में एक तरफ इस बात को लेकर संतोष व्यक्त किया जा सकता है कि हंगामे के साथ बहिर्गमन या कार्यवाही स्थगित किए जाने के मामले कम हो रहे हैं। इसके बजाय मुख्य स्वर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कम से कम बहस तो हो रही है। लेकिन कहीं न कहीं यह बात भी खल रही है कि जितनी स्वस्थ और सकारात्मक बहस होना चाहिए, वह तो नहीं हो पा रही। बहस के दौरान भी वे पहलू मुद्दा बन रहे हैं, जो अपेक्षाकृत कम गंभीर हैं और निजी भी।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन में जो लंबा भाषण दिया उसकी काफी चर्चा रही। उनसे यह अपेक्षा तो किसी ने नहीं की होगी कि वह बजट में प्रस्तावित प्रावधानों की तारीफ करेंगे, लेकिन सत्ता पक्ष और उसे चाहने वालों की उम्मीदों से इतर उन्होंने कुछ ज्यादा सख्त आलोचना की और कर रहे हैं। विरोधी मान रहे हैं कि जिस तरह से राजनीतिक और गैरराजनीतिक व्यक्तित्वों को आलोचना के दायरे में ले आए, वह जरूरी नहीं था, जबकि विपक्षी नेता इससे सहमत नहीं हैं।
बजट के दौरान राहुल गांधी ने जाति जनगणना एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की है, लेकिन बजट पर भाषण में उन्होंने इसे आक्रामक अंदाज में उठाया और हलवा सेरिमनी के जरिए बजट बनाने वाले अधिकारियों की जाति को लेकर सवाल खड़ा किया, वो सत्तापक्ष को चुभ गया है। लेकिन तमाम विश्लेषक भी इसे चुनावी नजरिए का मुद्दा बता रहे हैं और बजट पर बहस की गुणवत्ता कम करने वाला कह रहे हैं।
अफसोस की बात यह रही कि सत्ता पक्ष भी दखल देकर बहस को कोई स्वस्थ दिशा नहीं दे सका। भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने अपने भाषण में कुछ अच्छी बातें कहीं होंगी, लेकिन राहुल गांधी के उठाए जाति जनगणना के मुद्दे पर यह कहना कि जिस नेता की अपनी जाति का पता नहीं वह जाति जनगणना कराने की बात कर रहा है, बहस के स्तर को ऊपर उठाने के बजाय उसे और नीचे की ओर ले जाने वाला साबित हुआ है। भले ही अनुराग के भाषण की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा ने जमकर तारीफ की हो, लेकिन आम लोगों में इसे उचित नहीं माना जा रहा है। एक जातिगत मामले में राहुल गांधी को सजा सुना दी गई थी, जबकि उन्होंने किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं कहा था। और न ही किसी जाति के लिए अनुचित शब्द का प्रयोग किया। लेकिन अब अनुराग ठाकुर उसी तरह का बयान दे रहे हैं, तो इसकी सत्तापक्ष तारीफ कर रहा है।
इस बीच विपक्ष की ओर से बजट में राज्यों के साथ कथित तौर पर पक्षपात करने का मसला उठाया गया, जिसका वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पूरी गंभीरता से जवाब भी दिया। यह निश्चित रूप से बजट पर संसद में हुई चर्चा के स्वस्थ पहलुओं में शामिल किया जा सकता है। यह बात तो सही है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद में हो रही किसी भी चर्चा को न तो राजनीति से परे माना जा सकता है और न ही यह अपेक्षा की जा सकती है कि उसका कोई चुनावी पहलू नहीं होगा। फिर भी, यह एक तथ्य है कि अभी-अभी देश में आम चुनाव संपन्न हुए हैं और उससे निकले जनादेश को न केवल सत्तारूढ़ पक्ष बल्कि विपक्ष भी सम्मानपूर्वक स्वीकार कर चुका है। ऐसे में उनसे यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि कम से कम अभी कुछ दिन चुनावी मजबूरियों से ऊपर उठकर विकास और जनकल्याण के एजेंडे को सबसे ऊपर रखते हुए चलें।
वैसे विपक्ष के सधे हुए और आक्रामक हमलों की धार बढ़ती जा रही है। इससे सत्तापक्ष में अंदर ही अंदर बौखलाहट जैसी महसूस की जा रही है। विपक्ष ने प्रधानमंत्री के सदन में न आने का मुद्दा तक उठा दिया, जो कि मौजूं कहा जा सकता है। जब बजट पर बहस हो तो सदन के नेता की मौजूदगी सामान्य तौर पर जरूरी ही होती है। और वह तब, जब वह राजधानी में ही हों। इसलिए यह मुद्दा भी विपक्ष के पक्ष में जाता दिख रहा है।
आम बजट 2024 पर दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में फिर से चर्चा होनी है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि पक्ष और विपक्ष के बीच सार्थक बहस होगी। जनहित के मुद्दों पर चर्चा हो, यह आवश्यक है। चुनावी दौर तो गुजर चुका है, कुछ राज्यों में चुनाव होने हैं। लेकिन उनकी संख्या कम है। ऐसे में ठेठ राजनीतिक मुद्दों के बजाय लोकहित के मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए। जितनी जिम्मेदारी इसकी विपक्ष की है, उतनी ही सत्तापक्ष की भी। बल्कि सत्तापक्ष की जवाबदेही कुछ ज्यादा ही होती है। इसलिए निजी हमलों के बजाय सार्वजनिक मुद्दों को ही प्राथमिकता दी जाए, यह बेहतर होगा। संसद चले और सार्थक बहस हो, यही सही अर्थों में लोकतंत्र की सार्थकता है।
– संजय सक्सेना
Editorial
संसद में बहस का रुख
