Editorial
व्यवस्था से उठता भरोसा

स्कूल में एक कहानी पढ़ी थी। हार की जीत। उसमें एक डाकू ने अपाहिज बनकर बाबा से मदद करने को कहा और उनका सुल्तान नाम का घोड़ा छीन लिया। बाबा ने उस डाकू से कहा- घोड़ा तो ले लो, लेकिन किसी को यह घटना मत बताना। डाकू ने पूछा- ऐसा क्यों? बाबा ने कहा कि फिर लोगों का गरीबों पर से विश्वास उठ जाएगा। इस वाक्य ने डाकू को अंदर तक हिला दिया। उसका हृदय परिवर्तन तो हो गया, और उसने घोड़ा वापस भी कर दिया। लेकिन आज जो हो रहा है, वह इसी तरह का है। नीट पेपर लीक, व्यापमं और ऐसे अन्य घोटालों के सार्वजनिक होने के कारण नई पीढ़ी का व्यवस्था पर से विश्वास उठता जा रहा है।
एक तरफ देश के शिक्षा मंत्री नीट परीक्षा कराने वाली संस्था के साथ खड़े हो गए हैं और उसे क्लीन चिट दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने साफ तौर पर कहा है कि यदि 0.001 प्रतिशत भी गड़बड़ हुई है तो हम उससे सख्ती से निपटेंगे। अदालत ने कहा कि ये छात्रों की मेहनत का सवाल है। हमें इसका एहसास है कि उन्होंने कैसे तैयारी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए से कहा कि वह छात्रों की शिकायत को नजऱअंदाज न करे। अगर एग्जाम में वाकई कोई गलती हुई है तो उसे स्वीकार कर सुधारा जाए। कोर्ट ने साफ कहा है कि छात्रों की मेहनत बर्बाद नहीं होने देंगे।
कहावत है कि चिंगारी ही नहीं होगी तो आग कैसे लग सकती है। यानि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा अर्थात नीट में हुई कथित धांधलियों की रोज आती खबरें देश में करोड़ों माता-पिताओं, बच्चों और शिक्षकों को विचलित कर रही हैं। दिन रात मेहनत करने वाले बच्चे क्या इनसे खुश हो रहे होंगे? और नीट में इस साल सम्मिलित हुए 24 लाख बच्चों के मन पर इस लीक प्रकरण का क्या असर हो रहा होगा?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर हमें पता है, लेकिन जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी से बचते ही नजर आते हैं। घोटाला भी करते हैं, फिर खुद को पाक साफ दिखाने की कोशिशें भी करते हैं। उन्हें शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने बच्चों का भविष्य खराब होता है, कितने आत्महत्या तक कर लेते हैं? क्योंकि शायद इनमें उनके परिवार का कोई नहीं होता। जाके पांव न फटी बिंवाई, वो क्या जाने पीर पराई?
क्या बहुत कम नंबरों से सिलेक्शन से दूर रह गए बच्चे जीवनभर इस ‘सिस्टम’ को कसूरवार नहीं ठहराएंगे? बिल्कुल ठहराएंगे और कोसेंगे अपने भाग्य को। क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। नीट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां भी शायद जिम्मेदार लोगों के लिए काफी नहीं लग रही हैं। हालांकि कानून अपनी गति से काम करेगा, लेकिन उन मासूम बच्चों का क्या, जिनके पास करिअर बनाने के लिए सीमित समय होता है।
देश में पिछले सात साल में पेपर लीक की एक-दो नहीं तकरीबन 70 घटनाएं हुईं हैं। ये वो संख्या है, जो गिनती में सामने आई है। लेकिन इन घटनाओं से देश के डेढ़ करोड़ से ज्यादा बच्चों पर असर पड़ा है। देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा है। बच्चे इसी उम्र में सपने देखते हैं, उन सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करते हैं, प्रतियोगी-परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तिस पर भी अगर उन्हें पेपर लीक जैसी घटनाओं से दो-चार होना पड़ेगा, तो वाकई चिंताजनक स्थिति है।
