Editorial: नई संसद, नई इबारत…

सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए की तरफ से ओम बिरला के मुकाबले विपक्षी प्रत्याशी के तौर पर के सुरेश के सामने आ जाने से आजाद भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष के पद के लिए चुनाव हुआ। अब तक लोकसभा अध्यक्ष का चयन आम राय से होता रहा है, लेकिन इसमें परंपरा के अनुसार डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को देना होता है। इसके लिए एनडीए तैयार नहीं हुआ, तो विपक्ष ने अपना प्रत्याशी स्पीकर के लिए खड़ा कर दिया, जबकि  सदन में एनडीए की सदस्य संख्या को देखते हुए ओम बिरला का स्पीकर बनना तय माना जा रहा है।
सोमवार को 18वीं लोकसभा के पहले सत्र की शुरुआत हो गई। हालांकि शुरुआती दो दिन सांसदों के शपथ ग्रहण की औपचारिकता ही होनी है, लेकिन फिर भी दोनों पक्षों के तेवर पहले ही दिन से यह संकेत दे रहे हैं कि न तो विपक्ष इस बार सदन में अपनी ताकत दिखाने का कोई मौका चूकना चाहता है और न ही सत्ता पक्ष उसे हलके में लेने के मूड में है। पहले दिन ही सदन के बाहर संविधान हाथ में लिए प्रदर्शन करते विपक्षी सांसदों ने यह संकेत दिया कि वे सरकार पर दबाव बनाने का कोई मौका इस बार नहीं चूकना चाहते। दूसरी ओर सत्ता पक्ष भी अपने गठबंधन की मजबूती को कम समझने वालों के सारे भ्रम दूर करते चलने को कृत संकल्प दिख रहा है।
स्पीकर के लिए ओम बिरला के नाम पर विपक्षी खेमे की ओर से किसी तरह की आपत्ति नहीं आई। यह बात भी गौर करने लायक है कि केंद्र सरकार ने इस मसले पर विपक्ष से संपर्क किया। दोनों पक्षों में बातचीत हुई। विपक्ष ने बिरला का समर्थन करने का इरादा जताया, पर उसका कहना था कि परंपरा के मुताबिक डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को मिलना चाहिए। सत्ता पक्ष की ओर से इस बात के लिए ना नहीं किया गया। इसके बावजूद अगर सहमति नहीं बन पाई तो इस पर निराशा ही जताई जा सकती है।
वैसे तो लोकतंत्र में चुनाव किसी भी पद के लिए हो, उसे बुरा या गलत मानने का कोई कारण नहीं है। मगर लोकसभा अध्यक्ष का पद ऐसा है जिसमें आम राय को हमेशा तवज्जो दी जाती रही है। वजह यह है कि सदन के सुचारू संचालन के लिए अध्यक्ष को दोनों पक्षों का सहयोग चाहिए होता है। ऐसे में अगर इस पद पर बैठे व्यक्ति का चयन दोनों पक्ष उसमें अपना विश्वास घोषित करते हुए करें तो पद की शोभा कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन चुनाव में विरोध का मतलब अनिवार्य तौर पर विश्वास की कमी नहीं होता। यह भी लोकतांत्रिक परंपरा का ही हिस्सा जो है।
अगर 17वीं लोकसभा के अनुभव की रोशनी में देखें तो बतौर स्पीकर ओम बिरला के सामने अपने दूसरे कार्यकाल को बेहतर बनाने की चुनौती है। उनका पहला कार्यकाल सांसदों के निलंबन का रिकॉर्ड बनाते हुए समाप्त हुआ था। बेशक इसकी पूरी जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर नहीं डाली जा सकती, मगर इतना तो है ही कि इस बार सभी पक्षों से बेहतर समझदारी और परिपक्वता की अपेक्षा रहेगी।
