Editorial
नई सरकार और नई चुनौतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार के मुखिया के तौर पर रविवार को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। उनके इस तीसरे कार्यकाल पर देश ही नहीं पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। दो क्षेत्रीय पार्टियों के भरोसे मोदी पहली बार कोई सरकार चलाएंगे, और यही कारण है कि इस बार मोदी सरकार का एजेंडा पिछली सरकारों से किन रूपों में और कितना अलग होगा, इस पर सबकी निगाहें होंगी।
तीसरी बार की सरकार में भाजपा पूर्ण बहुमत से पीछे रह जाने के कारण एक तरह से दो पार्टियों की बैसाखी पर टिकी हुई है। ऐसे में जिस तरह की स्वतंत्रता के साथ प्रधानमंत्री अपने और अपनी पार्टी के एजेंडे को लागू करते रहे हैं, वैसी आजादी शायद इस बार न मिले। वन नेशन-वन इलेक्शन और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों पर इस राजनीतिक मजबूरी की विशेष छाप देखने को मिल सकती है। इसके साथ ही सीएए और अन्य मुद्दों पर भी भाजपा की चुप्पी देखने को मिल सकती है।
जहां तक सरकार के सामान्य कामकाज और आर्थिक विकास की रफ्तार की बात है तो उस मोर्चे पर नई सरकार के लिए कोई बड़ी दिक्कत नहीं होनी चाहिए। राजनीति की लंबी पारी ने पीएम मोदी को दृढ़ता के साथ ही लचीलेपन का भी पाठ पढ़ाया है। राजनीतिक विरोधियों को साथ लेने में जो लचीलापन दिखाया गया, वो सहयोगियों को बनाए रखने में काम आ सकता है। दूसरी बात यह कि चाहे चंद्रबाबू नायडू हों या नीतीश कुमार, दोनों विकास की राजनीति का चेहरा रहे हैं। लेकिन इनकी अविश्वसनीयता भी जगजाहिर है। ये दोनों ही नेता कब पलटी मार दें, कहा नहीं जा सकता। नीतीश कुमार को तो राजनीतिक क्षेत्रों में पलटूराम की संज्ञा ही दी जा चुकी है।
आंकड़ों और दावों की बात करें तो दस साल पहले के मुकाबले आज देश विकास के कहीं ज्यादा ऊंचे मुकाम पर खड़ा है। 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से हम पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। यह बात और है कि देश  में आर्थिक मोर्चे पर अभी बहुत चुनौतियां हैं। जीडीपी के आकार के हिसाब से हमने पिछले साल ब्रिटेन को पीछे छोड़ा और 2026 तक जापान तो 2027 तक जर्मनी को पीछे छोडऩे की उम्मीद कर रहे हैं। इन लक्ष्यों की ओर तेजी से कदम बढ़ाना नई सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस राह पर दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, जिनकी अनदेखी करते हुए आगे बढऩा मुमकिन नहीं है। ये हैं बेरोजगारी और असमानता। इंटरनैशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 प्रतिशत बेरोजगार युवा हैं। इस मुद्दे को विपक्ष ने तो पूरी ताकत के साथ उठाया, लेकिन भाजपा ने इसे नजरअंदाज ही किया ओर दूसरे मुद्दों के शोर में इस मुद्दे को जनता का अहम मुद्दा नहीं बनने दिया।
जहां तक आर्थिक और सामाजिक असमानता की बात है तो उसे अक्सर तेज विकास के आगे ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती, लेकिन याद रखने की बात है कि तेज विकास को अगर टिकाऊ बनाना हो तो असमानता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आर्थिक असमानता के मामले में देश में असंतुलन बहुत ज्यादा होता जा रहा है। हम औसत आय तो आंकड़ों में बहुत बेहतर दिखा देते हैं, लेकिन अधिक आय वाले लोगों का प्रतिशत कम है और उनकी आय कई-कई गुना ज्यादा है। ऐसे में आम आदमी की आय का अनुमान लगाना भी मुश्किल हो जाता है।
फिलहाल, स्वयं खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प से ले चुके हैं। ऐसे में मौजूदा जनादेश की सबसे उपयुक्त व्याख्या यही हो सकती है कि कथित तौर पर बांटने वाले राजनीतिक मुद्दों से दूरी बनाए रखते हुए सरकार विकास के अजेंडे पर पूरा ध्यान केंद्रित करे। फिर भी, चूंकि इस बार विपक्ष अधिक ताकतवर होकर उभरा है और इस बार ही कांग्रेस भी अपनी वापसी करते हुए दिख रही है, सो सरकार को विपक्ष के तगड़े विरोध का सामना तो करना ही पड़ेगा। सदन में भी और बाहर भी।
विपक्ष के मुद्दों को नजरअंदाज करना सरकार को भारी भी पड़ सकता है। वहीं एनडीए के सहयोगी दलों को साधने के चक्कर में कहीं भाजपा का अपना एजेंडा पीछे न रह जाए, यह भी देखना होगा। भाजपा की मातृ संस्था कहा जाने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी वर्तमान में बहुत खुश नहीं दिख रहा है। उसके लिए उसका एजेंडा सर्वोपरि है। सवाल भी उठ रहा है कि क्या केंद्र सरकार संघ के एजेंडे को आगे बढ़ा पाएगी? कुल मिलाकर फिलहाल तो यही माना जा सकता है कि सरकार को सधे हुए कदमों से ही आगे बढऩा होगा, पहले जैसी ताकत सरकार के पास इस बार नहीं है, यह ध्यान में रखते हुए।
– संजय सक्सेना

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

Related Articles