पेपर लीक का विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क पर क्या असर पड़ता है? इसको लेकर हुए शोध और अध्ययनों में सामने आया है कि पेपर लीक की घटनाओं से बच्चों का पूरी शिक्षा व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाता है, परीक्षा प्रक्रिया पर से भरोसा डिगता है और बच्चों के अकादमिक प्रदर्शन पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे उनकी साइकोलॉजी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 2019 में हुए एक अध्ययन में पता चला कि पेपर लीक के बाद कुछ स्टूडेंट्स, लीक जैसी अनैतिक घटनाओं की तरफ आकृष्ट होने लगते हैं। वो भी गलत कदम उठाने के लिए तैयार होने लगते हैं।
देखा जाए तो पेपर लीक एक धंधा ही बन गया है। आज के दौर में पैसे देकर  व्यवस्था में सेंध लगाना बहुत आसान हो गया है। राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक-राजनीतिक गठजोड़ के दौर में यह आम बात होती जा रही है। राजनेताओं और अधिकारियों की एक बड़ी संख्या शिक्षा माफिया के रूप में समाज में अपनी धाक जमाए हुए है। उनकी शिक्षण और अब कोचिंग संस्थाएं भी सरकार में प्रभाव के दम पर ही चलती हैं। नीट पेपर लीक मामले में भी कुछ जगह सत्तापक्ष से जुड़े लोगों का हाथ होने के प्रमाण भी मिल रहे हैं।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था में लगी दीमक के साथ ही उस युवा और किशोर पीढ़ी का भी है, जिसका व्यवस्था पर से विश्वास ही उठता जा रहा है। जो यह मानकर चलने लग रहा है कि हर प्रतियोगी परीक्षा में ऐसी धांधलियां होती हैं। शायद तभी तो बच्चे मेहनत करके भी पास नहीं हो पाते। और जो प्रभावशाली परिवार के बच्चे होते हैं, वो आसानी से इन परीक्षाओं में पास होते दिखते हैं, तो इनका विश्वास और ज्यादा बढ़ जाता है।
सवाल ये भी है बच्चों को निराशा से बचाने के लिए क्या माता-पिता ने, समाज ने तैयारी की है? कहां जाएं वो बच्चे और किससे अपना दुख कहें? घर में माता पिता, बाहर दोस्तों, रिश्तेदारों और कोचिंग संस्थानों का प्रेशर और हर पल जीतने का दबाव। आखिर जब परीक्षाएं और संस्थाएं अपनी नैतिकता नहीं बचा पा रहीं तो बच्चे क्या करें? फिर बच्चे कमजोर पड़ जाते हैं। यह एक नए तरह की सामाजिक क्रूरता और असंवेदनशीलता है। यह हमारी नई पीढ़ी को खोखला ही कर रही है।
पेपर लीक की लगातार घटनाओं से परेशान होकर मार्च में उप्र में एक विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली थी। फरवरी में भी एक विद्यार्थी ने आत्महत्या की थी। एक आरटीआई से पता चला है कि पिछले 5 वर्षों में 64 एमबीबीएस और 55 स्नातकोत्तर छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। एनसीआरबी की रिपोर्ट (2021) से पता चला है कि 2016 से 2021 के बीच भारत में छात्रों की आत्महत्याओं में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े देखें तो हर साल सात लाख लोग आत्महत्या करते हैं, इसमें 15 से 29 वर्ष के बच्चों में मृत्यु का चौथा प्रमुख कारण आत्महत्या ही है।
आंकड़ा चौंकाने के लिए पर्याप्त नहीं है क्या? खबरों में बच्चों की आत्महत्याओं के मामले सुर्खियां बनते दिखते हैं, तब भी क्या हम इन्हें नकार कर आराम से बैठे रह सकते हैं? क्या वोट लेकर सरकार बनाने तक की ही जिम्मेदारी रह गई है हमारी राजनीतिक पार्टियों की? क्या व्यवस्थाओं में सुधार के बजाय हमने हर आरोप नकारने की आदत डाल ली है? इससे क्या होगा? जिस समाज में बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, वो भी इन राजनेताओं और अधिकारियों का है। क्या उनकी जिम्मेदारी अपने परिवार तक ही सिमट कर रह गई है? और अंत में, क्या सर्वोच्च न्यायालय ही अकेली ऐसी संस्था रह गई है, जो समाज के हर वर्ग की चिंता करे…?
– संजय सक्सेना

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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