अपने इस लगातार तीसरे कार्यकाल में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी ने गृह, रक्षा, वित्त और विदेश जैसे सारे अहम मंत्रालयों में पुराने चेहरे बरकरार रखे उससे स्पष्ट है कि इस बार वह निरंतरता के संदेश पर खासा जोर दे रहे हैं। इस लिहाज से लोकसभा अध्यक्ष के पद के लिए ओम बिरला का चुना जाना चौंकाता नहीं है। जो बात थोड़ी हैरान करती है वह है इस पद के लिए चुनाव की नौबत लाया जाना। पिछली बार यानी 2019 में बिरला इस पद पर निर्विरोध चुने गए थे।
वैसे संख्या बल में जो भी थोड़ी-बहुत कमी रह गई हो, तथ्य यह है कि 17वीं लोकसभा में भी विपक्ष ने विरोध की डिग्री में कोई कमी नहीं रहने दी थी। यह बात सदन के अंदर और बाहर विपक्ष के हंगामे, वॉकआउट, धरना-प्रदर्शन वगैरह में ही नहीं, सदन से विपक्षी सांसदों के निलंबन जैसी कार्रवाइयों में भी झलकती रही। बेशक इन सब पर पक्ष और विपक्ष का अपना अलग रुख है, उसके पीछे उनकी अपनी दलीलें भी हैं, लेकिन एक स्तर पर देखा जाए तो यह एक धडक़ते, जिंदा लोकतंत्र की ज्वलंत निशानी ही हैं।
इसके बावजूद पिछली लोकसभा में कई मामलों में सत्ता पक्ष के सामने विपक्ष की कमजोरी भी दर्ज होती रही। पिछले करीब दस साल सदन में नेता प्रतिपक्ष की जगह खाली रही। 17वीं लोकसभा में तो कोई डिप्टी स्पीकर भी नहीं बनाया गया और विपक्ष सरकार को इसके लिए मजबूर नहीं कर सका। अब 18वीं लोकसभा में विपक्षी सदस्यों की बढ़ी हुई संख्या उनके मनोबल और आत्मविश्वास को बढ़ाए हुए है। विपक्षी सांसदों के प्रदर्शन के जवाब में आपातकाल की याद दिलाने वाला पीएम मोदी का बयान बताता है कि विपक्षी दलों का जवाब सत्तापक्ष किस स्तर तक जाकर दे सकता है। वैसे भी सत्तापक्ष की ओर से कांग्रेस पर पुराने मामलों को लेकर ही हमले ज्यादा किए जाते हैं। आज भी नेहरू या इंदिरा गांधी के कार्यकाल को लेकर कांग्रेस की घेराबंदी की जाती है।
हालांकि इस बार भी विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। चाहे चुनावों से पहले के अग्निवीर और जाति जनगणना जैसे मुद्दे हों या महंगाई और बेरोजगारी जैसे शाश्वत माने जाने वाले सवाल या फिर पेपरलीक से जुड़े नए मामले- सदन में ये उठेंगे ही। और इनमें कहीं न कहीं सत्तापक्ष बचाव की मुद्रा में ही आएगा। इसके बदले अन्य मुद्दों पर विपक्ष पर हमले करने की योजना भी सत्तापक्ष बना रहा है। आपातकाल का मुद्दा शायद इसकी शुुरुआत कही जा सकती है।
देखा जाए तो इस बार संसद में समीकरण काफी बदले हुए हैं। विपक्ष की इस बार ताकत पहले से काफी बढ़ी हुई है, नेता प्रतिपक्ष का पद भी इस बार मिला है। देखना होगा विपक्ष इसका कितना कुशल और रचनात्मक इस्तेमाल कर सकता है और सत्ता पक्ष इस ऊर्जा को ईंधन बनाते हुए किस हद तक देश के विकास को गति दे पाता है। मतदाताओं ने जो भी जनादेश दिया है, उसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारी पर कितना खरा उतरते हैं, यह समय बताएगा।
– संजय सक्सेना

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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